तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३८ तर्कभाषा [ असमवायिकारणम्
ननु पटरूपस्य पटः समवायिकारणं, तेन तद्गतस्यैव कस्यचिद्धर्मस्य-
पटरूपं प्रत्यसमवायिकारणत्वमुचितम् । तस्यैव समवायिकारणप्रत्यासन्न
त्वात् । न तु तन्तुरूपस्य । तस्य समवायिकारणप्रत्यासत्त्यभावात् ।
मैवम् । समवायिकारणसमवायिकारणप्रत्यासन्नस्यापि परम्परया
समवायिकारणप्रत्यासन्नत्वात् ।
एक अर्थ में प्रत्यासन्न हो उसको 'कारणैकार्थप्रत्यासन्न' कहेंगे। जैसे 'तन्तुरूप'
कार्यभूत 'पट-रूप' के साथ नहीं अपितु पट-रूप के कारण पट के साथ एक
अर्थ तन्तु में प्रत्यासन्न है । अर्थात् पटरूप का कारण पट है वह अपने समवा-
यिकारण तन्तु में समवाय सम्बन्ध से रहता है । उसी 'तन्तु' गुणी में 'तन्तु-
रूप' गुण समवाय सम्बन्ध से रहता है इसलिये 'तन्तुरूप' और 'पट' दोनों
तन्तुओं में प्रत्यासन्न हुए। इस प्रकार 'तन्तुरूप' यद्यपि 'पट-रूप' के साथ
एकार्थ समवेत नहीं है परन्तु 'पटरूप' के कारण पट के साथ 'तन्तुस्वरूप'
एकार्थ में समवेत है, इसलिए उसे भी परम्परया या 'कारणैकार्थप्रत्यासत्त्या'
समवायिकारण में प्रत्यासन्न माना जा सकता है। अर्थात् समवायिकारण के
समवायिकारण में प्रत्यासन्न धर्म को भी परम्परया समवायिकारण में प्रत्यासन्न
मान कर 'तन्तुरूप' को 'पटरूप' का असमवायिकारण कहा जा सकता है ।
इसी बात को आगे कहते हैं ।
[ प्रश्न ] पटरूप का समवायिकारण [ तो ] पट है इसलिए उस [ पट ] में
रहने वाले किसी धर्म का ही 'पटरूप' के प्रति असमवायिकारणत्व [ मानना ]
उचित है । [ क्योंकि ] उस [ पटगत धर्म ] का ही समवायिकारण प्रत्यासन्नत्व
[ हो सकता ] है । तन्तुरूप का [ पटरूप के प्रति समवायिकारण प्रत्यासन्नत्व ]
नहीं [ हो सकता है ] उस [ तन्तुरूप ] के [ पटरूप के ] समवायिकारण [ पट ] में
प्रत्यासन्न न होने से [ 'तन्तुरूप' का पटरूप के प्रति असमवायिकारणत्व मानना
उचित नहीं है ]
[ यह पूर्व पक्ष हुआ । आगे उसका उत्तर देते हैं ] :-
यह नहीं [ कहना चाहिए ] उस [ पटरूपादि ] के समवायिकारण [ पट ]
के समवायिकारण [ तन्तु ] में प्रत्यासन्न [ तन्तुरूपादि ] का भी परम्परया [ कार-
णैकार्थ प्रत्यासत्ति से ] समवायिकारण [ में ] प्रत्यासन्नत्व [ अभीष्ट ] होने से
[ तन्तुरूप भी पटरूप के समवायिकारण में प्रत्यासन्न माना जा सकता है। अतः
तन्तुरूप पटरूप का असमवायिकारण हो सकता है ] ।
इस प्रकार समवायिकारण और असमवायिकारण के लक्षण कर चुकने के
बाद अब तीसरे निमित्तकारण का लक्षण करते हैं ।