तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
कर्मभेदाः ] प्रमेयनिरूपणम् २३३
हीनस्य, निष्कामकर्मानुष्ठानादनागतधर्माऽधर्मावनर्जयतः पूर्वोपात्तञ्च
धर्माऽधर्मप्रचयं योगर्द्धिप्रभावाद् विदित्वा, समाहृत्य भुञ्जानस्य पूर्वकर्म-
निवृत्तौ वर्तमानशरीरापगमे पूर्वशरीराभावाच्छरीराद्येकविंशतिदुःखस-
म्बन्धो न भवति कारणाभावात् । सोऽयमेकविंशतिप्रभेदभिन्नदुःखा-
निर्मोक्षः। सोऽपवर्ग इत्युच्यते ।
क्लेशों से रहित [ अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशा पञ्चक्लेशाः । १ ] अतएव [ राग
द्वेष आदि के अभाव में ] निष्काम भाव से कर्मों के अनुष्ठान करने के कारण
[ निष्काम कर्म से धर्म अधर्म रूप संस्कारों की उत्पत्ति नहीं होती है । इसलिए ]
नए धर्म और अधर्म का उपार्जन न करने वाले; और पूर्वोपात्त धर्माधर्म को
योग शक्ति के प्रभाव से जान कर एक साथ भोग डालने वाले [ तत्त्व-ज्ञान हो
जाने पर राग, द्वेष, नहीं रहता अतएव निष्काम भाव से किए जाने वाले कर्मों
से नवीन धर्माधर्म उत्पन्न नहीं होते हैं । ] पूर्व कर्मों की समाप्ति पर वर्तमान
शरीर के नाश होने पर नए शरीर की उत्पत्ति [ के कारणभूत धर्माधर्म के
अभाव में ] न होने से इक्कीस प्रकार के दुःखों का सम्बन्ध [ आत्मा के साथ ]
कारण [ धर्माधर्म ] के अभाव से नहीं होता है। यही इक्कीस प्रकार के दुःखों
का विनाश मोक्ष है। वही 'अपवर्ग' कहलाता है।
कर्मों के भेद—
कर्म के तीन प्रकार हैं, एक 'प्रारब्ध' दूसरे 'सञ्चित' और तीसरे
'क्रियमाण' । जिन कर्मों का फल भोग करने के लिए यह शरीर प्राप्त हुआ
है उसका भोग प्रारम्भ हो चुका है अतएव वह 'प्रारब्ध' कहलाते हैं। इनका
नाश भोग पूर्ण होने पर ही होता है। 'क्रियमाण' कर्म वह है जो इस समय
में किया जा रहा है। इन कर्मों के संस्कार 'सञ्चित' होते रहते हैं । उनका
भोग आगे होगा अतएव वह 'सञ्चित' कर्म कहलाते हैं। जब तक तत्त्वज्ञान
या आत्मसाक्षात्कार नहीं होता है तब तक किए गए कर्मों से संस्कार बनते
हैं। परन्तु आत्मसाक्षात्कार के बाद किए जाने वाले कर्मों से संस्कार नहीं
बनते । इसलिये आत्मसाक्षात्कार के बाद मोक्ष की प्राप्ति के लिए 'प्रारब्ध'
कर्म और 'सञ्चित' कर्मों की समाप्ति का कार्य शेष रह जाता है। इन दोनों
की समाप्ति होने पर ही मोक्ष होता है। इनमें से 'प्रारब्ध' कर्मों का भोग
तो नियत समय तक अर्थात् जब तक इस वर्तमान शरीर की आयु निर्धारित
है तब तक चलता ही है। उसका उपपादन 'चक्रभूमि' के उदाहरण से किया
गया है। जैसे कुम्हार एक बार अपने 'चाक' को घुमा देता है तो उसमें जो
१ योग दर्शन २, ३ ।
२३४ तर्कभाषा [ कर्मनाशोपायाः
वेग संस्कार उत्पन्न हो जाता है उसके कारण चाक बहुत देर तक घूमता रहता
है इसी प्रकार प्रारब्ध कर्मों के वश यह शरीर अपने भोग के समाप्त होने तक
बना रहता है। 'तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमिवद् धृतशरीरः'१। आत्म ज्ञान के
बाद जितने समय तक वर्तमान शरीर का नाश नहीं होता है तब तक साधक
'जीवन्मुक्ति' की अवस्था में रहता है। इस अवस्था में वह जो कुछ भी कर्म
करता है उसके उन कर्मों से नए संस्कार नहीं बनते हैं। इसीलिए कहा है कि
मातृवध पितृवध जैसे कर्मों से भी उसका कुछ नहीं बिगड़ता है।
'सञ्चित' कर्मों के नाश के प्रकार—
अब सञ्चित कर्मों से छुटकारा पाने का प्रश्न शेष रह जाता है। इसके विषय
में दो प्रकार के मत हैं। गीता का कथन तो यह है कि 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि
भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन'। अर्थात् तत्त्वज्ञान की अग्नि उन सारे 'सञ्चित' कर्मों को
भस्म कर देती है। इस पक्ष में तत्त्वज्ञान के बाद योगी के लिए कुछ कर्तव्य
शेष नहीं रह जाता है। उसके मोक्ष में उतनी ही देर का विलम्ब है जब तक
उसके वर्तमान शरीर का पात नहीं होता। 'तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोच्यते'।
'सञ्चित' कर्मों के विनाश का दूसरा प्रकार वह है जिसका यहां तर्कभाषा-
कार ने वर्णन किया है। उसका आशय यह है कि तत्त्व ज्ञान होने पर योगी
को इस बात का ज्ञान भी योगसामर्थ्य से हो जाता है कि इस समय मेरे इतने
'सञ्चित' कर्म शेष पड़े हैं और साधारण प्रक्रिया के अनुसार इनका भोग मुझे
अमुक अमुक योनि में करना होगा। तब योगी, अपने योग-सामर्थ्य से एक
साथ उन सब शरीरों का निर्माण कर डालता है जिनमें उसके 'सञ्चित' कर्मों
का भोग होना है। इस प्रकार वह सारे 'सञ्चित' कर्मों को एक साथ ही भोग
डालता है। इसलिए भोग के लिए कोई 'सञ्चित' कर्म शेष नहीं रहता है। नया
कर्म उत्पन्न नहीं होता, और 'प्रारब्ध' का भोग से नाश हो जाता है इस
प्रकार नवीन शरीर की उत्पत्ति का कारण न होने से शरीरादि की उत्पत्ति
नहीं होती। यही मोक्ष है।
मोक्ष के स्वरूपविषयक दो मत—
जिस प्रकार मोक्ष प्राप्ति के प्रकार में दो प्रकार के मत हैं इसी प्रकार
मोक्ष के स्वरूप के विषय में भी दो प्रकार के मत हैं। नैयायिक आचार्य दुःख
१ सांख्यकारिका ६७ ।
संशयः ] संशयनिरूपणम् २३५
३ संशयः
एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानार्थविमर्शः संशयः । स च त्रिविधः ।
विशेषादर्शने सति समानधर्मदर्शनजः, विप्रतिपत्तिजः, असाधारणधर्मश्चेति ।
तत्रैको विशेषादर्शने सति समानधर्मदर्शनजः यथा 'स्थाणुर्वा पुरुषो
वा' इति । एकस्मिन्नेव हि पुरोवर्तिनि द्रव्ये स्थाणुत्वनिश्चायकं वक्र-
की अत्यन्त निवृत्ति को ही मोक्ष कहते हैं । परन्तु वेदान्ती मोक्ष में दुःख
निवृत्ति के अतिरिक्त नित्य सुख की प्राप्ति भी मानते हैं। उनका कहना है कि
आत्मा नित्य, विभु और आनन्द रूप है। संसार काल में देहादि के सम्बन्ध के
कारण नित्य-सुख की प्रतीति नहीं हो पाती है, परन्तु मोक्षावस्था में उसके
स्वस्वरूपभूत आनन्द की अभिव्यक्ति भी होती है। इसलिए मोक्ष में वह
आनन्दी भवति नित्य-सुख के अनुभव का 'आनन्दमय' हो जाता है। नैयायिक
मोक्ष में नित्य सुख की अभिव्यक्ति नहीं मानते हैं। इस विषय पर न्यायसूत्र के
