तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
अयुतसिद्धौ ] प्रमाणनिरूपणम् २६
सकता है इसी प्रकार विशेष को नित्य द्रव्य परमाणु आदि से अलग नहीं
किया जा सकता है इसलिए नित्य द्रव्य और विशेष ये दोनों अयुत सिद्ध कहे
जाते हैं और उनका सम्बन्ध समवाय कहा जाता है।
इस प्रकार ‘ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ विज्ञातव्यौ’
अर्थात् जिन दो में से कोई एक, दूसरे के आश्रित ही रहे उससे अलग न किया
जा सके उन दोनों को अयुतसिद्ध कहते हैं। इसी लिए १ अवयव अवयवी’,
२ ‘गुण गुणी’, ३ ‘क्रिया क्रियावान्’, ४ ‘जाति व्यक्ति’ और ५ ‘नित्यद्रव्य
तथा विशेष’ ये पांच अयुतसिद्ध माने गए हैं। यहां तक अयुतसिद्ध के लक्षण
का स्पष्टीकरण हो गया। परन्तु लक्षण में ‘अविनश्यत्’ पद भी दिया हुआ
है। अयुतसिद्ध के लक्षण में इस ‘अविनश्यत्’ पद के रखने का क्या प्रयोजन
है इसके स्पष्टीकरण की आवश्यकता है। यदि इस लक्षण में ‘अविनश्यत्’ पद
न रखा जाय तो इस लक्षण में अव्याप्ति दोष आ जायगा। ‘लक्ष्यैकदेशावृत्ति-
त्वमव्याप्तिः’ जो लक्षण लक्ष्य के एक देश में न जावे उसे अव्याप्ति दोष ग्रस्त
कहा जाता है। यदि ‘अयुतसिद्ध’ के इस लक्षण में से ‘अविनश्यत्’ पद को
हटा कर केवल ‘ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते तावयुतसिद्धौ’ इतना ही
लक्षण किया जाय तो अयुतसिद्ध के जो पांच भेद अभी प्रदर्शित किए हैं उनमें
से पहिले तीनों में यह लक्षण नहीं जा सकेगा। क्योंकि गुण आदि सदा गुणी
आदि के आश्रित ही नहीं रहते हैं अपितु एक समय ऐसा भी आता है जब
कि गुण, क्रिया, तथा अवयवी ये सब निराश्रित भी हो जाते हैं। इसलिए
‘एकमपराश्रितमेवावतिष्ठते’ यह लक्षण उनमें नहीं घट सकता है। जाति और
व्यक्ति में भी जाति के नित्य होने पर भी व्यक्ति के अनित्य होने से व्यक्ति का
नाश होने पर जाति के निराश्रय हो जाने की सम्भावना है। केवल नित्य
द्रव्य और विशेष इन में दोनों के नित्य होने से अयुतसिद्ध का लक्षण घट
सकेगा। शेष चार में अव्याप्त हो जायगा फलतः लक्ष्यैकदेश में अवृत्ति होने
से यह लक्षण अव्याप्त हो जायगा। उसका वारण करने के लिए लक्षण में
‘अविनश्यत्’ पद का प्रयोग आवश्यक है।
घटरूप का कारण घट है इसी प्रकार घट में रहने वाली क्रिया का कारण
भी घट है। इन गुण तथा क्रिया के नाश के अन्य प्रकारों से अतिरिक्त एक
प्रकार यह भी है कि कारण के नाश से कार्य का नाश होता है। अर्थात् घट
के नाश से घटगत रूप तथा क्रिया आदि का नाश होता है। इस दशा में घट
का नाश कारण है, और रूपादि गुण तथा क्रिया का नाश कार्य होगा। कारण
और कार्य में पौर्वापर्य का होना आवश्यक है। अतएव पहिले घट का नाश
३० तर्कभाषा [ अयुतसिद्धौ
तदुक्तम्— तावेवायुतसिद्धौ द्वौ विज्ञातव्यौ ययोर्द्वयोः ॥
अनश्यदेकमपराश्रितमेवावतिष्ठते ॥
होगा तब उसके बाद घटगत रूप अथवा क्रिया का नाश होगा। इसलिए
घटनाश और घटगत रूपादि गुण तथा क्रिया के विनाश में कम से कम एक
क्षण का अन्तर अवश्य होगा। यह जो एक क्षण का काल है वही गुण तथा
क्रिया का 'विनश्यत्ताकाल' है और उस काल में गुण तथा क्रियादि निराश्रय हो
जाते हैं। जब घट का नाश हो गया और घटगत रूपादि गुण अथवा क्रिया
का नाश अगले क्षण में होना है तब उस एक क्षण में रूपादि का कोई आश्रय
नहीं है क्योंकि उनका आश्रय भूत घट पहिले क्षण में नष्ट हो चुका है। इस
लिए इस क्षण में रूपादि गुण निराश्रित हो जाते हैं। इस क्षण के अगले क्षण
में रूपादि गुणों का भी नाश हो जाता है। यह क्षण उनके नाश के अव्यवहित
पूर्व का क्षण है। विनाश से अव्यहित पूर्व का क्षण ही उसका 'विनश्यत्त
काल' कहा जाता है। 'विनश्यत्ता' का अर्थ 'विनाश कारणसामग्री सान्निध्य'
है। अर्थात् जिस क्षण में विनाश के समग्र कारण उपस्थित हो जायं वही
'विनश्यत्ता काल' है। उस विनाश कारण सामग्री के एकत्र हो जाने पर अगले
क्षण में कार्य का विनाश अवश्य हो जायगा। आश्रयभूत घटादि का नाश ही
रूपादि के विनाश की सामग्री का सान्निध्य है। इसलिए इस 'विनश्यत्ता काल'
में रूपादि निराश्रय भी रहते हैं। अतएव यदि 'ययोर्मध्ये एकमपराश्रितमेवा-
वतिष्ठते तावेवायुतसिद्धौ विज्ञातव्यौ' यही अयुतसिद्ध का लक्षण रखा जाय तो
'गुण गुणी' 'क्रिया क्रियावान्' और 'अवयव अवयवी' में यह लक्षण नहीं घट
सकेगा क्योंकि गुणादि अपराश्रित ही नहीं अपितु विनश्यत्ता काल में निराश्रित
भी रहते हैं। इस दोष के निवारण के लिए ही अयुतसिद्ध के लक्षण में
'अविनश्यत्' पद का समावेश किया गया है। इसका प्रयोजन यह हुआ कि
अविनश्यदवस्था में जो पराश्रित ही रहे उसको अयुतसिद्ध कहेंगे 'विनश्यत्ता
काल' में पराश्रित होना आवश्यक नहीं है। उस काल में निराश्रित भी रह
सकता है। इस प्रकार 'अयुतसिद्ध' के लक्षण में 'अविनश्यत्' पद का समावेश
कर देने से उक्त दोष का परिहार हो जाता है। गुण क्रिया आदि 'विनश्यत्ता
काल, में निराश्रित रहते हैं परन्तु अविनश्यत्ता काल में तो अपराश्रित ही रहते
हैं। इसलिए उनमें लक्षण का समन्वय हो जाता है। इसी बात को ग्रन्थकार
प्रतिपादित करते हैं:—
इसी से कहा है:—
उन हीं दो को अयुतसिद्ध समझना चाहिए जिन दोनों में से एक अविनश्यदवस्था
में दूसरे के आश्रित ही रहता है।
समवायः ] प्रमाणनिरूपणम् ३१
यथा अवयवावयविनौ, गुणगुणिनौ, क्रियाक्रियावन्तौ, जातिव्यक्ती,
विशेषनित्यद्रव्ये चेति । अवयव्यादयो हि यथाक्रममवयवाद्याश्रिता एवा-
वतिष्ठन्तेऽविनश्यन्तः । विनश्यदवस्थास्त्वनाश्रिता एवावतिष्ठन्तेऽवय-
व्यादयः । यथा तन्तुनाशे सति पटः । यथा वा आश्रयनाशे सति गुणः ।
विनश्यत्ता तु विनाशकारण सामग्रीसान्निध्यम् ।
तन्तुपटावप्यवयवावयविनौ, तेन तयोः सम्बन्धः समवायोऽयुतसिद्ध-
जैसे १ 'अवयव अवयवी', २ 'गुण गुणी', ३ 'क्रिया क्रियावान्', ४ 'जाति
और व्यक्ति' तथा ५ 'नित्यद्रव्य और विशेष' । अवयवी आदि यथाक्रम अवयवादि
के आश्रित ही रहते हैं । विनश्यदवस्था में तो अवयवी आदि निराश्रित ही रहते
हैं जैसे तन्तु [ रूप अविनश्यदवस्था में अवयव ] के नाश होने पर पट [ रूप
अवयवी निराश्रित हो जाता है ] अथवा जैसे आश्रय [ घटादि ] के नाश हो
जाने पर [ उसमें रहने वाले रूपादि ] गुण [ विनश्यत्ता काल में निराश्रित हो
जाते हैं ] विनश्यत्ता तो विनाश कारण की सामग्री का सान्निध्य [ समस्त
विनाश कारणों का एकत्र हो जाना ] है ।
पूना वाले संस्करण में यहाँ मूल पुस्तक में 'अवयवाद्यो हि यथाक्रममवय-
व्याद्याश्रिता एवावतिष्ठन्तेऽविनश्यन्तः' इस प्रकार का पाठ रखा है। परन्तु यह
पाठ ठीक नहीं है । क्योंकि अवयव अवयवी के आश्रित नहीं रहते हैं अपितु
अवयवी अवयव के आश्रित रहता है । आगे जो उदाहरण दिया है 'यथा तन्तु-
नाशे सति पटः' । वह भी इसी बात का समर्थक है कि तन्तु रूप अवयव के
