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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

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पृष्ठ 36

विमान के रहस्य ] [ १३
(१३) रूपान्तर रहस्य विचार—तैल प्रकरण में कहे प्रकारानुसार गृध्रजिह्वा, ॐ कुम्भिणी ×
काकजङ्घा ‡ आदि तैल से संस्कारित वैरूप्यदर्पण में उश्रीम प्रकार के धूम को संयुक्त करके उसमें यानस्थ-
कुण्टिणी शक्तिसंयोजन द्वारा विमान के देखने वालों को सिंह, बाघ, भालू, सर्प, पहाड़ी, नदी, वृक्ष
आदि विकार से अन्यथा कल्पित रूपान्तर दीखने का रहस्य ॥
(१४) सुरूपरहस्यो नाम—करकप्रकरणोक्तत्रयोदशजातीयकरकश-
क्तिमाकृष्य हिमोद्गारवायुना संधार्य पश्चाद्विमानदक्षिणकेन्द्रमुखस्थितपुष्पि-
णीपिञ्जुलादिदर्पणमुखे पूर्वोक्तशक्ति वातप्रकरणनालद्वारा संयोज्य तस्मिन्
सुरघारूपकिरणशक्तिं सन्धार्य तद्व्रा [ द्वा ? ] रा विमानसन्दर्शकानां विविध-
पुष्पमाल्योपसेवितदिव्याप्सरःस्वरूपवद्वि [ कद्भि ? ] काग्प्रदर्शनक्रिया-
रहस्यम् ॥
(१४) सुरूप रहस्य विचार—करकप्रकरण में कही तेरह प्रकार की करकशक्ति को आकृष्ट करके
हिमोद्गार वायु अर्थात् निकलती हुई ठण्डी भाप के द्वारा संयुक्त कर पश्चात् विमान के दक्षिण केन्द्र
मुख में स्थित पुष्पिणी पिञ्जुल + आदि ( के ) दर्पणमुख में पूर्व कही शक्ति को वायु फैलाने वाली
नाल के द्वारा संयुक्त करके उसमें सुरघा ( तीव्र गति वाली ) नाम की किरणशक्ति को युक्त करके उसके
द्वारा विमान देखने वालों को नाना पुष्पमालाओं से सेवित दिव्य अप्सरा स्वरूप वाले विकार के
दीखने का रहस्य है ॥
(१५) ज्योतिर्भावरहस्यो नाम—अंशुबोधिन्यामु [क्त्या उ ?] क्तप्रकारेण
संज्ञानादिषोडशसूर्यकलासु द्वादशाद्याषोडशान्तकलाप्रभाकर्षणं कृत्वा-आकाश-
चतुर्थपथस्थमयूखकक्ष्यस्थितवायुमण्डले नियोजयेत् । तथैव खतरङ्गशक्तिप्रभा-
माहृत्य वातमण्डलसप्तमावरणस्थप्रकाशशक्त्या सम्मेलयेत् । पश्चादेतच्छक्ति-
द्वय विमानस्थनालपञ्चकद्वारा विमानगुहागर्भदर्पणयन्त्रतृतीयकोशे सन्धार्य
तद्व्रा [ द्वा ? ] रा विमानद्रष्टॄणां बालातपवत्प्रकाशप्रदर्शनरहस्यम् ॥
(१५) ज्योतिर्भाव रहस्य विचार—अंशुबोधिनी में कहे प्रकारानुसार सूर्य की संज्ञान आदि
सोलह कलाओं में से बारहवीं से लेकर सोलहवीं तक कलाओं की प्रभा का आकर्षण करके आकाश के
चतुर्थपथ में रहने वाले किरणरूप अश्व या किरणक्षेत्र में स्थित वायुमण्डल में नियुक्त करे । उसी प्रकार
आकाशतरङ्ग की शक्ति की प्रभा का आहरण करके वातमण्डल के सातवें आवरण में स्थित प्रभाशक्ति
में मिला दे । पश्चात् इन दोनों शक्तियों को विमानस्थ पांच नालों द्वारा विमानगुहा के मध्य दर्पणयन्त्र
के तृतीय कोश में लाकर उसके द्वारा विमान देखने वालों को बाल सूर्य की भांति प्रकाश दीखने का
रहस्य है ।
ॐ आयुर्वेदिक निघण्टुओं में 'गृध्रजिह्वा' नाम से कोई ओषधि नहीं कही किन्तु 'गृध्रपत्रा' ( धूमपत्रा ) और
गृध्रनखी ( नाखुना ) कही है ।
× कुम्भिणीफल ( जमालगोटा ) तम्बाकू कुम्भिणी कुम्भीगूगल से अभीष्ट हो सकता है ।
‡ गुञ्जा ( रत्ति-घोंघ्चली ) को काकजङ्घा कहते हैं ।

  • प्रकाशरूप वैद्युत शक्ति के उत्पादक दर्पण यन्त्र ।