वात्स्यायन भाष्य में बहुत विस्तार के साथ विचार किया गया है।
प्रमेयोंका निरूपण प्रारम्भ करते समय 'आत्म-शरीर-इन्द्रिय-अर्थ-बुद्धि-मनः-
प्रवृत्ति-दोष-प्रेत्यभाव-फल-दुःख-अपवर्गास्तु प्रमेयम्' इस सूत्र द्वारा बारह 'प्रमेय'
गिनाये थे। अपवर्ग का निरूपण समाप्त होने के साथ उन प्रमेयों का निरूपण
समाप्त हो जाता है। और इस प्रकार यहां तक न्याय के सोलह पदार्थों में से
'प्रमाण' तथा 'प्रमेय' इन दो पदार्थों का निरूपण समाप्त हो जाता है। अतएव
न्याय के प्रतिपाद्य तृतीय संशय पदार्थ का निरूपण प्रारम्भ करते हैं।
३ संशय
एक धर्म में विरुद्ध नाना धर्मों का परिज्ञान संशय [ कहलाता ] है। और
वह तीन प्रकार का होता है। १ विशेष के अदर्शन होते हुए समान धर्म के
दर्शन से उत्पन्न [ संशय दूसरा विशेषादर्शन होते हुए ] २ विप्रतिपत्ति से
उत्पन्न, [ संशय और तीसरा विशेषादर्शन होते हुए ] ३ साधारणधर्म के दर्शन
से उत्पन्न [ संशय ] ।
उनमें से पहिला विशेषादर्शन होने पर समानधर्म के दर्शन से उत्पन्न संशय
[ का उदाहरण ] जैसे [ यह ] स्थाणु है या पुरुष । सामने स्थित एक [ लम्बे
लम्बे ] द्रव्य में स्थाणुत्व के निश्चायक टेढ़ी मेढ़ी कोटर आदि [ अथवा ]
पुरुषत्व के निश्चय कराने वाले सिर हाथ आदि [ अवयवों ] को न देखने वाले
और [ सम्मुखस्थ पदार्थ में ] स्थाणु और पुरुष के समान धर्म ऊंचाई आदि
को देखने वाले पुरुष को [ उस पदार्थ के विषय में ] संशय होता है कि 'यह
२३६ तर्कभाषा [ ३ संशयः
कोटरादिकं पुरुषत्वनिश्चायकञ्च शिरःपाण्यादिकं विशेषमपश्यतः
स्थाणुपुरुषयोः समानधर्ममूर्ध्वत्वादिकञ्च पश्यतः पुरुषस्य भवति संशयः
‘किमयं स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ इति ।
द्वितीयस्तु संशयो विशेषादर्शने सति विप्रतिपत्तिजः । स यथा ‘शब्दो
नित उत अनित्य’ इति । तथा ह्येको ब्रूते शब्दो नित्य इति, अपरो ब्रूते
शब्दोऽनित्य इति । तयोर्विप्रतिपत्त्या मध्यस्थस्य पुंसो विशेषमपश्यतो
भवति संशयः ‘किमयं शब्दो नित्य’ उतानित्य इति ।
तृतीयोऽसाधारणधर्मदर्शनजस्तु संशयो यथा नित्यादनित्याच्च व्यावृत्तेन
भूमात्रासाधारणेन गन्धवत्त्वेन विशेषमपश्यतो भुवि नित्यत्वानित्यत्व-
संशयः । तथा हि ‘सकलनित्यव्यावृत्तेन गन्धवत्त्वेन योगाद्भूः किमनित्या,
उत सकलानित्यव्यावृत्तेन तेनैव योगान्नित्या’ इति संशयः ।
स्थाणु [ वृक्ष का ठूंठ ] है अथवा पुरुष’ [ इनमें विशेष धर्म वक्रकोटरादि
अथवा कर चरणादि का न दिखाई देना और समान धर्म आरोह-परिणाह
लम्बाई चौड़ाई का दिखाई देना ही संशय का कारण है । विशेषादर्शन तीनों
प्रकार के संशयों में कारण है ] ।
दूसरा संशय विशेष का अदर्शन होते हुए ‘विप्रतिपत्ति’ [ विपरीता विविधा
वा प्रतिपत्तिः विप्रतिपत्तिः । एक ही पदार्थ के विषय में दो व्यक्तियों का विपरीत
अथवा विविध प्रकार का ज्ञान ‘विप्रतिपत्ति’ कहलाता है ] से उत्पन्न [ संशय का
उदाहरण ] वह जैसे, ‘शब्द नित्य है अथवा अनित्य’ । क्योंकि एक [ वादी
वैयाकरण ] कहता है कि शब्द नित्य है और दूसरा [ प्रतिवादी नैयायिक ]
कहता है कि शब्द अनित्य है । उन दोनों की ‘विप्रतिपत्ति’ से विशेष [ नित्यत्व
या अनित्यत्व के निश्चायक हेतु ] को न देख सकने वाले, बीच के पुरुष को
संशय हो जाता है कि ‘क्या यह शब्द नित्य है अथवा अनित्य’ ।
तीसरा [ विशेषादर्शन होने पर ] असाधारणधर्म के दर्शन से उत्पन्न संशय
का उदाहरण ] तो जैसे, नित्य और अनित्य दोनों से पृथक् रहने वाले केवल
पृथिवी के असाधारण धर्म गन्धवत्त्व से, [नित्यत्व अथवा अनित्यत्व के निश्चायक]
विशेष धर्म को न जानने वाले [ पुरुष ] को पृथिवी [ के विषय ] में नित्यत्व
अथवा अनित्यत्व का संशय हो जाता है । जैसे कि [ आकाश आदि ] ‘समस्त
नित्य पदार्थों में न रहने वाले गन्धवत्त्व के योग से क्या पृथिवी अनित्य है ।
अथवा [ जल अग्नि आदि ] ‘किसी अनित्य पदार्थ में न रहने वाले उसी गन्धवत्त्व
के योग से पृथिवी नित्य है’ यह संशय हो जाता है । [ यह संशय गन्धवत्त्व रूप
असाधारण धर्म के दर्शन से होता है ।
प्रयोजनम् ] दृष्टान्तनिरूपणम् २३७
४ प्रयोजनम्
येन प्रयुक्तः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम् । तच्च सुखदुःखावाप्तिहाना ।
तदर्था हि प्रवृत्तिः सर्वस्य ।
५ दृष्टान्तः
वादिप्रतिवादिनोः संप्रतिपत्तिविषयोऽर्थो दृष्टान्तः । स द्विवधः ।
न्याय सूत्र तथा उसके वात्स्यायन भाष्य में तीन के स्थान पर संशय के
पांच कारण गिनाए हैं । उनमें 'उपलब्धि की अव्यवस्था' तथा 'अनुपलब्धि की
अव्यवस्था' यह दो संशय के कारण और दिखाए हैं । समान 'धर्म' और 'विप्रति-
पत्ति' संशय के यह दोनों कारण 'न्यायसूत्र' तथा 'तर्कभाषा' दोनों ग्रन्थों में
समान हैं । 'असाधारण धर्म' के स्थान पर न्यायसूत्र में 'अनेकधर्मोपपत्तेः'
कहा है, और वात्स्यायन भाष्य में उसका अर्थ 'समानजातीयमसमानजातीय-
ञ्चानेकम्' किया है। न्याय सूत्र में संशय का लक्षण इस प्रकार किया गया है—
समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो
विमर्शः संशयः¹ ।
४ प्रयोजन
न्याय के षोडश पदार्थों में संशय के बाद 'प्रयोजन' का स्थान आता है ।
अतएव ग्रन्थकार संशय के बाद 'प्रयोजन' का निरूपण करते हैं ।
जिससे प्रयुक्त होकर मनुष्य [ किसी कार्य में ] प्रवृत्त होता है वह 'प्रयोजन'
है । और वह [ मुख्यतः ] सुख की प्राप्ति और दुःख का नाश है । [ क्योंकि ]
उसी के लिए सब की प्रवृत्ति होती है ।
न्यायसूत्रकार ने प्रयोजन का लक्षण इस प्रकार किया है
यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्² ।
५ दृष्टान्त
प्रयोजन के बाद पांचवाँ पदार्थ 'दृष्टान्त' है । न्याय सूत्र में 'दृष्टान्त' का
लक्षण इस प्रकार किया गया है—
लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः³ ।
अर्थात् जिस अर्थ के विषय में साधारण लौकिक पुरुष और विशेषज्ञ
परीक्षक पुरुषों को एक सा ज्ञान हो जिसको दोनों एक रूप में मानते हों वह
अर्थ 'दृष्टान्त' हो सकता है। इसी बात को तर्कभाषाकार इस प्रकार कहते हैं—
वादी और प्रतिवादी दोनों के ऐकमत्य का विषय भूत अर्थ [ अर्थात्