नष्ट हो जाने पर पट रूप अवयवी निराश्रित हो जाता है । अर्थात् पट रूप
अवयवी तन्तु रूप अवयव के आश्रित रहता है । और तन्तु रूप अवयव पट
रूप अवयवी के आश्रित नहीं रहते । इसलिए ओरिएन्टल बुक एजेन्सी पूना
द्वारा प्रकाशित नवीन संस्करण के इस स्थल का पाठ अशुद्ध है। यहाँ 'यथाक्रम'
शब्द ने पाठ संशोधन में कदाचित् कुछ भ्रान्ति पैदा कर दी हो । अयुतसिद्धों
का परिगणन करते हुए ऊपर की पंक्ति में पहिले अवयव को और पीछे अवयवी
को रखा है । 'अवयव अवयविनौ' । उसके बाद अगली पंक्ति में 'यथाक्रम' पद
का प्रयोग है, इसलिए इसको यथाक्रम करने से 'अवयवाद्यो हि यथाक्रम-
मवयव्याद्याश्रिता एवावतिष्ठन्ते' यह पाठ बन गया है । यही कदाचित् पाठ
संशोधक की भ्रान्ति का बीज है । परन्तु जैसा कि आगे के उदाहरण से भी
स्पष्ट है यह पाठ ठीक नहीं है । अतएव हमने यहाँ उस पाठ को संशोधित कर
शुद्ध पाठ को मूल में स्थान दिया है । इस प्रकार अयुत सिद्ध का लक्षण कर
अब समवाय सम्बन्ध का उपपादन करते हैं ।
तन्तु और पट भी अवयव और अवयवी हैं । इसलिए अयुतसिद्ध होने से
३२ तर्कभाषा [ समवायिकारणम्
त्वात् । तुरीपटयोस्तु न समवायोऽयुतसिद्धत्वाभावात् । नहि तुरी पटाश्रितै-
वावतिष्ठते नापि पटस्तुर्याश्रितः । अतस्तयोः सम्बन्धः संयोग एव । तदेवं
तन्तुसमवेतः पटः ।
यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत्समवायिकारणम् । अतस्तन्तुरेव समवायि-
कारणं पटस्य न तु तुर्यादि ।
पटश्च स्वगतरूपादेः समवायिकारणम् । एवं मृत्पिण्डोपि घटस्य
समवायिकारणं, घटश्च स्वगतरूपादेः समवायिकारणम् ।
उनका सम्बन्ध समवाय है । तुरी और पट में अयुतसिद्धत्व का अभाव होने से
उनका समवाय [ सम्बन्ध ] नहीं है । [ तुरी और पट अयुतसिद्ध इस लिए नहीं हैं
कि ] न तुरी पट के आश्रित ही रहती है और न पट तुरी के आश्रित ही रहता
है । इसलिए [ अयुतसिद्ध न होने से ] उन दोनों का सम्बन्ध संयोग ही है । इस
प्रकार [ यह स्पष्ट हो गया कि तन्तु और पट के अयुतसिद्ध होने से ] तन्तु में पट
समवेत [ समवाय सम्बन्ध से रहने वाला ] है ।
जिस में समवेत [ समवाय सम्बन्ध से ] कार्य की उत्पत्ति होती है वह समवायि
कारण [कहलाता] है । इस लिए तन्तु ही पट का समवायि कारण हैतुरी आदि नहीं ।
[ तन्तु और पट अवयव अवयवी हैं, इस लिए तन्तु अवयव, पट रूप अवयवी
का समवायि कारण है यह बात इस उदाहरण से सिद्ध हुई । आगे गुण और
गुणी के सम्बन्ध से दूसरा उदाहरण बताते हैं ] और पट अपने में रहने वाले रूप
आदि [ गुणों ] का समवायि कारण है । इसी प्रकार मिट्टी का पिण्ड घट का
समवायि कारण है और घट अपने में रहने वाले रूपादि [ गुणों ] का समवायि
कारण है ।
यहाँ पट स्वगत रूप का और घट स्वगत रूपादि का समवायि कारण है ।
यह जो गुण गुणी भाव की दृष्टि से समवायि कारण का दूसरा उदाहरण प्रस्तुत
किया है वह केवल दूसरा उदाहरण देने की दृष्टि से ही नहीं दिया गया है अपितु
गुणों के उत्पत्ति क्रम के सम्बन्ध में एक विशेष सिद्धान्त के स्पष्टीकरण के लिए
ही यहां उसका उल्लेख हुआ है । साधारणतः यह प्रतीत होता है कि गुण और
गुणी इन दोनों की उत्पत्ति एक साथ होती है । जिस समय घट उत्पन्न होता है
उसी समय घट के रूपादि गुण भी उत्पन्न होते हैं । इसलिए उनमें कार्य कारण
भाव नहीं हो सकता है । क्योंकि कार्य कारण भाव के लिए पौर्वापर्य आवश्यक
है । जैसा कि 'अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम्' और 'अनन्यथासिद्ध-
नियतपश्चाद्भावित्वं कार्यत्वम्' इन कारण और कार्य के लक्षणों से भी उनका
पौर्वापर्य सूचित होता है । अतः 'गुण और गुणी का समानकालीन जन्म
होने से गुणी का गुणों का समवायि कारण नहीं कहा जा सकता है' । यह
निर्गुणोत्पत्तिः ] प्रमाणनिरूपणम् ३३
ननु यदैव घटादयो जायन्ते तदैव तद्गतरूपादयोऽपि, अतः समान-
कालीनत्वाद् गुणगुणिनोः सव्येतरविषाणवत्कार्यकारणभाव एव नास्ति
पौर्वापर्याभावात् । अतो न समावायिकारणं घटादयः स्वगतरूपादीनाम् ।
कारणविशेषत्वात् समवायिकारणस्य ।
अत्रोच्यते । न गुणगुणिनोः समानकालीनं जन्म, किन्तु द्रव्यं निर्गु-
णमेव प्रथममुत्पद्यते पश्चात् तत्समवेता गुणा उत्पद्यन्ते । समानकालो-
त्पत्तौ तु गुणगुणिनोः समानसामग्रीकत्वादभेदो न स्यात् । कारणभेद-
नियतत्वात्कार्यभेदस्य । तस्मात्प्रथमे क्षणे निर्गुण एव घट उत्पद्यते
गुणेभ्यः पूर्वभावीति भवति गुणानां समवायिकारणम् ।
पूर्वपक्ष उठा कर प्रथम क्षण में निर्गुण घट उत्पन्न होता है और अगले क्षण में
उसमें रूपादि गुण उत्पन्न होते हैं । इस प्रकार गुणी और गुणों की उत्पत्ति में
पौर्वापर्य बन जाता है और गुणी गुण का समवायि कारण होता है इस सिद्धांत-
पक्ष को स्थिर करने के लिए यह दूसरा उदाहरण दिया गया है । पंक्तियों का
अर्थ इस प्रकार है :-
[ प्रश्न ] जब ही घटादि [ गुणी ] उत्पन्न होते हैं । तब ही उनमें रहने वाले
रूपादि [गुण] भी उत्पन्न होते हैं । इसलिए गुण और गुणी के समानकालीन होने
से [ समान काल में उत्पन्न होने वाले ] बायें और दाहिने सींगों के समान उनमें
कार्य कारण भाव ही पौर्वापर्य के अभाव के कारण नहीं हो सकता है । अतएव
घट आदि [ गुणी ] स्वगत रूपादि [ गुणों ] के समवायि कारण नहीं हो सकते ।
[ यह पूर्वपक्ष हुआ ] ।
इसका समाधान करते हैं । गुण और गुणी का समानकालीन जन्म नहीं होता
किन्तु पहिले निर्गुण द्रव्य ही उत्पन्न होता है और उसके बाद उसमें समवाय
सम्बन्ध से रहने वाले गुण उत्पन्न होते हैं। गुण और गुणी की समानकालीन
[ एक साथ ही ] उत्पत्ति [ मानने ] में तो उनकी कारण सामग्री के [ भी ]
समान होने से गुण और गुणी का भेद भी नहीं बनेगा । क्योंकि कार्य का भेद
कारण के भेद के साथ नियत है । [ अर्थात् कार्य में भेद तभी हो सकता है जब
उनके कारण भिन्न हों । गुण और गुणी का समानकालीन जन्म होने पर उनकी
कारण सामग्री भी समान ही होगी उस दशा में रूपादि को गुण और घटादि को
गुणी कहा जाय यह भेद भी नहीं बनेगा । इस लिए गुण और गुणी का समान-
कालीन जन्म मानना उचित नहीं है ] इस लिए प्रथम क्षण में निर्गुण घट ही
उत्पन्न होता है और गुणों से पूर्वभावी होता है इसलिए [ स्वगत रूपादि ] गुणों
का समवायि कारण हो सकता है ।
३ त० भा०
३४ तर्कभाषा [ निर्गुणोत्पत्तिः
तदा कारणभेदोऽप्यस्ति । घटो हि घटं प्रति न कारणमेकस्यैव
पौर्वापर्याभावात् । न हि स एव तमेव प्रति पूर्वभावी पश्चाद्भावी चेति ।
स्वगुणान् प्रति तु पूर्वभावित्वाद् भवति गुणानां समवायिकारणम् ।
नन्वेवं सति प्रथमे क्षणे घटोऽचाक्षुषः स्याद्, अरूपिद्रव्यत्वाद्
वायुवत् । तदेव हि द्रव्यं चाक्षुषं, यन्महत्त्वे सत्युद्भूतरूपवत् ।
तब [ प्रथम क्षण में निर्गुणघट की उत्पत्ति होती है और उसके बाद उस
