सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 109, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 109

४४ तर्कभाषा [धारावाहिकम्
ननु प्रमायाः कारणानि बहूनि सन्ति प्रमातृप्रमेयादीनि । तान्यपि
किं करणानि उत नेति ?
प्रकार-भेद से, अभिप्रेत हैं। योगिप्रत्यक्षादि में कालभेद का ग्रहण संभव होने
से उनका धारावाहिक ज्ञान भी प्रमाण है। और लौकिक प्रत्यक्ष में कालभेद
का ग्रहण सम्भव न होने से लौकिक धारावाहिकज्ञान प्रमाण नहीं है।
इसके विपरीत श्वेताम्बर सम्प्रदाय की परंपरा में प्रत्यक्ष के लक्षण में
अपूर्व या अनधिगत आदि पदों का समावेश नहीं किया गया है इसलिए वह
धारावाहिक ज्ञान को, और उसी की तरह स्मृति को भी प्रमाण मानने के
पक्ष में हैं। क्योंकि उनके मत से गृहीतग्राहित्व प्रामाण्य का विघातक नहीं है।
हमने अपनी 'दर्शनमीमांसा' में इस विषय को इस प्रकार सङ्कलित किया है-
धारावाहिकज्ञानानां गृहीतग्राहिणामपि ।
यथार्थत्वे मतं तेषां प्रामाण्यं गौतमे नये ॥
सूक्ष्मकालकलायोगादर्थभेदं प्रकल्प्य च ।
तस्यागृहीतग्राहित्वात् प्रामाण्यं भट्टसम्मतम् ॥
क्षणभेदेऽर्थभेदस्य कल्पनास्मिन् मते तु या ।
बौद्धानां क्षणवादस्य छायां किञ्चावलम्बते ॥
सूक्ष्मकालकलाभानं विना प्राभाकरैस्तथा ।
अनुभूतिमात्रादेव प्रामाण्यं तस्य सम्मतम् ॥
प्रमाणं योगिनामेवाप्रमाणमन्यदेव च ।
हेतुबिन्दोस्तु टीकायामर्चटो बौद्ध अब्रवीत् ॥
धर्मोत्तरश्च टीकायां न्यायबिन्दोस्तथैव च ।
अप्रामाण्यं परो बौद्धो लिलेखाधिगते तथा ॥
क्षणभेदादिवैशिष्ट्याद् योगजे च दिगम्बराः ।
प्रामाण्यमन्यथात्वस्याप्रामाण्यं सम्प्रचक्षते ॥
श्वेताम्बरास्तु सर्वेऽपि तत्र प्रामाण्यवादिनः ।
तेनानधिगतं नैव लक्षणे तैर्निवेशितम् ॥
बौद्धाः स्मृतेर्विकल्पस्य स्मृतेर्मीमांसकास्तथा ।
व्यावृत्तये प्रमाणस्यागृहीतग्राहितां जगुः१ ॥
[ प्रश्न ] प्रमाता प्रमेय आदि प्रमा के कारण तो बहुत से हैं। वे सब भी
[ प्रमा के ] 'करण' होते हैं अथवा नहीं ?
१ दर्शनमीमांसा अ० ३ ।