१-३ न्याय सूत्र १, १, २३ । १, १, २४ । १, १, २५ ।
२३८ तर्कभाषा [ सिद्धान्तः
एकः साधर्म्यदृष्टान्तो यथा धूमवत्त्वस्य हेतोर्महानसम् । द्वितीयस्तु वैधर्म्य-
दृष्टान्तः । यथा तस्यैव महाह्रद इति ।
६ सिद्धान्तः
प्रामाणिकत्वेनाभ्युपगतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्धा । सर्वतन्त्र-प्रति-
तन्त्र-अधिकरण-अभ्युपगम-सिद्धान्तभेदात् । तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो यथा
धर्मिमात्रसद्भावः । द्वितीयो यथा नैयायिकस्य मते मनस इन्द्रिय-
त्वम् । तद्धि समानतन्त्रे वैशेषिके सिद्धम् । तृतीयो यथा क्षित्यादिकर्तृत्व-
सिद्धौ कर्तुः सर्वज्ञत्वम् । चतुर्थो यथा जैमिनीयस्य नित्यानित्यविचारो
यथा भवतु, अस्तु 'तावच्छब्दो गुण' इति ।
जिसके विषय में वादी प्रतिवादी में मतभेद न हो ऐसा ] अर्थ 'दृष्टान्त' हो
[ सकता ] है । वह दो प्रकार का होता है । एक 'साधर्म्य-दृष्टान्त' जैसे धूमवत्त्व
हेतु का [ साधर्म्य दृष्टान्त ] महानस है । और दूसरा 'वैधर्म्य-दृष्टान्त' जैसे उसी
[ धूमवत्त्व हेतु ] का महाह्रद [ वैधर्म्य दृष्टान्त है ] ।
६ सिद्धान्त
दृष्टान्त के बाद छठा पदार्थ सिद्धान्त है । अतएव दृष्टान्त के बाद सिद्धान्त
का निरूपण करते हैं ।
प्रामाणिक रूप से स्वीकार किया जाने वाला अर्थ 'सिद्धान्त' [ कहलाता ]
है । वह चार प्रकार का [ होता ] है । १ 'सर्वतन्त्र' [ सिद्धान्त ], २ 'प्रतितन्त्र'
[ सिद्धान्त ], ३ 'अधिकरण' [ सिद्धान्त ], और ४ 'अभ्युपगम सिद्धान्त' भेद से ।
उनमें से—सर्वतन्त्र सिद्धान्त [ सर्वतन्त्र में तन्त्र शब्द का अर्थ 'शास्त्र' है । जो
सिद्धान्त सब शास्त्रों में माना जाय उसको 'सर्वतन्त्र-सिद्धान्त' कहते हैं ] जैसे धर्मी
मात्र [ घट पट आदि ] की सत्ता [ मानना ] । दूसरा [ 'प्रतितन्त्र सिद्धान्त'
उसको कहते हैं जो किसी विशेष शास्त्र में और उसके अपने समानतन्त्र में माना
जाय अन्य शास्त्रों में न माना जाय] जैसे नैयायिक के मत में मन का इन्द्रियत्व ।
वह [ उस न्याय के ] समानतन्त्र वैशेषिक में प्रसिद्ध है । तीसरा [ अधिकरण
सिद्धान्त वह कहलाता है जो अधिकरणभूत अर्थात् आधार भूत ऐसी बात का
प्रतिपादन करता है जिसकी सिद्धि हो जाने पर अन्य अनेक बातें स्वयं सिद्ध हो
जाती हैं । ] जैसे पृथिवी आदि के कर्ता [ईश्वर] की सिद्धि हो जाने पर उस कर्ता
की सर्वज्ञता [ स्वयं सिद्ध हो जाती है । क्योंकि पृथिवी आदि की रचना सर्वज्ञ,
सर्वशक्तिमान् के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता है ] ।
चौथा [ अभ्युपगम-सिद्धान्त वह कहलाता है जब अपना अभिमत न होने
अवयवाः ] अवयवनिरूपणम् २३६
७ अवयवाः
अनुमानवाक्यस्यैकदेशा अवयवाः । ते च प्रतिज्ञादयः पञ्च । तथा
च न्यायसूत्रम्—
‘प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः’ ।
तत्र साध्यधर्मविशिष्टपक्षप्रतिपादकं वचनं प्रतिज्ञा, यथा पर्वतोऽयं
वह्निमानिति । तृतीयान्तं पञ्चम्यन्तं वा लिङ्गप्रतिपादकं वचनं हेतुः । यथा
धूमवत्त्वेन धूमवत्त्वादिति वा । सव्याप्तिकं दृष्टान्तवचनमुदाहरणम् । यथा
पर अर्थ की विशेष परीक्षा के लिए थोड़ी देर को स्वीकार कर लिया जाय ] जैसे
मीमांसक [ शब्द को द्रव्य मानते हैं और नित्य मानते हैं। नैयायिक शब्द को
गुण और अनित्य मानते हैं । ऐसी दशा में शब्द की ] नित्यता या अनित्यता का
विशेष विचार हो सके इसलिए [ थोड़ी देर के लिए ] मान लो कि शब्द गुण है ।
[ इसको, 'अभ्युपगम-सिद्धान्त' कहते हैं । ]
इस 'अभ्युपगम-सिद्धान्त' का प्रयोग अर्थ की विशेष परीक्षा के लिए तो
किया ही जाता है । उसके अतिरिक्त अपनी बुद्धि के अतिशय के प्रदर्शन
तथा दूसरे प्रतिवादी की बुद्धि की हीनता दिखलाने के लिए भी किया जाता है ।
७ अवयव
सिद्धान्त के निरूपण के बाद न्याय के सप्तम पदार्थ अवयव का निरूपण
क्रम-प्राप्त है । अतएव उसका निरूपण प्रारम्भ करते हैं ।
अनुमान 'वाक्य के एकदेश' अवयव [ कहलाते ] हैं । वह प्रतिज्ञा आदि
पाँच हैं । जैसा कि न्यायसूत्र [ में कहा ] है—
१ प्रतिज्ञा, २ हेतु, ३ उदाहरण, ४ उपनय, और ५ निगमन अवयव हैं ।
१ उनमें से साध्य-धर्म-युक्त 'पक्ष' का प्रतिपादन करने वाला वचन 'प्रतिज्ञा'
[ कहलाता ] है । जैसे यह 'पर्वत वह्नियुक्त है' । [ इसमें पर्वत 'पक्ष' है, वह्नि
'साध्य' है । 'वह्निमान् पर्वतः' इस रूप में साध्य-धर्म-विशिष्ट 'पक्ष' का
प्रतिपादक वचन होने से यह प्रतिज्ञा है ] ।
२ तृतीयान्त अथवा पञ्चम्यन्त लिङ्ग का प्रतिपादक वचन 'हेतु' है । जैसे
'धूमवत्त्वेन' अथवा 'धूमवत्त्वात्' ।
३ व्याप्ति सहित दृष्टान्त का कथन 'उदाहरण' है । जैसे 'जो जो धूमयुक्त
होता है वह अग्नि युक्त होता है, जैसे महानस' [ रसोई घर ] ।
१ न्या० सू० १, १, ३२
२४० तर्कभाषा [ अवयवाः
यो यो धूमवान् सोऽग्निमान् यथा महानस इति । पक्षे लिङ्गोपसंहार-
वचनमुपनयः । यथा वह्निव्याप्यधूमवांश्चायमिति, तथा चायमिति वा ।
पक्षे साध्योपसंहारवचनं निगमनम् । यथा तस्मादग्निमान् इति, तस्मात्त-
थेति वा । एते च प्रतिज्ञादयः पञ्चानुमानवाक्यस्यावयवा इवावयवा, न
तु समवायिकारणं, शब्दस्याकाशसमवेतत्वादिति ।
४ पक्ष [ पर्वत आदि ] में लिङ्ग का उपसंहार कथन करना 'उपनय'
[ कहलाता ] है । जैसे और 'यह [ पर्वत ] वह्नि के व्याप्य धूम से युक्त है' ।
अथवा और 'यह [ पर्वत ] वैसा [ महानस के समान धूमवान् ] है' ।
५ पक्ष [ पर्वत ] में साध्य [ वह्नि ] का उपसंहार कथन करना 'निगमन'
है । जैसे, 'इसलिए [ पर्वत ] अग्निमान् है' । अथवा 'इसलिए [ पर्वत ] वैसा
[ अग्निमान् ] है ।'
यह प्रतिज्ञा आदि पांच अनुमान-वाक्य के अवयव के समान [ होने से
गौण रूप से ] अवयव [ कहलाते ] हैं, 'समवायिकारण' नहीं हैं । शब्द [ रूप
अनुमान वाक्य ] के आकाश में समवेत होने से [ आकाश ही उसका समवायि-
कारण है । प्रतिज्ञादि नहीं ] । [ वास्तव में तो अवयव और अवयवी का
समवाय संबन्ध बताया जा चुका है और अवयव अवयवी के 'समवायि-
कारण' होते हैं । जैसे तन्तु पट के 'समवायिकारण' हैं । यहां प्रतिज्ञा आदि