घट में रूपादि गुण उत्पन्न होते हैं ऐसा मानने पर गुण और गुणी अर्थात् घट
और रूपादि में ] कारण भेद भी [ हो सकता ] है । घट घट के प्रति [ अर्थात्
स्वयं अपने प्रति ] कारण नहीं होता है एक [ उसी घट ] में ही पौर्वापर्य का
अभाव होने से वही [ घट ] उसी [ स्वयं अपने ] के प्रति पूर्व भावी [ कारण ]
और पश्चाद्भावी [ कार्य ] नहीं हो सकता है । अपने [ अर्थात् घट गत रूपादि ]
गुणों के प्रति तो पूर्वभावी होने से गुणों का समवायि कारण हो सकता है ।
[ इस लिए प्रथम क्षण में निर्गुण घट की उत्पत्ति होने के बाद अगले क्षण में
उसमें रूपादि गुण उत्पन्न होते हैं यही सिद्धान्त मानना उचित है । और इस
दशा में घटादि गुणी स्वगत रूपादि गुणों के समवायि कारण हो सकते हैं । ]
इस पर पूर्वपक्षी फिर शंका करता है कि यदि प्रथम क्षण में निर्गुण घट
उत्पन्न होता है इस सिद्धान्त को माना जाय तो उस में दो दोष आ जावेंगे ।
पहिला दोष तो यह होगा कि उस प्रथम क्षणमें घट का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो
सकेगा । क्योंकि चाक्षुष प्रत्यक्ष उसी द्रव्य का हो सकता है जिसमें महत्
परिमाण और उद्भूत रूप ये दो गुण रहते है । प्रथम क्षण का घट क्योंकि
निर्गुण उत्पन्न होता है इस लिए उसमें रूपादि गुण रहते ही नहीं इसलिए रूप
रहित होने से घट का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा । जैसे वायु रूप रहित
द्रव्य है उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं होता । इसी प्रकार प्रथम क्षण का निर्गुण
घट भी रूप रहित है अतः उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा । यह पहिला
दोष निर्गुण उत्पत्ति पक्ष में आता है ।
दूसरा दोष यह होगा कि प्रथम क्षण के घट को द्रव्य नहीं कहा जा सकेगा
क्योंकि 'गुणाश्रयो द्रव्यम्' जो गुण का आश्रय हो, जिसमें गुण रहते हों उसी
को द्रव्य कहते हैं यह द्रव्य का लक्षण है । प्रथम क्षण का घट गुणाश्रय नहीं है
निर्गुण होने से उसमें गुण नहीं रहते इसलिए उसमें द्रव्य का लक्षण न घट
सकने से उसको द्रव्य भी नहीं कहा जा सकता है । इसलिए प्रथम क्षण में निर्गुण
घट उत्पन्न होता है यह नहीं मानना चाहिये । यही पूर्वपक्ष प्रस्तुत करते हैं ।
[ प्रश्न ] अच्छा तो ऐसा [ निर्गुणोत्पत्ति ] होने पर प्रथम क्षण में घट
निर्गुणोत्पत्तिः ] प्रमाणनिरूपणम् ३५
अद्रव्यं च स्याद् गुणाश्रयत्वाभावात् । गुणाश्रयो द्रव्यमिति हि
द्रव्यलक्षणम् ।
सत्यम् । प्रथमे क्षणे घटो यदि चक्षुषा न गृह्यते का नो हानिः । न
हि सगुणोत्पत्तिपक्षेऽपि निमेषावसरे घटो गृह्यते । तेन व्यवस्थितमेतन्नि-
र्गुण एव प्रथमं घट उत्पद्यते । द्वितीयादिक्षणेषु चक्षुषा गृह्यते ।
न च प्रथमे क्षणे गुणाश्रयत्वाभावादद्रव्यत्वापत्तिः । समवायिकारणं
अचाक्षुष हो जायगा [अर्थात् उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा ] वायु के
समान रूप रहित द्रव्य होने से । जो द्रव्य महत् परिमाण और उद्भूत रूप से
युक्त होता है वही चाक्षुष [ प्रत्यक्ष का विषय होता ] है । [ इस प्रकार निर्गुणो-
त्पत्ति पक्ष में प्रथम क्षण में घट का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा यह प्रथम
दोष है । दूसरा दोष आगे कहते हैं ]
[ प्रथम क्षण के निर्गुण घट में ] गुणाश्रयत्व का अभाव होने से [ वह ]
द्रव्य भी नहीं हो सकेगा । [ क्यों कि ] गुण का आश्रय द्रव्य [ होता ] है, यह
द्रव्य का लक्षण है । [प्रथम क्षण के घट के निर्गुण होने से उसमें गुणाश्रयत्व रूप
द्रव्य का लक्षण नहीं घट सकता है अतएव प्रथम क्षण का घट द्रव्य भी नहीं
कहा जा सकता है । ये दोष निर्गुणोत्पत्ति पक्ष में आते हैं । आगे उनका
समाधान करते हैं । ]
[ उत्तर आपका कहना ] ठीक है । [ प्रथम क्षण में घटादि का चाक्षुष
प्रत्यक्ष नहीं होगा । परन्तु ] यदि प्रथम क्षण में चक्षु से घट का ग्रहण नहीं होता
तो इसमें हमारी क्या हानि है । [ आप के ] सगुणोत्पत्ति पक्ष में भी [यदि
प्रथम क्षण में देखने वाले के पलक मारने का ] निमेषावसर [होने पर ] में घट
का ग्रहण नहीं होगा । [ इसलिए यदि प्रथम क्षण में घट का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं
होता तो इसमें कोई हानि नहीं है । अर्थात् प्रथम क्षण में ही घट का प्रत्यक्ष
होना आवश्यक नहीं है । द्वितीय क्षण में रूपादि गुण उत्पन्न हो जाने पर ही
उसका प्रत्यक्ष होगा ] इसलिए यह निश्चित हुआ कि प्रारम्भ में [ प्रथम क्षण ]
में निर्गुण घट ही उत्पन्न होता है और द्वितीयादि क्षणों में [ रूप आदि गुणों के
उत्पन्न हो जाने पर ] चक्षु से गृहीत होता है ।
और न प्रथम क्षण में गुणाश्रय न होने से [घटादि का] अद्रव्यत्व हो सकता
है। [ क्योंकि 'गुणाश्रयो द्रव्यम्' यह द्रव्य का लक्षण नहीं है अपितु हमारे मत में
'समवायि कारणं द्रव्यम्' यह द्रव्य का लक्षण है अतः ] समवायिकारणं द्रव्य
[ होता ] है इस द्रव्य के लक्षण का सम्बन्ध [ प्रथम क्षण के घट में भी ] होने
३६ तर्कभाषा [असमवायिकारणम्
द्रव्यमिति द्रव्यलक्षणयोगात् । योग्यतया गुणाश्रयत्वाच्च । योग्यता च
गुणानामत्यन्ताभावाभावः ।
असमवायिकारणं तदुच्यते यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसा-
मर्थ्यं तदसमवायिकारणम् । यथा तन्तुसंयोगः पटस्यासमवायिकारणम् ।
तन्तुसंयोगस्य गुणस्य, पटसमवायिकारणेषु तन्तुषु गुणिषु, समवेतत्वेन
समवायिकारणे प्रत्यासन्नत्वात्, अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वेन पटं
प्रति कारणत्वाच्च ।
से [ प्रथम क्षण का घट भी द्रव्य लक्षण से युक्त होने से द्रव्य ही है। उसे
अद्रव्य नहीं कहा जा सकता ]
[ यदि आप 'समवायिकारणं द्रव्यम्' इस द्रव्य लक्षण को न मान कर
'गुणाश्रयो द्रव्यम्' इसको ही द्रव्य लक्षण मानना चाहते हैं तो ] योग्यता से
गुणाश्रय होने से भी [ प्रथम क्षण के घट को अद्रव्य नहीं कह सकते हैं । अर्थात्
प्रथम क्षण का घट यद्यपि उस प्रथम क्षण में गुणों का आश्रय नहीं है परन्तु
उसमें गुणाश्रय होने की योग्यता तो उस क्षण में भी विद्यमान है। अगले क्षण
में वह गुणाश्रय हो जायगा इस योग्यता के कारण उसको गुणाश्रय मान कर
भी लक्षण का समन्वय किया जा सकता है । ] यह योग्यता [ का अभिप्राय ]
गुणों के अत्यन्ताभाव का अभाव है ।
अर्थात् घट में गुणों का अत्यन्ताभाव त्रैकालिक अभाव नहीं है। इसलिए
घट में गुणों के अत्यन्ताभाव अर्थात् त्रैकालिक अभाव न होने से वर्तमान एक
क्षण में गुण का अभाव होने पर भी अगले क्षण में गुणोत्पत्ति के योग्य होने
से उसको गुणाश्रय मान कर 'गुणाश्रयो द्रव्यम्' इस द्रव्य लक्षण का भी
समन्वय हो सकता है। इसलिए प्रथम क्षण में निर्गुण घट उत्पन्न होता है और
