बृहद्विमानशास्त्रम् / वैमानिक शास्त्र (महर्षि भरद्वाज - पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक सविस्तार हिन्दी व्याख्या)
Brihad Viman Shastra / Vaimanika Shastra of Maharshi Bharadvaja
महर्षि भरद्वाज (टीकाकार: पं. ब्रह्ममुनि परिव्राजक) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें८ ] [ बृहद् विमानशास्त्र
विमानरचने व्योमारोहणे चालने तथा ।
स्तम्भने गमने चित्रगतिवेगादिनिर्णये ॥ ५ ॥
वैमानिकरहस्यार्थज्ञानसाधनमन्तरा ।
यतोधिकारसंसिद्धि र्नेति सूत्रेण वर्णितम् ॥ ६ ॥
ततोधिकारसंसिद्ध्यर्थं तद्रहस्याण्यथाक्रमम् ।
यथोक्तानि रहस्यलहर्यां लल्लादिभि पुरा ॥ ७ ॥
तथैवोदाहरिष्यामि सग्रहेण यथामति ।
इस प्रकार शास्त्रानुसार विमानशब्दार्थ कहकर पुन अथ विमानरहस्य बिचार वर्णित किया
जाता है—शास्त्र द्वारा जो वैमानिक रहस्य बत्तीस कहे हैं वे ही यान-चालककर्म में साधक होते हैं यह
जो विद्वानों ने पुराकाल में कहा है वह सूत्र के आदिम पद से स्पष्ट सूचित होता है। इस बत्तीस
रहस्यविज्ञान को जिसने शास्त्रद्वारा जान लिया है वह विमान का अधिकारी है यह द्वितीय पद से कहा
है। इससे यानचालक कर्म में रहस्यज्ञान के बिना विमानाधिकार नहीं है यह भली प्रकार निर्णय
दिया है ॥ विमान के रचने, आकाश में चढने, चलाने, स्तम्भन करने—नियन्त्रण में रखने, उड़ाने
चित्रगति और वेग आदि देने के निर्णय में वैमानिक रहस्यार्थज्ञानरूप साधन के बिना अधिकारसंसिद्धि
नहीं है अत उसे सूत्र में कहा है । अधिकारसंसिद्धि के लिये उन रहस्यों को लल्ल आदि
आचार्यों ने पुराकाल में क्रमश जैसे 'रहस्यलहरी' ग्रन्थ में कहा है वैसे ही संक्षेप से यहा
यथावत् उदाहृत करूंगा ॥ १-७॥
उक्तं हि रहस्यलहर्याम्—
मान्त्रिकस् [को ?] तान्त्रिकस्तद्वत्कृतकश्चान्तरालक ।
गूढो दृश्यमदृश्यं च परोक्षश्चापरोक्षक ॥ १ ॥ [ ८ ]
सङ्कोचो विस्तृतश्चैव विरूपकरणस्तथा ।
रूपान्तरस्सुरूपश्च ज्योतिर्भावस्तमोमय ॥ २ ॥ [ ९ ]
प्रलयो विमुखस्तारो महाशब्दविमोहन ।
लङ्घनस्सर्पगमनश्चपलस्सर्वतो मुख ॥ ३ ॥ [ १० ]
परशब्दग्राहकश्च रूपाकर्षणस्तथा ।
क्रियारहस्यग्रहणो दिक्प्रदर्शनमेव च ॥ ४ ॥ [ ११ ]
✤ ...
स्तब्धक [को ?] कर्षणश्चेति रहस्यानि यथाक्रमम् [ १२ ]
एतानि द्वात्रिंशद्रहस्यानि [णि ?] गुरोर्मुंखात् ॥ ५ ॥
- हस्तलेख में श्लोकार्द्ध छुटा हुआ है जो किसी कापी करने वाले से छूटा है, जिस श्लोकार्द्ध मे
'प्राकाशाकार, जलदरूप' ये दो रहस्य थे तभी पूरी संख्या ३२ होगी, तथा आगे रहस्यविवरण मे २६
३० सख्या में उक्त दोनों रहस्यों को दिया हुआ भी है ।