अनुमान वाक्य के इस प्रकार के अवयव नहीं हैं जिससे उनको अनुमान वाक्य
का 'समवायिकारण' कहा जा सके । क्योंकि वाक्य तो शब्द रूप है और
शब्द का 'समवायिकारण' आकाश ही है । इसलिये शब्दरूप अनुमान वाक्य का
'समवायिकारण' आकाश ही होगा । प्रतिज्ञादि अवयव नहीं ] ।
पांच तथा तीन अवयवों का प्रयोग—
न्याय और वैशेषिक दोनों में परार्थ अनुमान वाक्य के पांच अवयव माने
गए हैं परन्तु वैशेषिक दर्शन में उनके नाम १ प्रतिज्ञा, २ अपदेश, ३ निदर्शन,
४ अनुसन्धान और ५ प्रत्याम्नाय रखे गये हैं । अन्य दर्शनों में अवयवों के
प्रयोग के सम्बन्ध में मतभेद पाया जाता है ।
१ बौद्ध दार्शनिक केवल एक हेतु को, अथवा अधिक से अधिक हेतु और
दृष्टान्तै दो का ही प्रयोग आवश्यक मानते हैं ।
२ जैन दार्शनिकों ने अधिकारी भेद से अवयवों की संख्या का भेद निर्धारित
१ प्रमाणवार्तिक १, २८ ।
२ प्रमाणवार्तिक १, २८ ।
अवयवसंख्याभेदः ] अवयवनिरूपणम् २४१
किया है। वादिदेव नामक जैन आचार्य ने विशिष्ट अधिकारी के लिए केवल
एक हेतु का प्रयोग ही पर्याप्त माना है¹। दूसरे प्रकार के अधिकारी के लिए
प्रतिज्ञा तथा हेतु दो अवयवों का प्रयोग पर्याप्त माना है। इन दोनों अवयवों के
विषय में जैन और बौद्ध परम्परा समान है। परन्तु जैनों ने अन्य प्रकार के
अधिकारियों के लिए तीन, चार और पांच अवयवों का प्रयोग भी माना है।
३ सांख्य कारिका की माठर वृत्ति के अनुसार सांख्य में प्रतिज्ञा, हेतु
और उदाहरण इन तीन अवयवों का ही प्रयोग माना गया है।
४ शालिकनाथ मीमांसक प्रभाकर के अनुयायी हैं। उन्होंने अपनी
'प्रकरण पञ्चिका' में³ और कुमारिलभट्ट के अनुयायी पार्थसारथिमिश्र ने
'श्लोक-वार्तिक' की टीका⁴ में मीमांसक सम्मत तीन अवयवों का ही वर्णन
किया है। जैन आचार्य हेमचन्द्र तथा अनन्तवीर्य ने मीमांसकों के चार
अवयव मानने का उल्लेख किया है। वह यथार्थ नहीं है। क्योंकि मीमांसकों के
दोनों सम्प्रदाय तीन अवयव ही मानते हैं। उन तीन अवयवों के भी दो
प्रकार हो सकते हैं।
'उदाहरणपर्यन्तं यद्बोदाहरणादिकम् ।'
अर्थात् तीन अवयव या तो उदाहरण पर्यन्त हो सकते हैं अथवा उदा-
हरणादिक तीन हो सकते हैं। उदाहरण पर्यन्त तीन का अर्थ प्रतिज्ञा, हेतु
तथा उदाहरण यह तीन होगा। और उदाहरणादिक तीन का अर्थ उदाहरण,
उपनय, निगमन यह तीन होगा।
पश्चिमी तर्क में अवयवों का प्रयोग—
पश्चिमी तर्क के प्रवर्तक अरस्तू ने भी इसी प्रकार अनुमान वाक्य के तीन
अवयव माने हैं और उनका विभाजन 'उदाहरण पर्यन्त' और 'उदाहरणादि'
इन दो प्रक्रियाओं से किया है। उसके अनुसार परार्थानुमान में उदाहरण
पर्यन्त अर्थात् प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण इन तीन अवयवों का प्रयोग होता है।
और स्वार्थानुमान में उदाहरणादिक अर्थात् उदाहरण, उपनय और निगमन
इन तीन अवयवों का प्रयोग होता है। स्वार्थानुमान में प्रयुक्त होने वाले
उदाहरणादिक अवयव प्रयोग को पश्चिमी तर्क में 'सिन्थैटिक सिलाजिज्म' संयोजक
अनुमान कहा जाता है। और परार्थानुमान में प्रयुक्त होने वाले उदाहरण
१ स्याद्वाद २० पृ० ५४८ । २ स्याद्वाद २० पृ० ५६४ ।
३ प्रकरण पञ्चिका पृ० ८३, ८५ । ४ अनुमानश्लोक ।
१६ त० भा०
२४२ तर्कभाषा [ तर्कः
८ तर्कः
तर्कोऽनिष्टप्रसङ्गः । स च सिद्धव्याप्तिकयोर्धर्मयोर्व्याप्याङ्गीकारेण
अनिष्टव्यापकप्रसञ्जनरूपः । यथा 'यद्यत्र घटोऽभविष्यत् तर्हि भूतुल-
मिवादृक्ष्यत्' इति ।
स चायं तर्कः प्रमाणानामनुग्राहकः । तथाहि 'पर्वतोऽयं साग्निः
पर्यन्त अवयव प्रयोग को 'अनेलैटिक सिलाजिज्म' विश्लेषक-अनुमान कहा जाता
है । इनमें से 'सिन्थेटिक सिलाजिज्म' का स्वरूप इस प्रकार बनता है—
१ उदाहरण । जहां जहां धूम होता है वहां वहां अग्नि होती है जैसे
महानस में—
२ उपनय । यह पर्वत धूमवान् है ।
३ निगमन । इसलिए यह [ पर्वत ] वह्निमान् है ।
इसमें उदाहरण को 'मेजर प्रेमेसिस', उपनय को 'माइनर प्रेमेसिस',
और निगमन को 'कन्क्ल्यूज़न' कहा जाता है । परार्थानुमान में प्रयुक्त होने
वाले 'अनेलैटिक सिलाजिज्म' में प्रतिज्ञा को 'कन्क्ल्यूज़न', हेतु को 'माइनर
प्रेमेसिस' और उदाहरण को 'मेजर प्रेमेसिस' कहा जाता है। उस विश्लेषक
अनुमान का स्वरूप इस प्रकार होगा—
१ प्रतिज्ञा [ कन्क्ल्यूज़न ] यह पर्वत वह्निमान् है ।
२ हेतु [ माइनर प्रेमेसिस ] क्योंकि वह धूमवान् है ।
३ उदाहरण [ मेजर प्रेमेसिस ] और जहां जहां धूम होता है वहां वहां
वह्नि होती है जैसे महानस में ।
८ तर्क
अवयवों के निरूपण के बाद क्रमप्राप्त 'तर्क' का निरूपण प्रारम्भ करते हैं ।
तर्क अनिष्ट प्रसङ्ग [ को कहा जाता ] है। और वह दो व्याप्ति युक्त धर्मों
में से व्याप्य के स्वीकार करने से अनिष्ट व्यापक की प्रसक्ति रूप है । जैसे 'यदि
यहां घड़ा होता तो दिखलाई देता' । [ यहां 'जो होता है सो दिखलाई देता है'
यह व्याप्ति है। इसमें होना व्याप्य है दिखलाई देना व्यापक है । 'यदि यहां घड़ा
होता' इस व्याप्य को स्वीकार करके, 'तो दिखलाई देता' इस अनिष्ट की प्रसक्ति
करना तर्क है । जहां घड़ा दिखलाई नहीं देता है वहां उसकी प्रसक्ति ही अनिष्ट
प्रसञ्जन रूप है ]।
यह तर्क [ स्वयं प्रमाण नहीं है किन्तु ] प्रमाणों का अनुग्राहक [ समर्थक ]
है । जैसे कि 'यह पर्वत अग्नि युक्त है अथवा अग्नि रहित' इस सन्देह के बाद
निर्णयः ] निर्णयनिरूपणम् २४३
उतानग्निः' इति सन्देहानन्तरं यदि कश्चिन्मन्येतानग्निरयमिति तदा
तं प्रति 'यद्ययमनग्निरभविष्यत् तदानग्नित्वादधूमोऽप्यभविष्यत्' इत्य-
धूमत्वप्रसञ्जनं क्रियते । स एष प्रसङ्गस्तर्क इत्युच्यते । अयं चानुमानस्य
विषयशोधकः । प्रवर्त्तमानस्य धूमवत्त्वलिङ्गकानुमानस्य विषयमग्निमनु-
जानाति। अनग्निमत्त्वस्य प्रतिक्षेपात्। अतोऽनुमानस्य भवत्यनुग्राहक इति।
अत्र कश्चिदाह, 'तर्कः संशय एवान्तर्भवति' इति । तन्न । एककोटि-
निश्चितविषयत्वात् तर्कस्य ।
९ निर्णयः
निर्णयोऽवधारणज्ञानम् । तच्च प्रमाणानां फलम् ।
१० वादः
तत्त्वबुभुत्सोः कथा वादः । स चाष्टनिग्रहाणामधिकरणम् । ते च
यदि कोई यह कहे कि 'यह अग्नि रहित होता है' तो 'अग्नि रहित होने से धूम