द्वितीय आदि क्षण में उसमें रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है। अतः गुण
और गुणी का समान कालीन जन्म न होने से घटादि गुणी, स्वगत रूपादि
गुणों के प्रति समवायि कारण हो सकते हैं। यह सिद्ध हुआ ।
आगे असमवायि कारण का लक्षण करते हैं :-
असमवायिकारण उसको कहते हैं । जो समवायिकारण में रहता [प्रत्यासन्न]
हो और [कार्योत्पादन में] जिसकी सामर्थ्य निश्चित हो [अर्थात् जिसमें 'अनन्य-
थासिद्धनियतपूर्वभावित्वम्' यह कारण का लक्षण घटता हो] उसको असमवायि-
कारण कहते हैं। जैसे तन्तु संयोग पट का असमवायि कारण है। तन्तु संयोग गुण
[ है उस ] के पट के समवायिकारण तन्तुओं [ रूप ] गुणियों में समवाय सम्बन्ध
असमवायिकारणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ३७
एवं तन्तुरूपं पटरूपस्य असमवायिकारणम् ।
से विद्यमान होने से [ पट के ] समवायिकारण में प्रत्यासन्न होने और [ पट के
प्रति ] अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्व [ रूप कारण लक्षण से युक्त ] होने से पट
के प्रति कारण होने से । [तन्तुसंयोग पट का असमवायिकारण होता है । क्योंकि
'समवायि कारणे प्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्य च' यह असमवायिकारण का लक्षण
उसमें घट जाता है ]
इसी प्रकार तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण है ।
जैसे गुण और गुणी के असमानकालीन जन्म अथवा निर्गुणोत्पत्ति के
सिद्धान्त के प्रतिपादन करने के विशेष प्रयोजन से समवायिकारण का दूसरा
उदाहरण दिया था । इसी प्रकार असमवायिकारण का यह दूसरा उदाहरण
भी समवायिकारण में प्रत्यासत्ति साक्षात् तथा परम्परया दो प्रकार से मानी
जा सकती है इस सिद्धान्त के स्पष्टीकरण के विशेष प्रयोजन से दिया गया है ।
यहां तन्तुरूप को पटरूप का असमवायिकारण कहा है । इसमें शङ्का यह
होती है कि समवायिकारण में प्रत्यासन्न और अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावी
धर्म को असमवायिकारण कहते हैं, यह असमवायिकारण का लक्षण अभी
किया है । पटरूप के असमवायिकारण को हमें देखना है । पटरूप गुण है अत-
एव उसका समवायिकारण गुणीरूप पट है । इसलिए पटगत कोई धर्म पटरूप
का असमवायिकारण हो सकता है । तन्तुरूप तो तन्तु का गुण होने से तन्तु
में रहता है पट में नहीं । तब तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण कैसे होगा ?
इस शङ्का का उत्तर यह है कि समवायिकारण में जो प्रत्यासत्ति यहां कही
है वह साक्षात् और परम्परया दो प्रकार से हो सकती है । कोई धर्म कार्य के
साथ एक ही अर्थ में रहने से समवायिकारण में प्रत्यासन्न कहा जाता है । जैसे
तन्तुसंयोग पट का असमवायिकारण पहिले दिखाया था । वह पट के समवायि-
कारण तन्तुओं में कार्यभूत पट के साथ साक्षात् एकार्थ समवेत है । अर्थात् पट
समवाय सम्बन्ध से तन्तुओं में रहता है उन्हीं तन्तुओं में तन्तुसंयोगरूप गुण
भी रहता है । इसलिए तन्तुसंयोग साक्षात् कार्यरूप पट के साथ तन्तुरूप एक
अर्थ में समवेत है । उस प्रकार की प्रत्यासत्ति को साक्षात् प्रत्यासत्ति कहते हैं ।
इसी को दूसरे शब्दों में 'कार्यैकार्थप्रत्यासत्ति' अर्थात् कार्य पट के साथ कारण
तन्तुसंयोग की एक अर्थ तन्तु में प्रत्यासत्ति भी कहते हैं ।
दूसरे प्रकार की प्रत्यासत्ति को 'कारणैकार्थप्रत्यासत्ति' अथवा परम्परया
प्रत्यासत्ति भी कहते हैं । जो धर्म कार्य के साथ नहीं अपितु कारण के साथ
३८ तर्कभाषा [ असमवायिकारणम्
ननु पटरूपस्य पटः समवायिकारणं, तेन तद्गतस्यैव कस्यचिद्धर्मस्य-
पटरूपं प्रत्यसमवायिकारणत्वमुचितम् । तस्यैव समवायिकारणप्रत्यासन्न
त्वात् । न तु तन्तुरूपस्य । तस्य समवायिकारणप्रत्यासत्त्यभावात् ।
मैवम् । समवायिकारणसमवायिकारणप्रत्यासन्नस्यापि परम्परया
समवायिकारणप्रत्यासन्नत्वात् ।
एक अर्थ में प्रत्यासन्न हो उसको 'कारणैकार्थप्रत्यासन्न' कहेंगे। जैसे 'तन्तुरूप'
कार्यभूत 'पट-रूप' के साथ नहीं अपितु पट-रूप के कारण पट के साथ एक
अर्थ तन्तु में प्रत्यासन्न है । अर्थात् पटरूप का कारण पट है वह अपने समवा-
यिकारण तन्तु में समवाय सम्बन्ध से रहता है । उसी 'तन्तु' गुणी में 'तन्तु-
रूप' गुण समवाय सम्बन्ध से रहता है इसलिये 'तन्तुरूप' और 'पट' दोनों
तन्तुओं में प्रत्यासन्न हुए। इस प्रकार 'तन्तुरूप' यद्यपि 'पट-रूप' के साथ
एकार्थ समवेत नहीं है परन्तु 'पटरूप' के कारण पट के साथ 'तन्तुस्वरूप'
एकार्थ में समवेत है, इसलिए उसे भी परम्परया या 'कारणैकार्थप्रत्यासत्त्या'
समवायिकारण में प्रत्यासन्न माना जा सकता है। अर्थात् समवायिकारण के
समवायिकारण में प्रत्यासन्न धर्म को भी परम्परया समवायिकारण में प्रत्यासन्न
मान कर 'तन्तुरूप' को 'पटरूप' का असमवायिकारण कहा जा सकता है ।
इसी बात को आगे कहते हैं ।
[ प्रश्न ] पटरूप का समवायिकारण [ तो ] पट है इसलिए उस [ पट ] में
रहने वाले किसी धर्म का ही 'पटरूप' के प्रति असमवायिकारणत्व [ मानना ]
उचित है । [ क्योंकि ] उस [ पटगत धर्म ] का ही समवायिकारण प्रत्यासन्नत्व
[ हो सकता ] है । तन्तुरूप का [ पटरूप के प्रति समवायिकारण प्रत्यासन्नत्व ]
नहीं [ हो सकता है ] उस [ तन्तुरूप ] के [ पटरूप के ] समवायिकारण [ पट ] में
प्रत्यासन्न न होने से [ 'तन्तुरूप' का पटरूप के प्रति असमवायिकारणत्व मानना
उचित नहीं है ]
[ यह पूर्व पक्ष हुआ । आगे उसका उत्तर देते हैं ] :-
यह नहीं [ कहना चाहिए ] उस [ पटरूपादि ] के समवायिकारण [ पट ]
के समवायिकारण [ तन्तु ] में प्रत्यासन्न [ तन्तुरूपादि ] का भी परम्परया [ कार-
णैकार्थ प्रत्यासत्ति से ] समवायिकारण [ में ] प्रत्यासन्नत्व [ अभीष्ट ] होने से
[ तन्तुरूप भी पटरूप के समवायिकारण में प्रत्यासन्न माना जा सकता है। अतः
तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण हो सकता है ] ।
इस प्रकार समवायिकारण और असमवायिकारण के लक्षण कर चुकने के
बाद अब तीसरे निमित्तकारण का लक्षण करते हैं ।
निमित्तकारणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ३६
निमित्तकारणं तदुच्यते। यन्न समवायिकारणं, नाप्यसमवायिकारणम्।
अथ च कारणं तन्निमित्तकारणम्। यथा वेमादिकं पटस्य निमित्तकारणम्,
तदेतद् भावानामेव त्रिविधं कारणम्। अभावस्य तु निमित्तमात्रं,
तस्य क्वचिदप्यसमवायात्। समवायस्य भावद्वयधर्मत्वात्।
तदेतस्य त्रिविधस्य कारणस्य मध्ये यदेव कथमपि सातिशयं तदेव
करणम्। तेन व्यवस्थितमेतल्लक्षणं प्रमाकरणं प्रमाणमिति।
यत्तु, अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणमिति लक्षणम्, तन्न, एकस्मिन्नेव घटे
घटोऽयं घटोऽयमिति धारावाहिकज्ञानानां गृहीतग्राहिणामप्रामाण्य-
प्रसङ्गात्।
निमित्तकारण उसको कहते हैं। जो न समवायिकारण है और न असम-
