तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४२ तर्कभाषा [धारावाहिकम्
कलाप उत्तरेषामप्युत्पत्तिरिति न प्रतीतित उत्पत्तितो वा धारावाहिकविज्ञानानि
परस्परस्यातिशेरत इति युक्ता सर्वेषामपि प्रमाणता ।'१
अर्थात् धारावाहिक बुद्धिस्थल में सब ज्ञान परस्पर निरपेक्ष होते हैं । पूर्व
विज्ञान की कारणसामग्री के व्यापार से ही उत्तर विज्ञानों की भी उत्पत्ति हो
जाती है । इसलिये इन सब विज्ञानों में न उत्पत्तिकृत और न प्रतीतिकृत कोई
विशेषता है अतएव सबका ही प्रामाण्य है ।
इसके विपरीत कुमारिल भट्ट के अनुयायी 'शास्त्रदीपिका'-कार पार्थसारथि
मिश्र आदि सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण मान कर ही उत्तर विज्ञानों के प्रामाण्य
को स्थापित करते हैं । उसका कारण यह है कि उन्होंने अपने प्रमाणलक्षण में
'अपूर्व' पद का निवेश कर 'अनधिगतार्थगन्तृता' को ही प्रमाण का लक्षण माना
है । इसलिए धारावाहिक बुद्धि के प्रामाण्य के लिए उन्हें सूक्ष्म कालभेद का भी
ग्रहण मानना पड़ा है । पार्थसारथि मिश्र ने अपनी 'शास्त्रदीपिका' में इस
विषय का प्रतिपादन करते हुए लिखा है :—
'नन्वेवं धारावाहिकेषूत्तरेषां पूर्वगृहीतार्थविषयत्वादप्रामाण्यं स्यात् तस्माद
नुभूतिः प्रमाणमिति प्रमाणलक्षणम् ।...तस्मात् यथार्थमगृहीतग्राहि ज्ञानं प्रम-
णमिति वक्तव्यम् । धारावाहिकेष्वप्युत्तरेषां कालान्तरसम्बन्धस्यागृहीतस्या
ग्रहणाद् युक्तं प्रामाण्यम् । सन्नपि कालभेदोऽतिसूक्ष्मत्वान्न परामृश्यत इति चेत्,
अहो सूक्ष्मदर्शी देवानां प्रियः । यो हि समानविषयया विज्ञानधारया
चिरमवस्थायोपरतः सोऽप्यनन्तरक्षणसम्बन्धितयार्थं स्मरति, तथाहि किमत्र घटो-
ऽवस्थित इति पृष्टः कथयति, अस्मिन् क्षणे मयोपलब्ध इति । तथा प्रातरारभ्यै-
तावत्कालं मयोपलब्ध इति । कालभेदे त्वगृहीते कथमेवं वदेत् । तस्मादस्ति
कालभेदस्य परामर्शः तदाधिक्याच्च सिद्धमुत्तरेषां प्रामाण्यम्² ।
अर्थात् क्या यहां घड़ा था या है इस प्रकार का प्रश्न करने पर, अभी इसी
क्षण मैंने देखा था । अथवा सबेरे से अब तक तो मैंने देखा था । इस प्रकार
का उत्तर दिया जाता है । यह उत्तर बिना कालभेद के ग्रहण के कैसे बनेगा ।
इसलिये कालभेद का ग्रहण होता है यह मानना ही चाहिए । और उसके मान
लेने पर उत्तर विज्ञानों में उस काल भेद के आधिक्य से अगृहीतग्राहित्व बन
जावेगा । इसलिए उनका प्रामाण्य सिद्ध ही है । इस प्रकार कुमारिलभट्ट के
अनुयायी पार्थसारथि मिश्र सूक्ष्म कालभेद के ग्रहण का उपपादन कर धारा-
वाहिक बुद्धि के प्रामाण्य को सिद्ध करते हैं ।
१ प्रकरणपञ्जिका पृष्ठ ४२, । बृहती पृष्ठ १०३ ।
२ शास्त्रदीपिका पृष्ठ १२४, १२६ ।