रहित भी होना चाहिए' इस प्रकार [धूमवान् दिखलाई देने वाले पर्वत में अनिष्ट]
अधूमवत्त्व [ धूम राहित्य ] की प्रसक्ति की जाती है । यह [ अनिष्ट ] प्रसङ्ग
'तर्क' कहा जाता है । और यह अनुमान का विषय शोधक होता है । प्रवर्त्तमान
धूमवत्त्व लिङ्गक अनुमान के विषय [ साध्य ] अग्नि का अनुमोदन करता है ।
अनग्निमत्त्व का निषेध करके । इस लिए अनुमान का अनुग्राहक होता है ।
यहां [ तर्क के विषय में ] कोई कहता है कि 'तर्क संशय के ही अन्तर्गत
हो जाता है' । वह ठीक नहीं है । तर्क के एक कोटि में निश्चित रूप होने से
[ संशय उभयकोटिक ज्ञान होता है । 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इस संशय के उदाहरण
में किसी एक कोटि में निश्चय नहीं है परन्तु तर्क एक कोटि में निश्चित है इसलिए
वह संशय के अन्तर्गत नहीं हो सकता है ]
जैन परम्परा में अकलङ्क ने परोक्ष प्रमाण के एक भेद के रूप में 'तर्क'
को भी एक प्रमाण माना है। मीमांसा में 'तर्क' के लिए 'ऊह' शब्द का प्रयोग
हुआ है । त्रिविधश्च ऊहः । मंत्र-साम-संस्कार-विषयः । परन्तु न्याय और बौद्ध
दोनों परम्पराओं में 'तर्क' को प्रमाण रूप नहीं अपितु प्रमाणों का 'अनुग्राहक'
ही माना है। मीमांसा में भी यही स्थिति समझनी चाहिए ।
९ निर्णय
'निर्णय' निश्चयात्मक ज्ञान [ कहलाता ] है और वह प्रमाणों का फल
[ होता ] है ।
१० वाद
तत्त्वज्ञान के इच्छुकों [ वादी प्रतिवादी ] की कथा 'वाद' [ कहलाती ] है ।
२४४ तर्कभाषा [ कथाभेदाः
न्यून-अधिक-अपसिद्धान्ताः, हेत्वाभासपञ्चकञ्च, इत्यष्टौ निग्रहाः ।
११ जल्पः
उभयसाधनवती विजिगीषुकथा जल्पः । सा च यथासम्भवं सर्वनिग्र-
हाणामधिकरणम् । परपक्षे दूषिते स्वपक्षस्थापनप्रयोगावसानश्च ।
१२ वितण्डा
स एव स्वपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा । सा च परपक्षदूषणमात्रपर्यव-
साना । नास्य वैतण्डिकस्य स्थाप्यः पक्षोऽस्ति ।
कथा तु नानावक्तृकपूर्वोत्तरपक्षप्रतिपादकवाक्यसन्दर्भः ।
और वह आठ निग्रहस्थानों का विषय है । वह [ आठ निग्रह स्थान जो वाद में
लागू हो सकते हैं, ये हैं ] १ न्यून, २ अधिक, ३ अपसिद्धान्त और पांच
हेत्वाभास । ये [ मिलकर ] आठ निग्रह [ स्थान, वाद में लागू होते ] हैं ।
११ जल्प
दोनों [ वादी प्रतिवादी, दोनों के द्वारा अपने अपने पक्ष ] के साधन से
युक्त विजयाभिलाषियों [ वादी प्रतिवादियों ] की कथा 'जल्प' [ कहलाती ] है ।
और वह यथासम्भव समस्त [ बाइस ] निग्रहस्थानों का अधिकरण है ।
और परपक्ष के खण्डन हो जाने पर अपने पक्ष के निणर्य में समाप्त होने वाली
[ कथा जल्प ] है ।
१२ वितण्डा
अपने पक्ष की स्थापना से रहित वह [ विजिगीषु कथारूप जल्प ] ही
'वितण्डा' [ कहलाता ] है । और वह केवल परपक्ष के दूषण में समाप्त होता
है । इस वैतण्डिक का [ अपना ] स्थापनीय [ कोई ] पक्ष नहीं होता है [ अर्थात्
वह किसी को अपना पक्ष कह कर स्थापित नहीं करता है केवल दूसरे के पक्ष
का खण्डन ही करना अपना प्रयोजन मानता है ] ।
अनेक वक्ताओं से युक्त पूर्व पक्ष और उत्तरपक्ष का प्रतिपादक वाक्यसमूह
कथा [ कहलाता ] है ।
कथा भेदों का तुलनात्मक विवेचन—
अनेक वक्ता मिल कर किसी तत्त्व के निर्णय अथवा जय पराजय के लिए
पूर्वोत्तर पक्ष के रूप में जो चर्चा या वार्तालाप करते हैं उसको 'कथा' कहते हैं ।
उसके तीन भेद हैं १ वाद, २ जल्प और ३ वितण्डा । इनमें से तत्त्वज्ञान की
इच्छा से गुरु या सब्रह्मचारी आदि के साथ जो 'कथा' होती है उसको 'वाद'
कथाभेदाः ] कथाभेदनिरूपणम् २४५
कहते हैं। अपने पाण्डित्य आदि के द्योतन के लिए दो प्रतिद्वन्द्वी पण्डितों
आदि में जो 'कथा' होती है उस के 'जल्प' और 'वितण्डा' दो भेद हैं। यदि
वह दोनों वादी और प्रतिवादी अपने अपने पक्ष की स्थापना और दूसरे का
खण्डन करते हैं तो उस 'कथा' को 'जल्प' कहते हैं। और जहां एक वादी तो
अपने पक्ष की स्थापना करता है परन्तु दूसरा प्रतिवादी अपने पक्ष की
स्थापना नहीं करता केवल पहिले का खण्डन मात्र करता है उसको वितण्डा
कहते हैं। इस प्रकार न्याय शास्त्र में कथा के तीन भेद माने गए हैं।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'चरक' में भी इन त्रिविध कथाओं की चर्चा की
गई है। परन्तु वहां उनके वर्णन की शैली में कुछ भेद है। 'चरक' ने 'कथा'
के स्थान पर 'सम्भाषा' शब्द का प्रयोग किया है और उस 'सम्भाषा' के प्रथम
दो भेद किए हैं एक 'सन्धाय-सम्भाषा' और दूसरा 'विगृह्य-सम्भाषा'। इनमें
से 'सन्धाय सम्भाषा' न्याय की 'वाद' कथा के स्थान पर है। और दूसरे
'विगृह्य सम्भाषा' के फिर 'जल्प' और 'वितण्डा' यह दो भेद किए गए हैं।
इस प्रकार चरक का 'विगृह्य-सम्भाषा' और न्याय का 'विजिगीषु-कथा' शब्द
समानार्थक हैं। इसीलिए न्याय दर्शन के वात्स्यायन भाष्य में 'विगृह्येति
विजिगीषया' और न्याय सूत्र में 'ताभ्यां विगृह्य कथनम्' में भी 'विगृह्य'
शब्दों का प्रयोग किया गया है।
जैन परम्परा में 'कथा' का केवल एक ही भेद माना है 'वाद'। उन्होंने
'जल्प' और 'वितण्डा' को 'कथा' नहीं अपि तु 'कथाभास' माना है। इस
विषय को उनके 'कथात्रयभङ्ग' नामक ग्रन्थ में विस्तार पूर्वक वर्णन किया
गया है। न्याय परम्परा में विजिगीषु 'छल' और असदुत्तर रूप 'जाति' का
प्रयोग कर के भी अपने प्रतिवादी को पराजित कर सकता है परन्तु जैन
आचार्यों ने कथा में 'छल' आदि के प्रयोग का सर्वथा निषेध किया है। इस-
लिए उनके मतानुसार 'विजिगीषु' भी लगभग 'तत्त्वबुभुत्सु' के समकक्ष ही है।
प्रारम्भ में बौद्ध भी कथा के तीन ही प्रकार के भेद मानते थे परन्तु अन्त में
जैनों के समान वह भी कथा का एक ही भेद मानने लगे।
कथा के 'वाद' 'जल्प' 'वितण्डा' रूप तीनों भेदों के निरूपण के बाद,
क्रम प्राप्त होने से हेत्वाभास का दोबारा वर्णन प्रारम्भ करते हैं। यद्यपि पहिले
अनुमान के प्रकरण में भी हेत्वाभासों का वर्णन किया जा चुका है परन्तु यहां
क्रम प्राप्त होने से उनका दोबारा वर्णन किया जा रहा है। यह हेत्वाभासों का
दोबारा वर्णन तो अवश्य है परन्तु वह केवल पुनरुक्ति-मात्र नहीं है। अपितु