वायिकारण है। फिर भी जो कारण है [ अर्थात् जिसमें कारण का लक्षण
'अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वम्' घट जाता है ] उसको निमित्तकारण कहते हैं।
जैसे वेमा आदि पट के निमित्तकारण हैं।
यह तीन प्रकार के [ समवायि, असमवायि और निमित्त ] कारण, भाव
[ अर्थात् सत् ] पदार्थों के ही होते हैं। [ अर्थात् अभाव के नहीं ] अभाव का
तो केवल [ एक ] निमित्त कारण ही होता है। उस [ अभाव ] का कहीं भी
[ किसी भी पदार्थ के साथ ] समवाय सम्बन्ध न होने से [ कोई पदार्थ उसका
समवायिकारण नहीं हो सकता है। और जब समवायिकारण ही नहीं तब असम-
वायिकारण भी नहीं हो सकता है। इसलिए अभाव का केवल निमित्तकारण ही
होता है ]। समवाय के दो भाव पदार्थों का ही धर्म होने से। [अभाव का किसी
से समवाय सम्बन्ध नहीं हो सकता है। और उसके अभाव में समवायि अथवा
असमवायिकारण नहीं बन सकने से अभाव का केवल एक निमित्तकारण ही
होता है। त्रिविध कारण केवल भाव पदार्थों के होते हैं। अभाव के नहीं ]।
इसलिए इस त्रिविध कारण में से जो [ कारण ] किसी प्रकार से भी [अन्यों
की अपेक्षा ] अधिक उत्कृष्ट [ कारण ] है, वही करण [ कहलाता ] है।
इसलिए [ अब प्रमा और करण दोनों पदों की पूर्ण व्याख्या हो जाने से ]
प्रमा का करण प्रमाण [ होता ] है यह [ प्रमाण का ] लक्षण निश्चित हो गया।
और जो [ यह भट्टमतानुयायी मीमांसकों तथा दिङ्नाग आदि बौद्ध आचार्यों
ने] अनधिगत अर्थात् अज्ञात अर्थ के ज्ञापक को प्रमाण कहते हैं यह लक्षण किया
है वह ठीक नहीं है। एक ही घट में [ निरन्तर कई क्षण तक ] यह घड़ा है,
यह घड़ा है इस प्रकार ज्ञात घट का ज्ञान कराने वाली धारावाहिक [ द्वितीय
४० तर्कभाषा [ धारावाहिकम्
न चान्यान्यक्षणविशिष्टविषयीकरणादनधिगतार्थगन्तृता। प्रत्यक्षेण
सूक्ष्मकालभेदानाकलनात्। कालभेदग्रहे हि क्रियादिसंयोगान्तानां
चतुर्णां यौगपद्याभिमानो न स्यात्। क्रिया, क्रियातो विभागो, विभागात्
पूर्वसंयोगनाशः, ततश्चोत्तरदेशसंयोगोत्पत्तिरिति।
आदि ] बुद्धियों के [ गृहीतग्राही होने से ] अप्रामाण्य प्राप्त होने से [अनधिगतार्थ-
गन्तृप्रमाणं यह प्रमाण का लक्षण ठीक नहीं है ]।
[ यदि मीमांसक आदि यह कहें कि प्रथम द्वितीय आदि ] अलग अलग क्षण
विशिष्ट घट का ग्रहण होने से [ द्वितीयादि ज्ञानों में भी ] अनधिगतार्थगन्तृता हो
सकती है। [इसलिए धारावाहिक बुद्धिस्थल में अप्रामाण्य नहीं होगा ] यह भी,
प्रत्यक्ष से सूक्ष्म [ क्षण रूप ] कालभेद के ग्रहण न होने से, ठीक नहीं है।
[ प्रत्यक्ष से क्षणरूप सूक्ष्म ] कालभेद का ग्रहण होने पर तो [ किसी वस्तु के
गिरने या एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर जाने में होने वाली ] क्रिया से
लेकर संयोग पर्यन्त चारों [ व्यापारों ] में यौगपद्य [ एक साथ होने ] की प्रतीति
न हो। [जब एक वस्तु एक स्थान को छोड़ कर दूसरी जगह जाती है तब उसके
दूसरी जगह पहुंचने तक चार व्यापार होते हैं ] १. क्रिया, २. क्रिया से विभाग,
३. विभाग से पूर्वसंयोग नाश, और ४ उत्तरदेश संयोग की उत्पत्ति । [परन्तु यह
चारो व्यापार अलग अलग अनुभव में नहीं आते क्योंकि वह अत्यन्त शीघ्रता से
हो जाते हैं। इसलिए सूक्ष्म कालभेद का प्रत्यक्ष से ग्रहण सम्भव न होने से धारा-
वाहिक बुद्धिस्थल में क्षण विशिष्ट घट का ग्रहण नहीं माना जा सकता है। अतः
द्वितीयादि ज्ञानों के गृहीतग्राही होने से 'अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्' यह लक्षण
उसमें अव्याप्त होगा। अतः यह ठीक नहीं है ]
धारावाहिक ज्ञान के विषय में न्याय का मत—
धारावाहिक बुद्धि के प्रामाण्य के विषय में न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध,
जैन आदि अनेक दर्शनों में विचार किया गया है। अधिकांश लोग धारावाहिक
बुद्धिस्थल में द्वितीयादि क्षणों में होने वाले 'अयं घटः' इत्यादि ज्ञान के प्रामाण्य
का ही प्रतिपादन करते हैं परन्तु उनके प्रतिपादन की शैली भिन्न भिन्न है।
इसके प्रामाण्य सिद्ध करने की चिन्ता विशेष रूप से उनको करनी पड़ती है
जो 'अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्' इस प्रकार प्रमाण का लक्षण करते हैं। न्याय
वैशेषिक आदि में प्रमाण के लक्षण में अनधिगतत्व का कोई उल्लेख नहीं किया
गया है इसलिए उनके यहाँ अधिगत विषयक ज्ञान भी प्रमाण ही है। इसीलिए
वाचस्पतिमिश्र, श्रीधराचार्य, जयन्तभट्ट, उदयनाचार्य आदि न्याय और वैशेषिक
धारावाहिकम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४१
के आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में धारावाहिक ज्ञानों को अधिगतार्थविषयक कह
कर भी प्रमाण माना है। 'न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका' में वाचस्पतिमिश्र ने
लिखा है :-
अनधिगतार्थगन्तृत्वं च धारावाहिकविज्ञानानामधिगतार्थगोचराणां लोक-
सिद्धप्रमाणभावानां प्रामाण्यं विहन्तीति नाद्रियामहे। न च कालभेदेनानधिगत
गोचरत्वं धारावाहिकानामिति युक्तम्। परमसूक्ष्माणां कालकलादिभेदानां पिशित-
लोचनैरस्मादृशैरनाकलनात् ।
न चाद्येनेव विज्ञानेनोपदर्शितत्वादर्थस्य, प्रवर्तित्वात्पुरुषस्य, प्रापितत्वाच्चोत्त-
रेषामप्रामाण्यमेव ज्ञानानामिति वाच्यम्। न हि विज्ञानस्यार्थप्रापणं प्रवर्त्तनादन्यद्,
न च प्रवर्तनमर्थप्रदर्शनादन्यत् । तस्मादर्थप्रदर्शनमात्रव्यापारमेव ज्ञानप्रवर्तकं
प्रापकं च। प्रदर्शनं च पूर्ववदुत्तरेषामपि विज्ञानानामभिन्नमिति कथं पूर्वमेव
प्रमाणं नोत्तराण्यपि ।
इस प्रकार न्याय और वैशेषिक के आचार्यों ने धारावाहिक बुद्धिस्थल में
उत्तर विज्ञानों का प्रामाण्य ही माना है और उसमें सूक्ष्मकालभेद का ग्रहण
नहीं माना है। जैसा कि यहां तर्कभाषाकार ने दिखाया है। तर्कभाषा का
प्रकृत लेख न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका से उद्धृत पंक्तियों के प्रारम्भिक एक अनु-
च्छेद के लेख से मिलता हुआ ही है।
धारावाहिकज्ञान के विषय में मीमांसकों का मत—
मीमांसकों ने भी इस विषय पर विचार किया है। मीमांसकों के प्रभाकर
तथा कुमारिलभट्ट दोनों का अनुगमन करने वाली परम्पराओं में धारावाहिक
ज्ञानों का प्रामाण्य स्वीकार किया है परन्तु उनके उपपादन का प्रकार भिन्न
भिन्न हैं। प्रभाकर मतानुयायी शालिकनाथ आदि नैयायिकों के समान सूक्ष्म
काल भेद का समावेश किए बिना ही अनुभूति मात्र होने से उनको प्रमाण
मानते हैं। परन्तु कुमारिलभट्ट के अनुयायी पार्थसारथि मिश्र आदि सूक्ष्म काल-
भेद का ग्रहण मान कर उस प्रामाण्य को स्थापित करते हैं। प्रभाकर मतानु-
यायी शालिकनाथ ने अपनी 'प्रकरणपञ्चिका' में इस विषय का प्रतिपादन करते
हुए लिखा है—
'धारावाहिकेषु तर्हि उत्तरविज्ञानानि स्मृतिप्रमोषादविशिष्टानि कथं प्रमाणानि ?
