सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 101, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 101

३६ तर्कभाषा [असमवायिकारणम्
द्रव्यमिति द्रव्यलक्षणयोगात् । योग्यतया गुणाश्रयत्वाच्च । योग्यता च
गुणानामत्यन्ताभावाभावः ।
असमवायिकारणं तदुच्यते यत्समवायिकारणप्रत्यासन्नमवधृतसा-
मर्थ्यं तदसमवायिकारणम् । यथा तन्तुसंयोगः पटस्यासमवायिकारणम् ।
तन्तुसंयोगस्य गुणस्य, पटसमवायिकारणेषु तन्तुषु गुणिषु, समवेतत्वेन
समवायिकारणे प्रत्यासन्नत्वात्, अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वेन पटं
प्रति कारणत्वाच्च ।
से [ प्रथम क्षण का घट भी द्रव्य लक्षण से युक्त होने से द्रव्य ही है। उसे
अद्रव्य नहीं कहा जा सकता ]
[ यदि आप 'समवायिकारणं द्रव्यम्' इस द्रव्य लक्षण को न मान कर
'गुणाश्रयो द्रव्यम्' इसको ही द्रव्य लक्षण मानना चाहते हैं तो ] योग्यता से
गुणाश्रय होने से भी [ प्रथम क्षण के घट को अद्रव्य नहीं कह सकते हैं । अर्थात्
प्रथम क्षण का घट यद्यपि उस प्रथम क्षण में गुणों का आश्रय नहीं है परन्तु
उसमें गुणाश्रय होने की योग्यता तो उस क्षण में भी विद्यमान है। अगले क्षण
में वह गुणाश्रय हो जायगा इस योग्यता के कारण उसको गुणाश्रय मान कर
भी लक्षण का समन्वय किया जा सकता है । ] यह योग्यता [ का अभिप्राय ]
गुणों के अत्यन्ताभाव का अभाव है ।
अर्थात् घट में गुणों का अत्यन्ताभाव त्रैकालिक अभाव नहीं है। इसलिए
घट में गुणों के अत्यन्ताभाव अर्थात् त्रैकालिक अभाव न होने से वर्तमान एक
क्षण में गुण का अभाव होने पर भी अगले क्षण में गुणोत्पत्ति के योग्य होने
से उसको गुणाश्रय मान कर 'गुणाश्रयो द्रव्यम्' इस द्रव्य लक्षण का भी
समन्वय हो सकता है। इसलिए प्रथम क्षण में निर्गुण घट उत्पन्न होता है और
द्वितीय आदि क्षण में उसमें रूपादि गुणों की उत्पत्ति होती है। अतः गुण
और गुणी का समान कालीन जन्म न होने से घटादि गुणी, स्वगत रूपादि
गुणों के प्रति समवायि कारण हो सकते हैं। यह सिद्ध हुआ ।
आगे असमवायि कारण का लक्षण करते हैं :-
असमवायिकारण उसको कहते हैं । जो समवायिकारण में रहता [प्रत्यासन्न]
हो और [कार्योत्पादन में] जिसकी सामर्थ्य निश्चित हो [अर्थात् जिसमें 'अनन्य-
थासिद्धनियतपूर्वभावित्वम्' यह कारण का लक्षण घटता हो] उसको असमवायि-
कारण कहते हैं। जैसे तन्तु संयोग पट का असमवायि कारण है। तन्तु संयोग गुण
[ है उस ] के पट के समवायिकारण तन्तुओं [ रूप ] गुणियों में समवाय सम्बन्ध