तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअसमवायिकारणम् ] प्रमाणनिरूपणम् ३७
एवं तन्तुरूपं पटरूपस्य असमवायिकारणम् ।
से विद्यमान होने से [ पट के ] समवायिकारण में प्रत्यासन्न होने और [ पट के
प्रति ] अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्व [ रूप कारण लक्षण से युक्त ] होने से पट
के प्रति कारण होने से । [तन्तुसंयोग पट का असमवायिकारण होता है । क्योंकि
'समवायि कारणे प्रत्यासन्नमवधृतसामर्थ्य च' यह असमवायिकारण का लक्षण
उसमें घट जाता है ]
इसी प्रकार तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण है ।
जैसे गुण और गुणी के असमानकालीन जन्म अथवा निर्गुणोत्पत्ति के
सिद्धान्त के प्रतिपादन करने के विशेष प्रयोजन से समवायिकारण का दूसरा
उदाहरण दिया था । इसी प्रकार असमवायिकारण का यह दूसरा उदाहरण
भी समवायिकारण में प्रत्यासत्ति साक्षात् तथा परम्परया दो प्रकार से मानी
जा सकती है इस सिद्धान्त के स्पष्टीकरण के विशेष प्रयोजन से दिया गया है ।
यहां तन्तुरूप को पटरूप का असमवायिकारण कहा है । इसमें शङ्का यह
होती है कि समवायिकारण में प्रत्यासन्न और अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावी
धर्म को असमवायिकारण कहते हैं, यह असमवायिकारण का लक्षण अभी
किया है । पटरूप के असमवायिकारण को हमें देखना है । पटरूप गुण है अत-
एव उसका समवायिकारण गुणीरूप पट है । इसलिए पटगत कोई धर्म पटरूप
का असमवायिकारण हो सकता है । तन्तुरूप तो तन्तु का गुण होने से तन्तु
में रहता है पट में नहीं । तब तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण कैसे होगा ?
इस शङ्का का उत्तर यह है कि समवायिकारण में जो प्रत्यासत्ति यहां कही
है वह साक्षात् और परम्परया दो प्रकार से हो सकती है । कोई धर्म कार्य के
साथ एक ही अर्थ में रहने से समवायिकारण में प्रत्यासन्न कहा जाता है । जैसे
तन्तुसंयोग पट का असमवायिकारण पहिले दिखाया था । वह पट के समवायि-
कारण तन्तुओं में कार्यभूत पट के साथ साक्षात् एकार्थ समवेत है । अर्थात् पट
समवाय सम्बन्ध से तन्तुओं में रहता है उन्हीं तन्तुओं में तन्तुसंयोगरूप गुण
भी रहता है । इसलिए तन्तुसंयोग साक्षात् कार्यरूप पट के साथ तन्तुरूप एक
अर्थ में समवेत है । उस प्रकार की प्रत्यासत्ति को साक्षात् प्रत्यासत्ति कहते हैं ।
इसी को दूसरे शब्दों में 'कार्यैकार्थप्रत्यासत्ति' अर्थात् कार्य पट के साथ कारण
तन्तुसंयोग की एक अर्थ तन्तु में प्रत्यासत्ति भी कहते हैं ।
दूसरे प्रकार की प्रत्यासत्ति को 'कारणैकार्थप्रत्यासत्ति' अथवा परम्परया
प्रत्यासत्ति भी कहते हैं । जो धर्म कार्य के साथ नहीं अपितु कारण के साथ