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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 106, कुल 330 में से

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पृष्ठ 106

धारावाहिकम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४१
के आचार्यों ने अपने ग्रन्थों में धारावाहिक ज्ञानों को अधिगतार्थविषयक कह
कर भी प्रमाण माना है। 'न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका' में वाचस्पतिमिश्र ने
लिखा है :-
अनधिगतार्थगन्तृत्वं च धारावाहिकविज्ञानानामधिगतार्थगोचराणां लोक-
सिद्धप्रमाणभावानां प्रामाण्यं विहन्तीति नाद्रियामहे। न च कालभेदेनानधिगत
गोचरत्वं धारावाहिकानामिति युक्तम्। परमसूक्ष्माणां कालकलादिभेदानां पिशित-
लोचनैरस्मादृशैरनाकलनात् ।
न चाद्येनेव विज्ञानेनोपदर्शितत्वादर्थस्य, प्रवर्तित्वात्पुरुषस्य, प्रापितत्वाच्चोत्त-
रेषामप्रामाण्यमेव ज्ञानानामिति वाच्यम्। न हि विज्ञानस्यार्थप्रापणं प्रवर्त्तनादन्यद्,
न च प्रवर्तनमर्थप्रदर्शनादन्यत् । तस्मादर्थप्रदर्शनमात्रव्यापारमेव ज्ञानप्रवर्तकं
प्रापकं च। प्रदर्शनं च पूर्ववदुत्तरेषामपि विज्ञानानामभिन्नमिति कथं पूर्वमेव
प्रमाणं नोत्तराण्यपि ।
इस प्रकार न्याय और वैशेषिक के आचार्यों ने धारावाहिक बुद्धिस्थल में
उत्तर विज्ञानों का प्रामाण्य ही माना है और उसमें सूक्ष्मकालभेद का ग्रहण
नहीं माना है। जैसा कि यहां तर्कभाषाकार ने दिखाया है। तर्कभाषा का
प्रकृत लेख न्यायवार्तिकतात्पर्यटीका से उद्धृत पंक्तियों के प्रारम्भिक एक अनु-
च्छेद के लेख से मिलता हुआ ही है।
धारावाहिकज्ञान के विषय में मीमांसकों का मत—
मीमांसकों ने भी इस विषय पर विचार किया है। मीमांसकों के प्रभाकर
तथा कुमारिलभट्ट दोनों का अनुगमन करने वाली परम्पराओं में धारावाहिक
ज्ञानों का प्रामाण्य स्वीकार किया है परन्तु उनके उपपादन का प्रकार भिन्न
भिन्न हैं। प्रभाकर मतानुयायी शालिकनाथ आदि नैयायिकों के समान सूक्ष्म
काल भेद का समावेश किए बिना ही अनुभूति मात्र होने से उनको प्रमाण
मानते हैं। परन्तु कुमारिलभट्ट के अनुयायी पार्थसारथि मिश्र आदि सूक्ष्म काल-
भेद का ग्रहण मान कर उस प्रामाण्य को स्थापित करते हैं। प्रभाकर मतानु-
यायी शालिकनाथ ने अपनी 'प्रकरणपञ्चिका' में इस विषय का प्रतिपादन करते
हुए लिखा है—
'धारावाहिकेषु तर्हि उत्तरविज्ञानानि स्मृतिप्रमोषादविशिष्टानि कथं प्रमाणानि ?
तत्राह, अन्योन्यनिरपेक्षा धारावाहिकबुद्धयः। व्याप्रीयमाणे हि पूर्वविज्ञानकारण-
१ न्यायवार्तिक तात्पर्य टी० पृ० २१, कन्दली पृ० ६१, न्यायमञ्जरी पृ०
२२, न्यायकुसुमाञ्जलि ४, १ ।