उस में कुछ विशेष ज्ञातव्य नई बातें भी यहां दी गई हैं।
२४६ | तर्कभाषा | [ हेत्वाभासाः
१३ हेत्वाभासाः
उक्तानां पक्षधर्मत्वादिरूपाणां मध्ये येन केनापि रूपेण हीना अहे-
तवः । तेऽपि कतिपयहेतुरूपयोगाद्धेतुवदाभासमाना हेत्वाभासाः । ते च
असिद्ध-विरुद्ध-अनैकान्तिक-प्रकरणसम-कालात्ययापदिष्ट-भेदात् पञ्चैव ।
अत्रोदयनेन 'व्याप्तस्य हेतोः पक्षधर्मतया प्रतीतिः सिद्धिस्तदभावोऽ-
सिद्धिः' इत्यसिद्धिलक्षणमुक्तम् । तच्च यद्यपि विरुद्धादिष्वपि सम्भवतीति
साङ्कर्यं प्रतीयते । तथापि यथा न साङ्कर्यं तथोच्यते । यो हि
साधने पुरः परिस्फुरति समर्थश्च दुष्टज्ञप्तौ स एव दुष्टज्ञप्तिकारको
दूषणमिति यावत् नान्य इति । तेनैव पुरावस्फूर्तिकेन दुष्टौ ज्ञापितायां
कथापर्यवसाने जाते तदुपजीविनोऽन्यस्यानुपयोगात् । तथा च सति यत्र
१३ हेत्वाभास
[अनुमान प्रकरण में] कहे हुए पक्षधर्मत्व आदि [ १ पक्षसत्त्व, २ सपक्षसत्त्व
३ विपक्षव्यावृत्तत्व, ४ अबाधितविषयत्व, और ५ असत्प्रतिपक्षत्व इन पांच ]
रूपों में से किसी एक रूप से भी हीन [ होने से जो वस्तुतः ] अहेतु हैं । वह
भी [ तृतीयान्त या पञ्चम्यन्त प्रयोग आदि रूप तथा पक्षसत्त्वादि रूप ] हेतु के
कतिपय धर्मों के योग से हेतु के समान आभासित होने से 'हेत्वाभास' [ कहलाते ]
हैं । और वह १ असिद्ध, २ विरुद्ध, ३ अनैकान्तिक, ४ प्रकरणसम तथा काला-
त्ययापदिष्ट भेद से पांच ही होते हैं ।
इनमें से [ असिद्ध नामक प्रथम हेत्वाभास की व्याख्या करते समय 'न्याय-
वार्तिक-तात्पर्यटीका-परिशुद्धि' के लेखक ] उदयनाचार्य ने 'व्याप्तियुक्त हेतु की
पक्षधर्मतया प्रतीति सिद्धि [ कहलाती ] है और उसका अभाव असिद्धि है यह
असिद्धि का लक्षण किया है। और यह 'लक्षण' यद्यपि विरुद्ध आदि [ अन्य
हेत्वाभासों ] में भी हो सकता है इसलिए साङ्कर्य प्रतीत होता है फिर जिस
प्रकार साङ्कर्य [ दोष ] न हो [ सके ] इस प्रकार [ उसकी व्याख्या ] कहते हैं।
जो [ दूषण ] साधन में पहिले प्रतीत होता है और [ उस हेतु की ] दुष्टता-सूचन
में समर्थ होता है वही [ उस हेतु का ] दुष्टतासूचक अर्थात् दूषण होता है
[ बाद में प्रतीति होने वाला ] अन्य [ दूषण, दूषण ] नहीं । [ होता क्योंकि ]
उसी [ प्रथम प्रतीत होने वाले दोष ] से दुष्टता सूचित हो जाने पर [ वादी
अथवा प्रतिवादी के निग्रहस्थान में आ जाने से ] कथा की [ जय-पराजय निर्णय
रूप ] समाप्ति हो जाने से उसके आश्रित रहने [ और बाद में प्रतीत होने ] वाले
अन्य [ दोष ] का [ कोई ] उपयोग न होने से [ उस बाद में प्रतीत होनेवाले का
आश्रयासिद्धः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २४७
विरोधो साध्यविपर्ययव्याप्याख्यो दुष्टज्ञप्तिव्यभिचाराद्यस्तथाभूतास्तेऽ-
नैकान्तिकाद्यस्त्रयः । ये पुनर्व्याप्तिपक्षधर्मताविशिष्टहेतुस्वरूपज्ञप्त्यभावेन
पूर्वोक्ता असिद्ध्यादयो दुष्टज्ञप्तिकारकाः, दूषणानीति यावत् । तथाभूतः
सोऽसिद्धः ।
स च त्रिविधः । आश्रयासिद्ध-स्वरूपासिद्ध-व्याप्यत्वासिद्धभेदात् । तत्र यस्य
हेतोराश्रयो नावगम्यते स आश्रयासिद्धः । यथा 'गगनारविन्दं सुरभि, अरवि-
न्दत्वात्, सरोजारविन्दवत्' । अत्र हि गगनारविन्दमाश्रयः स च नास्त्येव ।
अयमप्याश्रयासिद्धः । तथाहि 'घटोऽनित्यः कार्यत्वात् पटवत्'
इति । नन्वाश्रयस्य घटादेः सत्त्वात् कार्यत्वादिति हेतुर्नाश्रयासिद्धः,
सिद्धसाधकस्तु स्यात्, सिद्धस्य घटानित्यत्वस्य साधनात् ।
कोई मूल्य नहीं होता है । ] ऐसा होने पर जहां 'साध्यविपर्यय व्याप्ति' रूप विरोध
[ दोष पहिले प्रतीत होने से ] दुष्टतासूचक है वहां 'विरुद्ध' हेत्वाभास है [ विरोध
के बाद वहां असिद्ध का लक्षण भी भले ही प्रतीत हो परन्तु अब उसका कोई
उपयोग नहीं है। इसलिए वहाँ केवल विरुद्ध हेत्वाभास व्यवहार होगा । असिद्ध
व्यवहार नहीं होगा । अतएव 'असिद्ध' और 'विरुद्ध' का सङ्कर होने का कोई
अवसर नहीं है । ] इसी प्रकार जहां व्यभिचार आदि वैसे [ अर्थात् प्रथम प्रतीत
होकर दुष्टतासूचक ] हैं वह 'अनैकान्तिक' आदि तीन [ हेत्वाभास होंगे । वहां
भी बाद में असिद्ध का लक्षण प्रतीत होने पर भी 'असिद्ध' व्यवहार नहीं होगा
अतः साङ्कर्य की शङ्का नहीं हो सकती है ] और फिर जो व्याप्ति और पक्षधर्मता-
विशिष्टहेतु के स्वरूप का ज्ञापक न होने से पूर्वोक्त असिद्ध आदि दुष्टतासूचक
अर्थात् दूषण हैं वह 'असिद्ध' [ हेत्वाभास ] है । ऐसी व्याख्या करने से असिद्ध
का किसी के साथ सङ्कर नहीं हो सकता है ] ।
और वह [ असिद्ध ] तीन प्रकार का होता है । १ आश्रयासिद्ध, २ स्वरूपा-
सिद्ध और व्याप्यत्वासिद्ध भेद से । जिस हेतु का आश्रय [ अर्थात् पक्ष ] न
प्रतीत होता हो वह 'आश्रयासिद्ध' [ हेत्वाभास ] है । जैसे 'आकाश, कमल
सुगन्धित है, कमल होने से, तालाब में उत्पन्न हुए कमल के समान' । यहां
आकाश, कमल [ पुष्प ] आश्रय [ अर्थात् पक्ष ] है । और वह [ वस्तुतः ] है
ही नहीं । [ इसलिए 'अरविन्दत्वात्' यह हेतु 'आश्रयासिद्ध' हेत्वाभास है ] ।
यह भी 'आश्रयासिद्ध' है जैसे 'घट अनित्य है, कार्य होने से पट के समान' ।
[ प्रश्न ] आश्रयभूत घटादि के सत् [ विद्यमान ] होने से [ इस अनुमान में
प्रयुक्त ] 'कार्यत्वात्' हेतु 'आश्रयासिद्ध' नहीं हो सकता है । सिद्धसाधक तो कह!
२४८ तर्कभाषा [ स्वरूपासिद्धः
मैवम् । न हि स्वरूपेण कश्चिदाश्रयो भवत्यनुमानस्य, किन्तु सन्दि-
ग्धधर्मवत्त्वेन । तथा चोक्तं भाष्ये—
'नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थेऽपि तु सन्दिग्धेऽर्थे न्यायः प्रवर्तते' ।
न च घटे नित्यत्वसन्देहोऽस्ति ! अनित्यत्वस्य निश्चितत्वात् । तेन
यद्यपि स्वरूपेण घटो विद्यते, तथाप्यनित्यत्वसन्देहाभावान्नासावाश्रय
इत्याश्रयासिद्धत्वादहेतुः ।
स्वरूपासिद्धस्तु स उच्यते यो हेतुराश्रये नावगम्यते । यथा 'सामान्यम-
नित्यं कृतकत्वात्' इति । कृतकत्वं हि हेतुराश्रये सामान्ये नास्त्येव ।
भागासिद्धोऽपि स्वरूपासिद्ध एव । यथा 'पृथिव्यादयश्चत्वारः परमाणवो
जा 'सकता है पूर्वसिद्ध घट के अनित्यत्व का ही साधक होने से । [ फिर आप
उसको 'आश्रयासिद्ध' कैसे कहते हैं ] ?
