तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रयोजनम् ] दृष्टान्तनिरूपणम् २३७
४ प्रयोजनम्
येन प्रयुक्तः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम् । तच्च सुखदुःखावाप्तिहाना ।
तदर्था हि प्रवृत्तिः सर्वस्य ।
५ दृष्टान्तः
वादिप्रतिवादिनोः संप्रतिपत्तिविषयोऽर्थो दृष्टान्तः । स द्विवधः ।
न्याय सूत्र तथा उसके वात्स्यायन भाष्य में तीन के स्थान पर संशय के
पांच कारण गिनाए हैं । उनमें 'उपलब्धि की अव्यवस्था' तथा 'अनुपलब्धि की
अव्यवस्था' यह दो संशय के कारण और दिखाए हैं । समान 'धर्म' और 'विप्रति-
पत्ति' संशय के यह दोनों कारण 'न्यायसूत्र' तथा 'तर्कभाषा' दोनों ग्रन्थों में
समान हैं । 'असाधारण धर्म' के स्थान पर न्यायसूत्र में 'अनेकधर्मोपपत्तेः'
कहा है, और वात्स्यायन भाष्य में उसका अर्थ 'समानजातीयमसमानजातीय-
ञ्चानेकम्' किया है। न्याय सूत्र में संशय का लक्षण इस प्रकार किया गया है—
समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो
विमर्शः संशयः¹ ।
४ प्रयोजन
न्याय के षोडश पदार्थों में संशय के बाद 'प्रयोजन' का स्थान आता है ।
अतएव ग्रन्थकार संशय के बाद 'प्रयोजन' का निरूपण करते हैं ।
जिससे प्रयुक्त होकर मनुष्य [ किसी कार्य में ] प्रवृत्त होता है वह 'प्रयोजन'
है । और वह [ मुख्यतः ] सुख की प्राप्ति और दुःख का नाश है । [ क्योंकि ]
उसी के लिए सब की प्रवृत्ति होती है ।
न्यायसूत्रकार ने प्रयोजन का लक्षण इस प्रकार किया है
यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्² ।
५ दृष्टान्त
प्रयोजन के बाद पांचवाँ पदार्थ 'दृष्टान्त' है । न्याय सूत्र में 'दृष्टान्त' का
लक्षण इस प्रकार किया गया है—
लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः³ ।
अर्थात् जिस अर्थ के विषय में साधारण लौकिक पुरुष और विशेषज्ञ
परीक्षक पुरुषों को एक सा ज्ञान हो जिसको दोनों एक रूप में मानते हों वह
अर्थ 'दृष्टान्त' हो सकता है। इसी बात को तर्कभाषाकार इस प्रकार कहते हैं—
वादी और प्रतिवादी दोनों के ऐकमत्य का विषय भूत अर्थ [ अर्थात्
१-३ न्याय सूत्र १, १, २३ । १, १, २४ । १, १, २५ ।