तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसमवायः ] प्रमाणनिरूपणम् ३१
यथा अवयवावयविनौ, गुणगुणिनौ, क्रियाक्रियावन्तौ, जातिव्यक्ती,
विशेषनित्यद्रव्ये चेति । अवयव्यादयो हि यथाक्रममवयवाद्याश्रिता एवा-
वतिष्ठन्तेऽविनश्यन्तः । विनश्यदवस्थास्त्वनाश्रिता एवावतिष्ठन्तेऽवय-
व्यादयः । यथा तन्तुनाशे सति पटः । यथा वा आश्रयनाशे सति गुणः ।
विनश्यत्ता तु विनाशकारण सामग्रीसान्निध्यम् ।
तन्तुपटावप्यवयवावयविनौ, तेन तयोः सम्बन्धः समवायोऽयुतसिद्ध-
जैसे १ 'अवयव अवयवी', २ 'गुण गुणी', ३ 'क्रिया क्रियावान्', ४ 'जाति
और व्यक्ति' तथा ५ 'नित्यद्रव्य और विशेष' । अवयवी आदि यथाक्रम अवयवादि
के आश्रित ही रहते हैं । विनश्यदवस्था में तो अवयवी आदि निराश्रित ही रहते
हैं जैसे तन्तु [ रूप अविनश्यदवस्था में अवयव ] के नाश होने पर पट [ रूप
अवयवी निराश्रित हो जाता है ] अथवा जैसे आश्रय [ घटादि ] के नाश हो
जाने पर [ उसमें रहने वाले रूपादि ] गुण [ विनश्यत्ता काल में निराश्रित हो
जाते हैं ] विनश्यत्ता तो विनाश कारण की सामग्री का सान्निध्य [ समस्त
विनाश कारणों का एकत्र हो जाना ] है ।
पूना वाले संस्करण में यहाँ मूल पुस्तक में 'अवयवाद्यो हि यथाक्रममवय-
व्याद्याश्रिता एवावतिष्ठन्तेऽविनश्यन्तः' इस प्रकार का पाठ रखा है। परन्तु यह
पाठ ठीक नहीं है । क्योंकि अवयव अवयवी के आश्रित नहीं रहते हैं अपितु
अवयवी अवयव के आश्रित रहता है । आगे जो उदाहरण दिया है 'यथा तन्तु-
नाशे सति पटः' । वह भी इसी बात का समर्थक है कि तन्तु रूप अवयव के
नष्ट हो जाने पर पट रूप अवयवी निराश्रित हो जाता है । अर्थात् पट रूप
अवयवी तन्तु रूप अवयव के आश्रित रहता है । और तन्तु रूप अवयव पट
रूप अवयवी के आश्रित नहीं रहते । इसलिए ओरिएन्टल बुक एजेन्सी पूना
द्वारा प्रकाशित नवीन संस्करण के इस स्थल का पाठ अशुद्ध है। यहाँ 'यथाक्रम'
शब्द ने पाठ संशोधन में कदाचित् कुछ भ्रान्ति पैदा कर दी हो । अयुतसिद्धों
का परिगणन करते हुए ऊपर की पंक्ति में पहिले अवयव को और पीछे अवयवी
को रखा है । 'अवयव अवयविनौ' । उसके बाद अगली पंक्ति में 'यथाक्रम' पद
का प्रयोग है, इसलिए इसको यथाक्रम करने से 'अवयवाद्यो हि यथाक्रम-
मवयव्याद्याश्रिता एवावतिष्ठन्ते' यह पाठ बन गया है । यही कदाचित् पाठ
संशोधक की भ्रान्ति का बीज है । परन्तु जैसा कि आगे के उदाहरण से भी
स्पष्ट है यह पाठ ठीक नहीं है । अतएव हमने यहाँ उस पाठ को संशोधित कर
शुद्ध पाठ को मूल में स्थान दिया है । इस प्रकार अयुत सिद्ध का लक्षण कर
अब समवाय सम्बन्ध का उपपादन करते हैं ।
तन्तु और पट भी अवयव और अवयवी हैं । इसलिए अयुतसिद्ध होने से