सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 301, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 301

२३६ तर्कभाषा [ ३ संशयः
कोटरादिकं पुरुषत्वनिश्चायकञ्च शिरःपाण्यादिकं विशेषमपश्यतः
स्थाणुपुरुषयोः समानधर्ममूर्ध्वत्वादिकञ्च पश्यतः पुरुषस्य भवति संशयः
‘किमयं स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ इति ।
द्वितीयस्तु संशयो विशेषादर्शने सति विप्रतिपत्तिजः । स यथा ‘शब्दो
नित उत अनित्य’ इति । तथा ह्येको ब्रूते शब्दो नित्य इति, अपरो ब्रूते
शब्दोऽनित्य इति । तयोर्विप्रतिपत्त्या मध्यस्थस्य पुंसो विशेषमपश्यतो
भवति संशयः ‘किमयं शब्दो नित्य’ उतानित्य इति ।
तृतीयोऽसाधारणधर्मदर्शनजस्तु संशयो यथा नित्यादनित्याच्च व्यावृत्तेन
भूमात्रासाधारणेन गन्धवत्त्वेन विशेषमपश्यतो भुवि नित्यत्वानित्यत्व-
संशयः । तथा हि ‘सकलनित्यव्यावृत्तेन गन्धवत्त्वेन योगाद्भूः किमनित्या,
उत सकलानित्यव्यावृत्तेन तेनैव योगान्नित्या’ इति संशयः ।
स्थाणु [ वृक्ष का ठूंठ ] है अथवा पुरुष’ [ इनमें विशेष धर्म वक्रकोटरादि
अथवा कर चरणादि का न दिखाई देना और समान धर्म आरोह-परिणाह
लम्बाई चौड़ाई का दिखाई देना ही संशय का कारण है । विशेषादर्शन तीनों
प्रकार के संशयों में कारण है ] ।
दूसरा संशय विशेष का अदर्शन होते हुए ‘विप्रतिपत्ति’ [ विपरीता विविधा
वा प्रतिपत्तिः विप्रतिपत्तिः । एक ही पदार्थ के विषय में दो व्यक्तियों का विपरीत
अथवा विविध प्रकार का ज्ञान ‘विप्रतिपत्ति’ कहलाता है ] से उत्पन्न [ संशय का
उदाहरण ] वह जैसे, ‘शब्द नित्य है अथवा अनित्य’ । क्योंकि एक [ वादी
वैयाकरण ] कहता है कि शब्द नित्य है और दूसरा [ प्रतिवादी नैयायिक ]
कहता है कि शब्द अनित्य है । उन दोनों की ‘विप्रतिपत्ति’ से विशेष [ नित्यत्व
या अनित्यत्व के निश्चायक हेतु ] को न देख सकने वाले, बीच के पुरुष को
संशय हो जाता है कि ‘क्या यह शब्द नित्य है अथवा अनित्य’ ।
तीसरा [ विशेषादर्शन होने पर ] असाधारणधर्म के दर्शन से उत्पन्न संशय
का उदाहरण ] तो जैसे, नित्य और अनित्य दोनों से पृथक् रहने वाले केवल
पृथिवी के असाधारण धर्म गन्धवत्त्व से, [नित्यत्व अथवा अनित्यत्व के निश्चायक]
विशेष धर्म को न जानने वाले [ पुरुष ] को पृथिवी [ के विषय ] में नित्यत्व
अथवा अनित्यत्व का संशय हो जाता है । जैसे कि [ आकाश आदि ] ‘समस्त
नित्य पदार्थों में न रहने वाले गन्धवत्त्व के योग से क्या पृथिवी अनित्य है ।
अथवा [ जल अग्नि आदि ] ‘किसी अनित्य पदार्थ में न रहने वाले उसी गन्धवत्त्व
के योग से पृथिवी नित्य है’ यह संशय हो जाता है । [ यह संशय गन्धवत्त्व रूप
असाधारण धर्म के दर्शन से होता है ।