बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
( ३१ ) स्तब्धकरहस्य विचार—विमान के उत्तर पार्श्वस्थ सन्धिमुखनाल से अपस्मार का धूम
संग्रह करके स्तम्भन यन्त्र द्वारा उस धूम के फैलाने से परविमानस्थ सर्वमनुष्यों के स्तब्ध कर देने जड-
मूच्छित बना देने का रहस्य है ॥
(३२) कर्षणरहस्यो नाम—स्वविमानसंहारार्थं परविमानपरम्परागमने
विमानाभिमुखस्थवैश्वानरनालान्तर्गतज्वालिनीप्रज्वालन कृत्वा सप्ताशीतिलिङ्क-
प्रमाणोष्ण यथा भवेत् तथा चक्रद्वयकीलीचालनात् शत्रुविमानोपरि वर्तुला-
कारेण तच्छक्तिप्रसारणद्वारा शत्रुविमाननाशनक्रियारहस्यम् ॥
( ३२) कर्षणरहस्य विचार—अपने विमान के नाशार्थ दूसरे के विमानयानों के लगातार
आने पर विमान के सामने वाले वैश्वानर नाल के अन्तर्गत ज्वालिनी + जलाकर सतासी लिङ्क (डिग्री)
प्रमाण की उष्णता जिससे हो जावे वैसे दो चक्रों की कीली चलाने के द्वारा शत्रुविमान के ऊपर गोलाकार
से उस शक्ति को फैलाने के द्वारा शत्रुविमान के नाश करने का क्रिया रहस्य है ॥
पञ्चञ्च ॥ अ० १ । सू० ३ ॥
सूत्रशब्दार्थ—और पांच का जानने वाला 'अधिकारी' है ।
बोधानन्दवृत्तिः—
यथारहस्यविज्ञान पूर्वसूत्रे निरूपितम् ।
पञ्चावर्तस्वरूपञ्च तथैवास्मिन्निरूप्यते ॥ १ ॥
एतेनोभयविज्ञानादेव यन्तृत्वतामियात् ।
इतिसूत्रद्वयविचारात्सिद्ध भवति ध्रु ( धृ ? ) वम् ॥ २ ॥
पञ्चावर्तविचारस्तु शौनकोक्तप्रकारत ।
रेखादिपञ्चमार्गानुसारदत्र प्रकीर्त्यते ॥ ३ ॥
रेखापथो मण्डलश्च कक्ष्यश ( ोश ? ) क्तिस्तथैव च ।
केन्द्रश्च ( च्चे ? ) ति विमानाना मार्गा खे पञ्चधा स्मृता ॥ ४ ॥
पूर्वसूत्र में जिस प्रकार रहस्यविज्ञान निरूपित किया गया है उसी प्रकार इस सूत्र में पञ्चावर्त-
स्वरूप (पांच आवर्तों-भँवरों-बवण्डरों का स्वरूप) भी निरूपित किया जाता है । इस भांति दोनों के
विज्ञान से ही विमानचालकता को प्राप्त किया जा सकता है यह बात उक्त दोनों सूत्रों के विचार से
निश्चित सिद्ध हो जाती है । पञ्चावर्त विचार शौनक ऋषि के कहे प्रकार से रेखा आदि पाच मार्गों के
अनुसार यहां वर्णन किया जाता है । रेखापथ, मण्डल, कक्ष्य, शक्ति, केन्द्र ये पांच प्रकार के मार्ग विमानों
के आकाश में बतलाए गये हैं ॥ १–४॥
तदुक्तं शौनकीये—
अथाकाशमार्गान्यनुक्रमिष्यामो रेखामण्डलकक्ष्यशक्ति केन्द्रभेदाद्-भूतशक्ति-
प्रवाहमागण्याकूर्मादावारुणान्त वाणमवष्टभ्यैकचत्वारि ष्ठं श ( रिङ् श )
- विद्युन्मय बत्ती प्रतीत होती है ।