बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंविमान शब्दार्थ ] [ ७
नारायणोपि—
पृथिव्यप्स्वन्तरिक्षेषु खगवद्वेगत स्वयंम् ।
यस्समर्थो भवेद् गन्तु स विमान इति स्मृत ॥ इत्यादि ॥५॥
शङ्खोपि—
स्थानात्स्थानान्तर गन्तु यस्समर्थ खमण्डले ।
स विमान इति प्रोक्तो यानशास्त्रविशारदै ॥ ६ ॥ इत्यादि
विश्वम्भर —
देशाद्देशान्तर तद्वद् द्वीपाद् द्वोपान्तर तथा ।
लोकाल्लोकान्तर चापि योम्बरे गन्तुमर्हति ।
स विमान इति प्रोक्त ( े ? ) खेटशास्त्रविदा वरै ॥७॥
विमानार्थ के निर्णय में इस प्रकार भाववाला यह विमान शब्द है । लल्ल आचार्य ने भी
कहा है--आकाश-मण्डल में गमन करने में पक्षिर्यो के साथ जिन की उपमा एवं तुल्यता हो वे यान-
शास्त्रज्ञ विद्वानों द्वारा विमान कहे गये हैं । नारायण आचार्य ने भो कहा है—पृथिवी जल आकाश में
पक्षिर्यों के वेग की भाति स्वयं ( यन्त्रादि द्वारा ) जो गमन करने को समर्थ हो वह विमान कहा गया है ।
आचार्य शङ्ख ने भी कहा है—आकाशमण्डल मे एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाने को जो समर्थ हो
वह यानशास्त्रज्ञ विद्वानों द्वारा विमान कहा गया है । एवं विश्वम्भर आचार्य ने भी कहा है—आकाश में
देश से देश को द्वीप से द्वीप को और लोक से लोक को जो जा सकता हो वह यानशास्त्रज्ञ उक्त विद्वानों
द्वारा विमान कहा गया है ॥ ४—७ ॥
एव विमानशब्दार्थमुक्त्वा शास्त्रानुसारत ।
अथेदानी तद्रहस्यविचारस्स प्रकीर्त्यते—
रहस्यज्ञोधिकारी ॥ अ० १ । सू० २ ॥
सूत्रशब्दार्थ—रहस्यों का जाननेवाला विमान चलाने में अधिकारी है ।
बोधानन्दवृत्ति —
वैमानिकरहस्यानि (णि?) यानि प्रोक्तानि शास्त्रत ।
द्वात्रिंशदिति तान्येव यानयन्तृत्वकर्मणि ॥ १ ॥
साधकानि भवन्तीति यदुक्त ज्ञानिभि पुरा ।
तत्सूत्रस्यादिमपदात्सूचित भवति स्फुटम् ॥ २ ॥
एतद्रहस्यविज्ञान विदित येन शास्त्रत ।
द्वितीयपदत प्रोक्त सोधिकारी भवेदिति ॥ ३ ॥
एतेन यानयन्तृत्वे रहस्यज्ञानमन्तरा ।
सूत्रेधिकारससिद्धि र्नेति सम्यग्विनिर्णितम् ॥ ४ ॥