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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 105, कुल 330 में से

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पृष्ठ 105

४० तर्कभाषा [ धारावाहिकम्
न चान्यान्यक्षणविशिष्टविषयीकरणादनधिगतार्थगन्तृता। प्रत्यक्षेण
सूक्ष्मकालभेदानाकलनात्। कालभेदग्रहे हि क्रियादिसंयोगान्तानां
चतुर्णां यौगपद्याभिमानो न स्यात्। क्रिया, क्रियातो विभागो, विभागात्
पूर्वसंयोगनाशः, ततश्चोत्तरदेशसंयोगोत्पत्तिरिति।
आदि ] बुद्धियों के [ गृहीतग्राही होने से ] अप्रामाण्य प्राप्त होने से [अनधिगतार्थ-
गन्तृप्रमाणं यह प्रमाण का लक्षण ठीक नहीं है ]।
[ यदि मीमांसक आदि यह कहें कि प्रथम द्वितीय आदि ] अलग अलग क्षण
विशिष्ट घट का ग्रहण होने से [ द्वितीयादि ज्ञानों में भी ] अनधिगतार्थगन्तृता हो
सकती है। [इसलिए धारावाहिक बुद्धिस्थल में अप्रामाण्य नहीं होगा ] यह भी,
प्रत्यक्ष से सूक्ष्म [ क्षण रूप ] कालभेद के ग्रहण न होने से, ठीक नहीं है।
[ प्रत्यक्ष से क्षणरूप सूक्ष्म ] कालभेद का ग्रहण होने पर तो [ किसी वस्तु के
गिरने या एक स्थान से हटकर दूसरे स्थान पर जाने में होने वाली ] क्रिया से
लेकर संयोग पर्यन्त चारों [ व्यापारों ] में यौगपद्य [ एक साथ होने ] की प्रतीति
न हो। [जब एक वस्तु एक स्थान को छोड़ कर दूसरी जगह जाती है तब उसके
दूसरी जगह पहुंचने तक चार व्यापार होते हैं ] १. क्रिया, २. क्रिया से विभाग,
३. विभाग से पूर्वसंयोग नाश, और ४ उत्तरदेश संयोग की उत्पत्ति । [परन्तु यह
चारो व्यापार अलग अलग अनुभव में नहीं आते क्योंकि वह अत्यन्त शीघ्रता से
हो जाते हैं। इसलिए सूक्ष्म कालभेद का प्रत्यक्ष से ग्रहण सम्भव न होने से धारा-
वाहिक बुद्धिस्थल में क्षण विशिष्ट घट का ग्रहण नहीं माना जा सकता है। अतः
द्वितीयादि ज्ञानों के गृहीतग्राही होने से 'अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्' यह लक्षण
उसमें अव्याप्त होगा। अतः यह ठीक नहीं है ]
धारावाहिक ज्ञान के विषय में न्याय का मत—
धारावाहिक बुद्धि के प्रामाण्य के विषय में न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, बौद्ध,
जैन आदि अनेक दर्शनों में विचार किया गया है। अधिकांश लोग धारावाहिक
बुद्धिस्थल में द्वितीयादि क्षणों में होने वाले 'अयं घटः' इत्यादि ज्ञान के प्रामाण्य
का ही प्रतिपादन करते हैं परन्तु उनके प्रतिपादन की शैली भिन्न भिन्न है।
इसके प्रामाण्य सिद्ध करने की चिन्ता विशेष रूप से उनको करनी पड़ती है
जो 'अनधिगतार्थगन्तृ प्रमाणम्' इस प्रकार प्रमाण का लक्षण करते हैं। न्याय
वैशेषिक आदि में प्रमाण के लक्षण में अनधिगतत्व का कोई उल्लेख नहीं किया
गया है इसलिए उनके यहाँ अधिगत विषयक ज्ञान भी प्रमाण ही है। इसीलिए
वाचस्पतिमिश्र, श्रीधराचार्य, जयन्तभट्ट, उदयनाचार्य आदि न्याय और वैशेषिक