तत्राह, अन्योन्यनिरपेक्षा धारावाहिकबुद्धयः। व्याप्रीयमाणे हि पूर्वविज्ञानकारण-
१ न्यायवार्तिक तात्पर्य टी० पृ० २१, कन्दली पृ० ६१, न्यायमञ्जरी पृ०
२२, न्यायकुसुमाञ्जलि ४, १ ।
४२ तर्कभाषा [धारावाहिकम्
कलाप उत्तरेषामप्युत्पत्तिरिति न प्रतीतित उत्पत्तितो वा धारावाहिकविज्ञानानि
परस्परस्यातिशेरत इति युक्ता सर्वेषामपि प्रमाणता ।'१
अर्थात् धारावाहिक बुद्धिस्थल में सब ज्ञान परस्पर निरपेक्ष होते हैं । पूर्व
विज्ञान की कारणसामग्री के व्यापार से ही उत्तर विज्ञानों की भी उत्पत्ति हो
जाती है । इसलिये इन सब विज्ञानों में न उत्पत्तिकृत और न प्रतीतिकृत कोई
विशेषता है अतएव सबका ही प्रामाण्य है ।
इसके विपरीत कुमारिल भट्ट के अनुयायी 'शास्त्रदीपिका'-कार पार्थसारथि
मिश्र आदि सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण मान कर ही उत्तर विज्ञानों के प्रामाण्य
को स्थापित करते हैं । उसका कारण यह है कि उन्होंने अपने प्रमाणलक्षण में
'अपूर्व' पद का निवेश कर 'अनधिगतार्थगन्तृता' को ही प्रमाण का लक्षण माना
है । इसलिए धारावाहिक बुद्धि के प्रामाण्य के लिए उन्हें सूक्ष्म कालभेद का भी
ग्रहण मानना पड़ा है । पार्थसारथि मिश्र ने अपनी 'शास्त्रदीपिका' में इस
विषय का प्रतिपादन करते हुए लिखा है :—
'नन्वेवं धारावाहिकेषूत्तरेषां पूर्वगृहीतार्थविषयत्वादप्रामाण्यं स्यात् तस्माद
नुभूतिः प्रमाणमिति प्रमाणलक्षणम् ।...तस्मात् यथार्थमगृहीतग्राहि ज्ञानं प्रम-
णमिति वक्तव्यम् । धारावाहिकेष्वप्युत्तरेषां कालान्तरसम्बन्धस्यागृहीतस्या
ग्रहणाद् युक्तं प्रामाण्यम् । सन्नपि कालभेदोऽतिसूक्ष्मत्वान्न परामृश्यत इति चेत्,
अहो सूक्ष्मदर्शी देवानां प्रियः । यो हि समानविषयया विज्ञानधारया
चिरमवस्थायोपरतः सोऽप्यनन्तरक्षणसम्बन्धितयार्थं स्मरति, तथाहि किमत्र घटो-
ऽवस्थित इति पृष्टः कथयति, अस्मिन् क्षणे मयोपलब्ध इति । तथा प्रातरारभ्यै-
तावत्कालं मयोपलब्ध इति । कालभेदे त्वगृहीते कथमेवं वदेत् । तस्मादस्ति
कालभेदस्य परामर्शः तदाधिक्याच्च सिद्धमुत्तरेषां प्रामाण्यम्² ।
अर्थात् क्या यहां घड़ा था या है इस प्रकार का प्रश्न करने पर, अभी इसी
क्षण मैंने देखा था । अथवा सबेरे से अब तक तो मैंने देखा था । इस प्रकार
का उत्तर दिया जाता है । यह उत्तर बिना कालभेद के ग्रहण के कैसे बनेगा ।
इसलिये कालभेद का ग्रहण होता है यह मानना ही चाहिए । और उसके मान
लेने पर उत्तर विज्ञानों में उस काल भेद के आधिक्य से अगृहीतग्राहित्व बन
जावेगा । इसलिए उनका प्रामाण्य सिद्ध ही है । इस प्रकार कुमारिलभट्ट के
अनुयायी पार्थसारथि मिश्र सूक्ष्म कालभेद के ग्रहण का उपपादन कर धारा-
वाहिक बुद्धि के प्रामाण्य को सिद्ध करते हैं ।
१ प्रकरणपञ्जिका पृष्ठ ४२, । बृहती पृष्ठ १०३ ।
२ शास्त्रदीपिका पृष्ठ १२४, १२६ ।
धारावाहिकम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४३
धारावाहिक ज्ञान के विषय में बौद्धों का मत—
बौद्धपरम्परा में आचार्य दिङ्नाग ने 'अनधिगतार्थगन्तृता' को प्रमाण
लक्षण में समावेश करने का प्रयत्न किया है। प्रमाणसमुच्चय की टीका में,
पृष्ठ ११ पर :—
'अज्ञातार्थज्ञापकं प्रमाणम् इति प्रमाणसामान्यलक्षणम्' ।
इस प्रकार प्रमाण का लक्षण किया गया है। अर्थात् अगृहीतग्राही ज्ञान
ही प्रमाण है। गृहीतग्राही ज्ञान के विषय में धर्मोत्तराचार्य ने लिखा है :—
'अतएव अनधिगतविषयं प्रमाणम् । येनैव हि ज्ञानेन प्रथममधिगतोऽर्थः
तेनैव प्रवर्तितः पुरुषः प्रापितश्चार्थः । तत्रैवार्थे किमन्येन ज्ञानेन अधिकं कार्यम् ।
ततोऽधिगतविषयमप्रमाणम् ।'
अर्थात् धर्मोत्तराचार्य के मत में अधिगत विषयक ज्ञान का अप्रामाण्य ही
अभीष्ट है । परन्तु इसके विपरीत हेतुबिन्दु की टीका में 'अर्चट' ने धारावाहिक
ज्ञानों में से योगियों के धारावाही ज्ञान में भट्ट मीमांसकों के अनुसार सूक्ष्म
कालभेद का ग्रहण मान कर उसको प्रमाण माना है और लौकिक पुरुषों के
धारावाहिक ज्ञान में न्याय के अनुसार सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण संभव न होने
से उसको अप्रमाण कहा है। यहाँ न्याय का साम्य केवल इतने अंश में है कि
सूक्ष्म कालभेद का लौकिक प्रत्यक्ष से ग्रहण नहीं हो सकता है। शेष धारा-
वाहिक ज्ञान का अप्रमाण होना इस अंश में न्याय के साथ समानता नहीं है।
क्योंकि न्याय तो धारावाहिक ज्ञान को प्रमाण ही मानता है। न्याय के प्रमाण
लक्षण में अज्ञातार्थज्ञापकत्व अभीष्ट नहीं है। बौद्धों ने 'अज्ञातार्थज्ञापकं
प्रमाणम्' यह प्रमाण का सामान्य लक्षण माना है अतएव उनके मत में
धारावाहिक बुद्धि का प्रामाण्य सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण होने पर ही सम्भव
है। और वह काल भेद योगिप्रत्यक्ष में तो गृहीत हो सकता है साधारण
लौकिक प्रत्यक्ष में नहीं। इसलिए योगि-प्रत्यक्ष में धारावाहिक ज्ञानों का
प्रामाण्य है और लौकिक धारावाहिक ज्ञानों का अप्रामाण्य है।
धारावाहिक ज्ञान के विषय में जैनों का मत—
जैनदर्शन की परम्परा में दिगम्बर परम्परा के अनुसार धारावाहिक ज्ञान
उसी दशा में प्रमाण माने जा सकते हैं जब क्षणभेदादि के ज्ञानयुक्त विशिष्ट
प्रमा के जनक हों अन्यथा अप्रमाण ही हैं। इस प्रकार इस मत में भी बौद्ध
आचार्य 'अर्चट' के समान धारावाहिक ज्ञान का प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों,
१ प्रमाणसमुच्चय पृ० ११ । २ न्यायबिन्दु टीका पृष्ठ ३ ।
४४ तर्कभाषा [धारावाहिकम्
ननु प्रमायाः कारणानि बहूनि सन्ति प्रमातृप्रमेयादीनि । तान्यपि
किं करणानि उत नेति ?
