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बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)

Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja

महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा

DevanagariHindipublished368 पृष्ठ

पृष्ठ 45, कुल 368 में से

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पृष्ठ 45

ब्रह्मलोकविमानानां विनाशस्तैर्निरूपितः ।
शैत्योष्णशक्तिन्यूनातिरिक्ताभ्यां मार्गसन्धिषु ॥१२॥
'र' वर्ण से रवि कहा है 'ह' वर्ण से आकाश बतलाया गया, दोनों के मध्य में शक्तिमार्ग
बहुत कहे हैं। उनमें शैत्यावर्त अतिवेग से शक्तियों के संसर्ग से विशेष करके उत्पन्न हो जाते हैं जो
विमानयानों के नाशक होते हैं। महामार्तण्ड शक्तिश्च प्रवाहांश 'म' से लिया गया है और 'ह' से
आकाश यथाक्रम से वर्णित किये गये हैं। उन दोनों के मध्य में केन्द्रमार्ग प्राय कहे हैं, उनमें घर्षणावर्त
नानाप्रकार के क्रम से होते हैं। उनसे ब्रह्मलोक विमानों का विनाश शैत्य-उष्णशक्तियों के न्यूनाधिक
होने से मार्गसन्धियों में निरूपित किया गया है ॥ ८–१२ ॥
प्रवाहद्वयसंयोगवेगादावर्तनं क्रमादिति ।
एवं रेखादिमार्गेषु आवर्तस्सन्निरूपिता ॥ १३ ॥
तैर्विनाशो विमानानामिति शास्त्रविनिर्णयः ।
पूर्वसूत्रोक्तद्वात्रिंशद्रहस्यज्ञानवत्क्रमात् ॥ १४ ॥
मार्गावर्तस्वरूपे च सूत्राभ्यां