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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 100, कुल 330 में से

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पृष्ठ 100

निर्गुणोत्पत्तिः ] प्रमाणनिरूपणम् ३५
अद्रव्यं च स्याद् गुणाश्रयत्वाभावात् । गुणाश्रयो द्रव्यमिति हि
द्रव्यलक्षणम् ।
सत्यम् । प्रथमे क्षणे घटो यदि चक्षुषा न गृह्यते का नो हानिः । न
हि सगुणोत्पत्तिपक्षेऽपि निमेषावसरे घटो गृह्यते । तेन व्यवस्थितमेतन्नि-
र्गुण एव प्रथमं घट उत्पद्यते । द्वितीयादिक्षणेषु चक्षुषा गृह्यते ।
न च प्रथमे क्षणे गुणाश्रयत्वाभावादद्रव्यत्वापत्तिः । समवायिकारणं
अचाक्षुष हो जायगा [अर्थात् उसका चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा ] वायु के
समान रूप रहित द्रव्य होने से । जो द्रव्य महत् परिमाण और उद्भूत रूप से
युक्त होता है वही चाक्षुष [ प्रत्यक्ष का विषय होता ] है । [ इस प्रकार निर्गुणो-
त्पत्ति पक्ष में प्रथम क्षण में घट का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं हो सकेगा यह प्रथम
दोष है । दूसरा दोष आगे कहते हैं ]
[ प्रथम क्षण के निर्गुण घट में ] गुणाश्रयत्व का अभाव होने से [ वह ]
द्रव्य भी नहीं हो सकेगा । [ क्यों कि ] गुण का आश्रय द्रव्य [ होता ] है, यह
द्रव्य का लक्षण है । [प्रथम क्षण के घट के निर्गुण होने से उसमें गुणाश्रयत्व रूप
द्रव्य का लक्षण नहीं घट सकता है अतएव प्रथम क्षण का घट द्रव्य भी नहीं
कहा जा सकता है । ये दोष निर्गुणोत्पत्ति पक्ष में आते हैं । आगे उनका
समाधान करते हैं । ]
[ उत्तर आपका कहना ] ठीक है । [ प्रथम क्षण में घटादि का चाक्षुष
प्रत्यक्ष नहीं होगा । परन्तु ] यदि प्रथम क्षण में चक्षु से घट का ग्रहण नहीं होता
तो इसमें हमारी क्या हानि है । [ आप के ] सगुणोत्पत्ति पक्ष में भी [यदि
प्रथम क्षण में देखने वाले के पलक मारने का ] निमेषावसर [होने पर ] में घट
का ग्रहण नहीं होगा । [ इसलिए यदि प्रथम क्षण में घट का चाक्षुष प्रत्यक्ष नहीं
होता तो इसमें कोई हानि नहीं है । अर्थात् प्रथम क्षण में ही घट का प्रत्यक्ष
होना आवश्यक नहीं है । द्वितीय क्षण में रूपादि गुण उत्पन्न हो जाने पर ही
उसका प्रत्यक्ष होगा ] इसलिए यह निश्चित हुआ कि प्रारम्भ में [ प्रथम क्षण ]
में निर्गुण घट ही उत्पन्न होता है और द्वितीयादि क्षणों में [ रूप आदि गुणों के
उत्पन्न हो जाने पर ] चक्षु से गृहीत होता है ।
और न प्रथम क्षण में गुणाश्रय न होने से [घटादि का] अद्रव्यत्व हो सकता
है। [ क्योंकि 'गुणाश्रयो द्रव्यम्' यह द्रव्य का लक्षण नहीं है अपितु हमारे मत में
'समवायि कारणं द्रव्यम्' यह द्रव्य का लक्षण है अतः ] समवायिकारणं द्रव्य
[ होता ] है इस द्रव्य के लक्षण का सम्बन्ध [ प्रथम क्षण के घट में भी ] होने