प्रकार-भेद से, अभिप्रेत हैं। योगिप्रत्यक्षादि में कालभेद का ग्रहण संभव होने
से उनका धारावाहिक ज्ञान भी प्रमाण है। और लौकिक प्रत्यक्ष में कालभेद
का ग्रहण सम्भव न होने से लौकिक धारावाहिकज्ञान प्रमाण नहीं है।
इसके विपरीत श्वेताम्बर सम्प्रदाय की परंपरा में प्रत्यक्ष के लक्षण में
अपूर्व या अनधिगत आदि पदों का समावेश नहीं किया गया है इसलिए वह
धारावाहिक ज्ञान को, और उसी की तरह स्मृति को भी प्रमाण मानने के
पक्ष में हैं। क्योंकि उनके मत से गृहीतग्राहित्व प्रामाण्य का विघातक नहीं है।
हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस विषय को इस प्रकार सङ्कलित किया है-
धारावाहिकज्ञानानां गृहीतग्राहिणामपि ।
यथार्थत्वे मतं तेषां प्रामाण्यं गौतमे नये ॥
सूक्ष्मकालकलायोगादर्थभेदं प्रकल्प्य च ।
तस्यागृहीतग्राहित्वात् प्रामाण्यं भट्टसम्मतम् ॥
क्षणभेदेऽर्थभेदस्य कल्पनास्मिन् मते तु या ।
बौद्धानां क्षणवादस्य छायां किञ्चावलम्बते ॥
सूक्ष्मकालकलाभानं विना प्राभाकरैस्तथा ।
अनुभूतिमात्रादेव प्रामाण्यं तस्य सम्मतम् ॥
प्रमाणं योगिनामेवाप्रमाणमन्यदेव च ।
हेतुबिन्दोस्तु टीकायामर्चटो बौद्ध अब्रवीत् ॥
धर्मोत्तरश्च टीकायां न्यायबिन्दोस्तथैव च ।
अप्रामाण्यं परो बौद्धो लिलेखाधिगते तथा ॥
क्षणभेदादिवैशिष्ट्याद् योगजे च दिगम्बराः ।
प्रामाण्यमन्यथात्वस्याप्रामाण्यं सम्प्रचक्षते ॥
श्वेताम्बरास्तु सर्वेऽपि तत्र प्रामाण्यवादिनः ।
तेनानधिगतं नैव लक्षणे तैर्निवेशितम् ॥
बौद्धाः स्मृतेर्विकल्पस्य स्मृतेर्मीमांसकास्तथा ।
व्यावृत्तये प्रमाणस्यागृहीतग्राहितां जगुः१ ॥
[ प्रश्न ] प्रमाता प्रमेय आदि प्रमा के कारण तो बहुत से हैं। वे सब भी
[ प्रमा के ] 'करण' होते हैं अथवा नहीं ?
१ दर्शनमीमांसा अ० ३ ।
प्रमाकरणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४५
उच्यते। सत्यपि प्रमातरि प्रमेये च, प्रमानुत्पत्तेरिन्द्रियसंयोगादौ
सति, अविलम्बेन प्रमोत्पत्तेरत इन्द्रियसंयोगादिरेव करणम्। प्रमायाः
साधकत्वाविशेषेऽप्यनेनैवोत्कर्षेणास्य प्रमात्रादिभ्योऽतिशयितत्वाद्-
तिशयितं साधकं साधकतमं तदेव करणमित्युक्तम्। अत इन्द्रियसंयोगा-
दिरेव प्रमाकरणत्वात् प्रमाणं न प्रमात्रादि।
तानि च प्रमाणानि चत्वारि। तथा च न्यायसूत्रम् :—
‘प्रत्यक्षानुमानोपमानशब्दाः प्रमाणानि¹।
इति।
[ उत्तर ] कहते हैं। प्रमाता और प्रमेय के होने पर भी [ इन्द्रिय सन्निकर्ष
के बिना ] प्रमा की उत्पत्ति न होने से, और इन्द्रिय संयोगादि के होने पर
अविलम्ब प्रमा की उत्पत्ति होती है इसलिए इन्द्रिय संयोगादि ही [ प्रमा का ]
करण है। [प्रमाता प्रमेय और प्रमाण तीनों में] प्रमा के साधकत्व में [समानता
होने पर भी या ] भेद न होने पर भी इसी उत्कर्ष के कारण [ कि इन्द्रिय संयोग
के होने पर अविलम्ब प्रमा उत्पन्न हो जाती है ] इस [ इन्द्रिय संयोगादि ] का
प्रमाता आदि की अपेक्षा अतिशय होने से और अतिशय युक्त साधन के ही
साधकतम होने से वही करण कहा जाता है। इसलिए प्रमा का करण होने से
इन्द्रिय संयोगादि ही प्रमाण कहा जाता है। प्रमाता आदि नहीं।
और वह प्रमाण चार [ प्रकार का ] है जैसा कि न्यायसूत्र [ में कहा ] है
प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द [ चारों ] प्रमाण हैं।
इस प्रकार प्रमाण के सामान्य लक्षण के प्रसङ्ग में १ प्रमा का लक्षण,
२ करण का लक्षण, ३ कारण का लक्षण, ४ अन्यों के कारण लक्षण का खंडन,
५ कारण के त्रिविध भेद, ६ समवायिकारण असमवायिकारण निमित्तकारण
के लक्षण, ७ समवाय और संयोग सम्बन्ध का निरूपण, ८ निर्गुणोत्पत्ति का
निरूपण, और ९ धारावाहिक ज्ञान के प्रामाण्य का निरूपण यह सब इस
प्रसक्तानुप्रसक्त रूप से ग्रन्थकार ने इस प्रकरण में दिखाने का प्रयत्न किया है।
अब आगे प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों में से एक-एक को लेकर उसका निरूपण
करेंगे। उनमें सबसे पहिले प्रत्यक्ष प्रमाण का निरूपण प्रारम्भ करते हैं।
१ न्यायसूत्र १, १, ३।
४६ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षम्
प्रत्यक्षम्
किं पुनः प्रत्यक्षम् ?
साक्षात्कारिप्रमाकरणं प्रत्यक्षम् । साक्षात्कारिणी च प्रमा सैवोच्यते
या इन्द्रियजा । सा च द्विधा सविकल्पकनिर्विकल्पकभेदात् । तस्याः करणं
त्रिविधम् । कदाचिद् इन्द्रियं, कदाचित् इन्द्रियार्थसन्निकर्षः, कदाचिज् ज्ञानम् ।
[ प्रश्न ] फिर प्रत्यक्ष किसको कहते हैं ?
