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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 330 में से

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पृष्ठ 108

धारावाहिकम् ] प्रमाणनिरूपणम् ४३
धारावाहिक ज्ञान के विषय में बौद्धों का मत—
बौद्धपरम्परा में आचार्य दिङ्नाग ने 'अनधिगतार्थगन्तृता' को प्रमाण
लक्षण में समावेश करने का प्रयत्न किया है। प्रमाणसमुच्चय की टीका में,
पृष्ठ ११ पर :—
'अज्ञातार्थज्ञापकं प्रमाणम् इति प्रमाणसामान्यलक्षणम्' ।
इस प्रकार प्रमाण का लक्षण किया गया है। अर्थात् अगृहीतग्राही ज्ञान
ही प्रमाण है। गृहीतग्राही ज्ञान के विषय में धर्मोत्तराचार्य ने लिखा है :—
'अतएव अनधिगतविषयं प्रमाणम् । येनैव हि ज्ञानेन प्रथममधिगतोऽर्थः
तेनैव प्रवर्तितः पुरुषः प्रापितश्चार्थः । तत्रैवार्थे किमन्येन ज्ञानेन अधिकं कार्यम् ।
ततोऽधिगतविषयमप्रमाणम् ।'
अर्थात् धर्मोत्तराचार्य के मत में अधिगत विषयक ज्ञान का अप्रामाण्य ही
अभीष्ट है । परन्तु इसके विपरीत हेतुबिन्दु की टीका में 'अर्चट' ने धारावाहिक
ज्ञानों में से योगियों के धारावाही ज्ञान में भट्ट मीमांसकों के अनुसार सूक्ष्म
कालभेद का ग्रहण मान कर उसको प्रमाण माना है और लौकिक पुरुषों के
धारावाहिक ज्ञान में न्याय के अनुसार सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण संभव न होने
से उसको अप्रमाण कहा है। यहाँ न्याय का साम्य केवल इतने अंश में है कि
सूक्ष्म कालभेद का लौकिक प्रत्यक्ष से ग्रहण नहीं हो सकता है। शेष धारा-
वाहिक ज्ञान का अप्रमाण होना इस अंश में न्याय के साथ समानता नहीं है।
क्योंकि न्याय तो धारावाहिक ज्ञान को प्रमाण ही मानता है। न्याय के प्रमाण
लक्षण में अज्ञातार्थज्ञापकत्व अभीष्ट नहीं है। बौद्धों ने 'अज्ञातार्थज्ञापकं
प्रमाणम्' यह प्रमाण का सामान्य लक्षण माना है अतएव उनके मत में
धारावाहिक बुद्धि का प्रामाण्य सूक्ष्म कालभेद का ग्रहण होने पर ही सम्भव
है। और वह काल भेद योगिप्रत्यक्ष में तो गृहीत हो सकता है साधारण
लौकिक प्रत्यक्ष में नहीं। इसलिए योगि-प्रत्यक्ष में धारावाहिक ज्ञानों का
प्रामाण्य है और लौकिक धारावाहिक ज्ञानों का अप्रामाण्य है।
धारावाहिक ज्ञान के विषय में जैनों का मत—
जैनदर्शन की परम्परा में दिगम्बर परम्परा के अनुसार धारावाहिक ज्ञान
उसी दशा में प्रमाण माने जा सकते हैं जब क्षणभेदादि के ज्ञानयुक्त विशिष्ट
प्रमा के जनक हों अन्यथा अप्रमाण ही हैं। इस प्रकार इस मत में भी बौद्ध
आचार्य 'अर्चट' के समान धारावाहिक ज्ञान का प्रामाण्य और अप्रामाण्य दोनों,
१ प्रमाणसमुच्चय पृ० ११ । २ न्यायबिन्दु टीका पृष्ठ ३ ।