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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 97, कुल 330 में से

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पृष्ठ 97

३२ तर्कभाषा [ समवायिकारणम्
त्वात् । तुरीपटयोस्तु न समवायोऽयुतसिद्धत्वाभावात् । नहि तुरी पटाश्रितै-
वावतिष्ठते नापि पटस्तुर्याश्रितः । अतस्तयोः सम्बन्धः संयोग एव । तदेवं
तन्तुसमवेतः पटः ।
यत्समवेतं कार्यमुत्पद्यते तत्समवायिकारणम् । अतस्तन्तुरेव समवायि-
कारणं पटस्य न तु तुर्यादि ।
पटश्च स्वगतरूपादेः समवायिकारणम् । एवं मृत्पिण्डोपि घटस्य
समवायिकारणं, घटश्च स्वगतरूपादेः समवायिकारणम् ।
उनका सम्बन्ध समवाय है । तुरी और पट में अयुतसिद्धत्व का अभाव होने से
उनका समवाय [ सम्बन्ध ] नहीं है । [ तुरी और पट अयुतसिद्ध इस लिए नहीं हैं
कि ] न तुरी पट के आश्रित ही रहती है और न पट तुरी के आश्रित ही रहता
है । इसलिए [ अयुतसिद्ध न होने से ] उन दोनों का सम्बन्ध संयोग ही है । इस
प्रकार [ यह स्पष्ट हो गया कि तन्तु और पट के अयुतसिद्ध होने से ] तन्तु में पट
समवेत [ समवाय सम्बन्ध से रहने वाला ] है ।
जिस में समवेत [ समवाय सम्बन्ध से ] कार्य की उत्पत्ति होती है वह समवायि
कारण [कहलाता] है । इस लिए तन्तु ही पट का समवायि कारण हैतुरी आदि नहीं ।
[ तन्तु और पट अवयव अवयवी हैं, इस लिए तन्तु अवयव, पट रूप अवयवी
का समवायि कारण है यह बात इस उदाहरण से सिद्ध हुई । आगे गुण और
गुणी के सम्बन्ध से दूसरा उदाहरण बताते हैं ] और पट अपने में रहने वाले रूप
आदि [ गुणों ] का समवायि कारण है । इसी प्रकार मिट्टी का पिण्ड घट का
समवायि कारण है और घट अपने में रहने वाले रूपादि [ गुणों ] का समवायि
कारण है ।
यहाँ पट स्वगत रूप का और घट स्वगत रूपादि का समवायि कारण है ।
यह जो गुण गुणी भाव की दृष्टि से समवायि कारण का दूसरा उदाहरण प्रस्तुत
किया है वह केवल दूसरा उदाहरण देने की दृष्टि से ही नहीं दिया गया है अपितु
गुणों के उत्पत्ति क्रम के सम्बन्ध में एक विशेष सिद्धान्त के स्पष्टीकरण के लिए
ही यहां उसका उल्लेख हुआ है । साधारणतः यह प्रतीत होता है कि गुण और
गुणी इन दोनों की उत्पत्ति एक साथ होती है । जिस समय घट उत्पन्न होता है
उसी समय घट के रूपादि गुण भी उत्पन्न होते हैं । इसलिए उनमें कार्य कारण
भाव नहीं हो सकता है । क्योंकि कार्य कारण भाव के लिए पौर्वापर्य आवश्यक
है । जैसा कि 'अनन्यथासिद्धनियतपूर्वभावित्वं कारणत्वम्' और 'अनन्यथासिद्ध-
नियतपश्चाद्भावित्वं कार्यत्वम्' इन कारण और कार्य के लक्षणों से भी उनका
पौर्वापर्य सूचित होता है । अतः 'गुण और गुणी का समानकालीन जन्म
होने से गुणी का गुणों का समवायि कारण नहीं कहा जा सकता है' । यह