[ उत्तर ] ऐसा कहना ठीक नहीं है [ कि इस अनुमान में कार्यत्वात् हेतु
आश्रयासिद्ध नहीं है। क्योंकि ] कोई [ घट आदि ] वस्तु स्वरूप से अनुमान का
आश्रय [ अर्थात् पक्ष ] नहीं होती है, किन्तु [ 'सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः' इस
लक्षण के अनुसार ] सन्दिग्ध धर्म का आश्रय होने से ही । [ अनुमान का
आश्रय या पक्ष बनती है ] जैसा कि [वात्स्यायन] भाष्य में कहा भी है कि—
[ सर्वथा ] 'अज्ञात अर्थ अथवा [ सर्वथा ] निश्चित [ ज्ञात ] अर्थ में
[ न्याय ] अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती किन्तु सन्दिग्ध अर्थ में' [ ही अनुमान
की प्रवृत्ति होती है । इसलिए घट भी 'सन्दिग्ध-साध्यवान्' होने पर ही अनुमान
का 'आश्रय' अथवा 'पक्ष' हो सकता है ] ।
[ किन्तु ] घट में अनित्यत्व का सन्देह नहीं है । अनित्यत्व का निश्चय होने
से । इसलिए यद्यपि स्वरूपतः घट विद्यमान है तथापि अनित्यत्व का सन्देह न
होने से वह [ सन्दिग्धसाध्यवान् न होने से ] 'आश्रय' [ पक्ष ] नहीं है । इसलिए
[ कार्यत्वात् हेतु ] 'आश्रयासिद्ध' होने से अहेतु [ हेत्वाभास ] है ।
'स्वरूपासिद्ध' [ हेत्वाभास ] तो वह कहलाता है जो हेतु [ अपने ] आश्रय
[ पक्ष ] में नहीं पाया जाता है । जैसे 'सामान्य [ घटत्व जाति ] अनित्य है
कृतक [ जन्य ] होने से'। [ इस अनुमान में ] कृतकत्व हेतु आश्रय [ पक्ष ]
सामान्य में नहीं रहता है [ क्योंकि सामान्य कृतक नहीं, नित्य है । इसलिए
यहां 'कृतकत्व' हेतु 'स्वरूपासिद्ध' है ] ।
'भागासिद्ध' भी 'स्वरूपासिद्ध' ही [होता] है । 'जैसे पृथिवी आदि चार [के]
परमाणु नित्य हैं, गन्धयुक्त होने से' यहां 'गन्धवत्त्व' [हेतु] पक्ष बनाए हुए [पृथिवी,
स्वरूपासिद्धः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २४६
.नित्यगन्धवत्त्वात्' इति । गन्धवत्त्वं हि पक्षीकृतेषु सर्वेषु नास्ति, पृथिवी-
मात्रवृत्तित्वात् । अतएव भागे स्वरूपासिद्धः ।
तथा विशेषणासिद्ध-विशेष्यासिद्ध-असमर्थविशेषणा-सिद्ध-असमर्थविशेष्यासिद्धा-
दयः स्वरूपासिद्धभेदाः । तत्र विशेषणासिद्धो यथा 'शब्दो नित्यो द्रव्यत्वे
सत्यस्पर्शत्वात्' । अत्र हि द्रव्यत्वविशिष्टमस्पर्शत्वं हेतुर्नास्पर्शत्वमात्रम् ।
शब्दे च द्रव्यत्वं विशेषणं नास्ति गुणत्वात्, अतो विशेषणासिद्धः । न
चासति विशेषणे द्रव्यत्वे तद्विशिष्टमस्पर्शत्वमस्ति । विशेषणाभावे
विशिष्टस्याप्यभावात् । यथा दण्डमात्राऽभावे पुरुषाऽभावे वा दण्ड-
विशिष्टस्य पुरुषस्याभावः । तेन सत्यप्यस्पर्शत्वे द्रव्यत्वविशिष्टस्य
हेतोरभावात् स्वरूपासिद्धत्वम् ।
विशेष्यासिद्धो यथा 'शब्दो नित्योऽस्पर्शत्वे सति द्रव्यत्वात्' इति ।
अत्रापि विशिष्टो हेतुः । न च विशेष्याऽभावे विशिष्टं स्वरूपमस्ति ।
विशिष्टश्च हेतुर्नास्त्येव ।
जल, वायु, अग्नि इन चार के परमाणु ] सब में नहीं है । केवल पृथिवी में
रहने वाला होने से । इसलिए [ पक्षभूत चार परमाणुओं के ] भाग [ अर्थात्
पृथिवी को छोड़ कर शेष तीन प्रकार के परमाणुओं ] में [ अविद्यमान होने से ]
स्वरूपासिद्ध है ।
इसी प्रकार १ 'विशेषणासिद्ध', २ 'विशेष्यासिद्ध', ३ 'असमर्थविशेषणासिद्ध'
और ४ 'असमर्थविशेष्यासिद्ध' आदि [ भी ] स्वरूपासिद्ध के भेद हैं । उनमें से
'विशेषणासिद्ध' जैसे, 'शब्द नित्य है द्रव्य होकर स्पर्श रहित होने से' । यहां [इस
अनुमान में ] द्रव्यत्वविशिष्ट अस्पर्शत्व हेतु है केवल अस्पर्शत्वमात्र नहीं । और
शब्द में विशेषणभूत द्रव्यत्व नहीं है । [शब्द के] गुण होने से । इसलिए [ 'विशे-
षणाभावे विशिष्टस्याप्यभावः' इस नियम के अनुसार द्रव्यत्व रूप विशेषण के
अभाव में 'द्रव्यत्वे सत्यस्पर्शत्वात्' यह विशिष्ट हेतु भी नहीं है] विशेषणासिद्ध' है ।
विशेषण द्रव्यत्व के न होने पर तद्विशिष्ट अस्पर्शत्व [ रूप विशिष्ट हेतु ] भी
नहीं है । विशेषण के अभाव में विशिष्ट का अभाव होने से । जैसे [ दण्डी पुरुषः
इस प्रतीति में विशेषण रूप ] दण्डमात्र के अभाव में अथवा [ विशेष्यभूत ]
पुरुष के अभाव में [अर्थात् केवल दण्ड अथवा केवल पुरुष होने पर] दण्डविशिष्ट
पुरुष का अभाव होता है । इसलिए [ शब्द में ] अस्पर्शत्व [ स्पर्शराहित्य ] होने
पर भी द्रव्यत्व विशिष्ट [ अस्पर्शत्व रूप ] हेतु के न होने से 'स्वरूपासिद्धत्व' है ।
'विशेष्यासिद्ध' जैसे [ उसी को उल्टा कर देने से ] 'शब्द नित्य है स्पर्श-
रहित [ होकर ] द्रव्य होने से' । यहां भी विशिष्ट हेतु है । [ शब्द में विशेषण
२५० तर्कभाषा [ स्वरूपासिद्धः
असमर्थविशेषणासिद्धो यथा, 'शब्दो नित्यो गुणत्वे सत्यकारणकत्वात्'।
अत्र हि विशेषणस्य गुणत्वस्य न किञ्चित् सामर्थ्यमस्तीति । विशेष्यस्या-
कारणकत्वस्यैव नित्यत्वसाधने सामर्थ्यात् । अतोऽसमर्थविशेषणता ।
स्वरूपासिद्धत्वं तु विशेषणाभावे विशिष्टस्याप्यभावात् ।
ननु विशेषणं गुणत्वं तत्र शब्देऽस्त्येव, तत्कथं विशेषणाभावः ?
सत्यमस्त्येव गुणत्वं, किन्तु न तद्विशेषणम् । तदेव हि हेतोर्विशेषणं
भवति यदन्यव्यवच्छेदेन प्रयोजनवत् । गुणत्वं तु निष्प्रयोजनमतो-
ऽसमर्थमित्युक्तमेव ।
असमर्थविशेष्यो यथा तत्रैव तद्वैपरीत्येन प्रयोगः । तथाहि, 'शब्दो
नित्योऽकारणकत्वे सति गुणत्वात्' इति । अत्र तु विशेषणमात्रस्यैव नित्य-
त्वसाधने समर्थत्वादू विशेष्यमसमर्थम् । स्वरूपासिद्धत्वं तु विशेष्याभावे
रूप अस्पर्शत्व तो है परन्तु विशेष्य रूप द्रव्यत्व नहीं है क्योंकि शब्द द्रव्य नहीं
अपितु गुण है। इसलिए ] विशेष्य के अभाव में विशिष्ट हेतु [पक्षभूत शब्द में] नहीं
रहता है। [अतएव] विशिष्टहेतु [शब्दमें] नहीं है [इसलिए यह भी स्वरूपासिद्ध ही हुआ]।
'असमर्थ विशेषणासिद्ध' जैसे शब्द नित्य है गुण होकर कारण रहित होने से।
यहां [ इस अनुमान में ] विशेषण 'गुणत्व' की कुछ भी उपयोगिता [सामर्थ्य] नहीं
है। विशेष्य रूप 'अकारणकत्व' का ही नित्यत्व-सिद्धि में सामर्थ्य होने से ।
[ अर्थात् नित्यत्व की सिद्धि के लिए अकारणकत्व हेतु ही पर्याप्त है। जो कारण
रहित है जिसका कोई कारण नहीं होता वह नित्य कहलाता है फिर चाहे वह
द्रव्य हो या गुण। नित्यत्व की सिद्धि के लिए द्रव्यत्व अथवा गुणत्व का कोई
उपयोग नहीं है ] । इसलिए 'असमर्थ विशेषणता' है। [उस असमर्थ विशेषणका]
'स्वरूपासिद्धत्व' तो विशेषण के अभाव में विशिष्ट का अभाव होने से है।
[ प्रश्न ] विशेषण गुणत्व वहां शब्द में है ही, फिर विशेषण का अभाव
कैसे [ कहते हैं ] ?