[ उत्तर ] साक्षात्कारिणी प्रमा के करण को प्रत्यक्ष कहते हैं । और साक्षा-
त्कारिणी प्रमा उसको ही कहते हैं जो इन्द्रिय जन्य [ प्रमा ] होती है । वह दो
प्रकार की है [एक] सविकल्पक और [दूसरी] निर्विकल्पक भेद से । उसके करण
तीन प्रकार के हैं । १ कभी इन्द्रिय २ कभी इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष, और
कभी ( निर्विकल्पक ) ज्ञान ।
'प्रत्यक्ष' शब्द का प्रयोग मुख्यतः, साक्षात्कारिणी प्रमा के 'करण' के लिए
होना चाहिए । परन्तु उस करण से उत्पन्न होने वाली प्रमा जो उस प्रमाण का
फल है वह भी 'प्रत्यक्ष' नाम से व्यवहार में कही जाती है । अन्य प्रमाणों में
तो फल और करण में अलग-अलग शब्द प्रयुक्त होते हैं । जैसे अनुमान प्रमाण
के फल के लिए अनुमिति, उपमान प्रमाण के फल के लिए उपमिति, शब्द
प्रमाण के फल के लिए शाब्दबोध, शब्दों का प्रयोग प्रायः होता है । इसलिए
उनमें 'प्रमाण' और 'प्रमा' का व्यवहार भिन्न-भिन्न शब्दों से होता है । परन्तु
प्रत्यक्ष स्थल में 'प्रमाण' और 'प्रमा' दोनों के लिए ही प्रत्यक्ष पद का प्रयोग
होता है । इसलिए यथास्थान उसका उचित अर्थ ग्रहण करना चाहिए ।
प्रत्यक्ष ज्ञान के दो भेद किए हैं एक 'सविकल्पक' और दूसरा 'निर्विक-
ल्पक' । 'नामजात्यादियोजनासहितं सविकल्पकम्' अर्थात् जिसमें वस्तु के स्वरूप
की प्रतीति के साथ उसके नाम जाति आदि का भी भान होता है उसको
सविकल्पक कहते हैं । जैसे घटः पटः आदि की प्रतीति के साथ उनके नाम
जात्यादि का भान होने से, साधारणतः व्यवहार में आने वाले सभी ज्ञान सवि-
कल्पक के उदाहरण हैं । परन्तु जहां केवल वस्तु का स्वरूप प्रतीत होता है
उसके नाम जाति आदि की प्रतीति नहीं होती उसको निर्विकल्पक ज्ञान कहते
हैं । साधारणतः हमारे सभी व्यवहार में आने वाले ज्ञान सविकल्पक ही होते
हैं । इसलिए हम निर्विकल्पक ज्ञान की कल्पना नहीं कर पाते हैं । इसलिए
निर्विकल्पक ज्ञान का उदाहरण विशेष रूप से बालक तथा गूंगे आदि पुरुषों
के ज्ञान को बताया गया है ॥
प्रत्यक्षम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४७
'बालमूकादिविज्ञानसदृशं निर्विकल्पकम्' ।
जैसे बालक एक घड़ी को देखता है तो उसको भी घड़ी के स्वरूप का
ज्ञान उसी प्रकार का होता है जिस प्रकार बड़े व्यक्ति को। जहाँ एक वस्तु के
स्वरूपज्ञान का सम्बन्ध है बड़े और अत्यन्त अबोध बालक के ज्ञान में कोई
अंतर नहीं है। अर्थात् अर्थ के ग्रहण काल में दोनों का ज्ञान एकसा ही होता
है। परन्तु बड़ा व्यक्ति उसके नाम जाति आदि को भी जानता है अतएव
व्यवहार काल में वह उसके नाम जाति का उपयोग करता है। उस अवस्था में
उसका वह ज्ञान सविकल्पक हो जाता है। बालक उसके नाम जाति आदि से
अनभिज्ञ है इसलिए वह नाम आदि से उसका व्यवहार नहीं कर सकता है।
इस प्रकार बालक और प्रौढ़ पुरुष के ज्ञान में अर्थज्ञानकाल में कोई अंतर नहीं
है अपितु व्यवहारकाल में उन दोनों में अन्तर हो जाता है। इस प्रकार बालक
और मूकादि पुरुषों का ज्ञान निर्विकल्पक और अन्य प्रौढ़ पुरुषों का ज्ञान
सविकल्पक ज्ञान है। अर्थ के ग्रहण काल में प्रौढ़ पुरुषों को भी बालक
के ज्ञान के समान नाम जात्यादि रहित निर्विकल्पक ज्ञान ही होता है।
परन्तु 'एकसम्बन्धिज्ञानमपरसम्बन्धिस्मारकम्' अर्थात् सम्बन्धियों में किसी एक
का ज्ञान तुरन्त ही दूसरे सम्बन्धी का स्मरण करा देता है इस नियम के
अनुसार प्रौढ़ पुरुष को अर्थ का स्वरूप ज्ञान होते ही अत्यन्त शीघ्रता से
उसके नाम जात्यादि का स्मरण हो जाता है। इसलिए उसका ज्ञान तुरन्त
सविकल्पक रूप में परिवर्तित हो जाता है।
इस ज्ञान के कारण तीन प्रकार के बताये हैं। एक इन्द्रिय, दूसरा
इन्द्रियार्थ सन्निकर्ष और तीसरा ज्ञान अर्थात् निर्विकल्पक ज्ञान। इन तीनों के
आगे चौथे सविकल्पक ज्ञान और पांचवें हानोपादानोपेक्षाबुद्धि इन दो फलों को
और जोड़ लेने से पाँच कड़ी की एक शृङ्खला बन जाती है और उस से त्रिविध
करण का स्पष्टीकरण बहुत अच्छे और सरल ढंग से हो जाता है। इन पाँचों
में १ करण, २ अवान्तर व्यापार और ३ फल इन तीन का समावेश होता है।
इन पाँच की श्रृंखला में से यदि प्रथम को करण माना जाय तो दूसरे को
अवान्तर व्यापार और तीसरे को फल मानना चाहिए। इसी प्रकार यदि
दूसरे को करण माना जाय तो तीसरे को अवान्तर व्यापार और चौथे को
फल कहना चाहिए इसी प्रकार यदि तीसरे को करण मानेंगे तो चौथे को
अवान्तर व्यापार और पाँचवें को उसका फल कहना होगा। इस प्रक्रिया को
ध्यान में रख लेने से त्रिविध करणों को सरलता से समझा जा सकेगा। और
उनकी व्याख्या भी स्पष्ट हो जावेगी।
जब संख्या एक अर्थात् इंद्रिय को करण-मानेंगे तब तीसरा अर्थात् निर्वि-
४८ तर्कभाषा [ प्रत्यक्षम्
कदा पुनरिन्द्रियं करणम् ? यदा निर्विकल्परूपा प्रमा फलम् । तथा
हि, आत्मा मनसा संयुज्यते, मन इन्द्रियेण, इन्द्रियमर्थेन । इन्द्रियाणां
वस्तुप्राप्यप्रकाशकारित्वनियमात् । ततोऽर्थसन्निकृष्टेनेन्द्रियेण निर्विकल्पकं
नामजात्यादियोजनाहीनं वस्तुमात्रावगाहि किञ्चिदिदमिति ज्ञानं जन्यते ।
तस्य ज्ञानस्येन्द्रियं करणं, छिदाया इवं परशुः । इन्द्रियार्थसन्निकर्षोऽवा-
न्तरव्यापारः छिदाकरणस्य परशोरिव दारुसंयोगः । निर्विकल्पकं ज्ञानं
फलं, परशोरिव छिदा ।
कल्पक ज्ञान उसका फल और बीच का दूसरा अर्थात् इन्द्रियार्थसन्निकर्ष
अवान्तर व्यापार होगा । अर्थात् इन्द्रिय को कब करण कहा जायगा जब
निर्विकल्पक ज्ञान को फल और इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को अवान्तर व्यापार माना
जाय । इसी प्रकार जब दूसरी संख्या के इन्द्रियार्थसन्निकर्ष को करण माना
जायगा तब तीसरी संख्या के निर्विकल्पक ज्ञान को अवान्तर व्यापार और चौथी
संख्या के सविकल्पक ज्ञान को फल कहा जायगा । इसी प्रकार जब तीसरी
संख्या के निर्विकल्पक ज्ञान को करण कहा जायगा तब चौथी संख्या का सवि-
कल्पक ज्ञान अवान्तर व्यापार और पाँचवीं संख्या की हानोपादानोपेक्षाबुद्धि
फल होगी । इसी पद्धति से आगे तीन प्रकार के करणों की व्याख्या कहते हैं ।
[ प्रश्न ] फिर इन्द्रिय कब करण होती है ?
[ उत्तर ] जब [ तृतीय संख्या वाला ] निर्विकल्पक [ ज्ञान ] रूप प्रमा फल
होती है । जैसे कि [पहिले १] आत्मा का मन के साथ संयोग होता है [फिर २]
मन का इन्द्रिय के साथ [ ३ ] इन्द्रिय अर्थ के साथ [ संयुक्त होती है ] इन्द्रियों
के वस्तु को प्राप्त करके [ अर्थात् वस्तु से सम्बद्ध होकर ] ही अर्थ को प्रकाशित
[ अर्थात् पदार्थ का ज्ञान करा सकती है ऐसा ] करने का नियम होने से ।
तब [ अर्थात् इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष होने के बाद ] अर्थ से संयुक्त
इन्द्रिय के द्वारा नाम जाति आदि की योजना से रहित वस्तु [ के स्वरूप ] मात्र
का ग्रहण करने वाला यह कुछ [नाम जात्यादि रहित सी वस्तु] है इस प्रकार का
निर्विकल्पक ज्ञान उत्पन्न होता है। उस [नाम जात्यादि योजना रहित निर्विकल्पक]
ज्ञान का करण इन्द्रिय होती है । जैसे छेदन [ अर्थात् लकड़ी आदि के काटने
की ] क्रिया का [ करण ] फरसा [ होता है ] २ इन्द्रिय और अर्थ का सन्निकर्ष
अवान्तर व्यापार होता है जैसे काटने के साधनभूत फरसे का [ लकड़ी के
काटने में ] लकड़ी [ दारु ] के साथ संयोग [ अवान्तर व्यापार होता है ]
[ और ३ संख्या का ] निर्विकल्पक ज्ञान फल [ होता है ] जैसे फरसे [ रूप
करण का फरसा और लकड़ी के संयोग रूप अवान्तर व्यापार द्वारा ] का [ फल ]
कटना [ होता है ] ।