[ उत्तर ] ठीक है गुणत्व [ शब्द में अवश्य ] है किन्तु वह विशेषण नहीं
है। वह ही हेतु का विशेषण होता है जो अन्य का व्यावर्तक और सप्रयोजन हो ।
[ इस अनुमान में ] गुणत्व तो निष्प्रयोजन ही है यह [ अभी ] कह चुके हैं।
[ शब्द के नित्यत्व की सिद्धि में अकारणकत्व की ही उपयोगिता है गुणत्व का
कोई उपयोग न होने से वह व्यर्थ ही है यह अभी कहा था ] ।
'असमर्थविशेष्यासिद्ध' जैसे उस [अनुमान] में ही उसका उल्टा प्रयोग करने से
जैसे कि 'शब्द नित्य है कारण रहित गुण होने से'। यहां तो नित्यत्व सिद्धि में
विशेषणमात्र [ अकारणकत्व ] का ही सामर्थ्य होने से विशेष्य [ गुणत्वे सति यह
व्याप्यत्वासिद्धः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २५१
विशिष्टाभावाद्, विशिष्टस्य च हेतुत्वेनोपादानात् । शेषं पूर्ववत् ।
व्याप्यत्वासिद्धस्तु स एव यत्र हेतोर्व्याप्तिर्नावगम्यते । स द्विविधः ।
एकः साध्येनासहचरितः, अपरस्तु सोपाधिकसाध्यसम्बन्धी । तत्र प्रथमो यथा
'यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधरः, संश्च विवादास्पदीभूतः शब्दादिः'
इति । अत्र हि शब्दादिः 'पक्षः, तस्य क्षणिकत्वं साध्यं, सत्त्वं हेतुः-न
चास्य हेतोः क्षणिकत्वेन सह व्याप्तौ प्रमाणमस्ति ।
इदानीमुपाधिसहितो व्याप्यत्वासिद्धः प्रदर्श्यते । तद्यथा 'स श्यामो
मैत्रीतनयत्वात् परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इति । अत्र हि मैत्री-
तनयत्वेन श्यामत्वं साध्यते । न च मैत्रीतनयत्वं श्यामत्वे प्रयोजकं,
अंश ] असमर्थ हैं । [ विशेष्य रूप गुणत्व यद्यपि शब्द में है परन्तु जो अन्य से
व्यावर्तक और प्रयोजनवत् होता है वही विशेष्य होता है । गुणत्व स्वरूपतः
शब्द में रहने पर भी प्रकृत नित्यत्व की सिद्धि में उपयोगी न होने से विशेष्य
नहीं कहा जा सकता है । अतएव ] विशेष्य के अभाव में विशिष्ट का अभाव
होने से, और विशिष्ट के हेतु रूप में गृहीत होने से 'स्वरूपासिद्ध' है । शेष सब
पूर्ववत् [ समझना चाहिये ] ।
'व्याप्यत्वासिद्ध' [ हेत्वाभास ] तो वह ही है जहां हेतु की व्याप्ति प्रतीत
नहीं होती । वह दो प्रकार का है । एक 'साध्य के साथ असहचरित' [ अर्थात्
व्याप्तिग्राहक-प्रमाणाभावात् व्याप्यत्वासिद्ध ] और दूसरा 'सोपाधिक साध्य-
सम्बन्धी' [ अर्थात् उपाधिसद्भावात् व्याप्यत्वासिद्ध ] उनमें पहिला [ उदाहरण ]
जैसे 'जो सत् है सो क्षणिक है जैसे मेघपटल, और विवादास्पद [ शब्द आदि ]
सत् है' । यहां शब्दादि पक्ष है, उसका क्षणिकत्व साध्य है और सत्त्व हेतु है ।
परन्तु उस [ सत्त्व ] हेतु की क्षणिकत्व के साथ व्याप्ति में कोई प्रमाण नहीं है ।
इसलिए यह 'व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात् व्याप्यत्वासिद्ध है ] ।
यह पूरा अनुमान आचार्य ज्ञानश्री ने एक श्लोक में इस प्रकार दिखलाया है-
यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधरः सन्तश्च भावा अमी
सत्ता शक्तिरिहार्थकर्मणि मितेः सिद्धेषु सिद्धा न सा ।
नाप्येकैव विधान्यथा परकृतेनापि क्रियादिर्भवेत् ।
द्वेधापि क्षणभङ्गसङ्गतिरतः साध्ये च विश्राम्यति ॥
अब 'उपाधि सहित व्याप्यत्वासिद्ध' को दिखलाते हैं जैसे कि 'वह श्याम
है मैत्री का पुत्र होने से परिदृश्यमान मैत्री के पुत्रों के समुदाय के समान । यहां
मैत्रीतनयत्व [ हेतु ] से श्यामत्व सिद्ध किया जा रहा है । परन्तु मैत्रीतनयत्व
श्यामत्व में प्रयोजक नहीं है अपितु शाकादि खाद्य पदार्थ [ अन्न ] का परिपाक ही
२५२ तर्कभाषा [व्याप्यत्वासिद्धः
किन्तु शाकाद्यन्नपरिणाम एवात्र प्रयोजकः। प्रयोजकश्चोपाधिरुच्यते।
अतो मैत्रीतनयत्वेन श्यामत्वेन सम्बन्धे शाकाद्यन्नपरिणाम एवोपाधिः।
यथा वाग्नेर्धूमसम्बन्धे आर्द्वेन्धनसंयोगः। अतएवोपाधिसम्बन्धाद्
व्याप्तिर्नास्तीति व्याप्यत्वासिद्धोऽयं मैत्रीतनयत्वादिर्हेतुः।
तथा परोऽपि व्याप्यत्वासिद्धः। यथा 'क्रत्वन्तर्वर्तिनी हिंसा अधर्मसाधनं
हिंसात्वात् क्रतुबाह्यहिंसावत्' इति। न च हिंसात्वमधर्मे प्रयोजकं, किन्तु निषि-
द्धत्वमुपाधिरिति पूर्ववदुपाधिसद्भावाद् व्याप्यत्वासिद्धोऽयं हिंसात्वं हेतुः।
ननु 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापको यः स उपाधिः' इत्युपाधिलक्षणम्।
तच्च निषिद्धत्वे नास्ति तत् कथं निषिद्धत्वमुपाधिरिति।
मैवम्। निषिद्धत्वेऽप्युपाधिलक्षणस्य विद्यमानत्वात्। तथा हि साध्यस्य
अधर्मजनकत्वस्य व्यापकं निषिद्धत्वम्। यत्र यत्राधर्मसाधनत्वं, तत्र तत्रा-
यहां [श्यामत्व में] प्रयोजक है। और प्रयोजक को ही 'उपाधि' कहते हैं। इसलिए
मैत्रीतनयत्व के श्यामत्व के साथ [व्याप्ति अथवा साध्य-साधकभाव सम्बन्ध
[मानने] में शाकादि खाद्य पदार्थों [अन्न] का परिपाक ही 'उपाधि' है।
[इसलिए वह 'उपाधिसद्भावाद् व्याप्यत्वासिद्ध' है]
['उपाधिसद्भावात् व्याप्यत्वासिद्ध' का दूसरा उदाहरण भी दिखलाते हैं]
अथवा जैसे अग्नि के धूम के साथ [व्याप्ति] सम्बन्ध [यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र
धूमः] में 'आर्द्र-इन्धनसंयोग' [उपाधि] है। [इसी प्रकार मैत्रीतनयत्वात् हेतु
में भी] इसलिए उपाधि का सद्भाव होने से व्याप्ति नहीं है इसलिए वह हेतु
व्याप्यत्वासिद्ध है।
और भी [उपाधिसद्भावात्] व्याप्यत्वासिद्ध [का तीसरा उदाहरण] जैसे, 'यज्ञ
के अन्तर्गत [की गई] हिंसा अधर्मजनिका है, हिंसा होने से, यज्ञ से बाहर की गई
हिंसा के समान'। [इस अनुमान में हिंसात्व हेतु है और उससे अधर्मजनकत्व साध्य
है और किन्तु] हिंसात्व अधर्मजनकत्व का प्रयोजक [कारण] नहीं है अपितु
निषिद्धत्व [रूप] उपाधि [ही अधर्मजनकत्व में प्रयोजक] है। इसलिए पूर्ववत्
उपाधि के विद्यमान होनेसे यह हिंसात्व हेतु [भी] 'व्याप्यत्वासिद्ध' [हेत्वाभास] है।
[प्रश्न] साध्य का व्यापक होकर जो साधन का अव्यापक हो वह 'उपाधि'
होता है यह 'उपाधि' का लक्षण [किया गया] है। और वह [लक्षण] निषिद्धत्व
में नहीं [घटता] है तो निषिद्धत्व [को] उपाधि कैसे [कहते] हैं?
[उत्तर] यह कहना ठीक नहीं है। निषिद्धत्व में उपाधिलक्षण के विद्यमान
होने से। क्योंकि साध्यरूप अधर्मजनकत्व का निषिद्धत्व व्यापक है। जहां जहां