सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 304

अवयवाः ] अवयवनिरूपणम् २३६
७ अवयवाः
अनुमानवाक्यस्यैकदेशा अवयवाः । ते च प्रतिज्ञादयः पञ्च । तथा
च न्यायसूत्रम्—
‘प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः’ ।
तत्र साध्यधर्मविशिष्टपक्षप्रतिपादकं वचनं प्रतिज्ञा, यथा पर्वतोऽयं
वह्निमानिति । तृतीयान्तं पञ्चम्यन्तं वा लिङ्गप्रतिपादकं वचनं हेतुः । यथा
धूमवत्त्वेन धूमवत्त्वादिति वा । सव्याप्तिकं दृष्टान्तवचनमुदाहरणम् । यथा
पर अर्थ की विशेष परीक्षा के लिए थोड़ी देर को स्वीकार कर लिया जाय ] जैसे
मीमांसक [ शब्द को द्रव्य मानते हैं और नित्य मानते हैं। नैयायिक शब्द को
गुण और अनित्य मानते हैं । ऐसी दशा में शब्द की ] नित्यता या अनित्यता का
विशेष विचार हो सके इसलिए [ थोड़ी देर के लिए ] मान लो कि शब्द गुण है ।
[ इसको, 'अभ्युपगम-सिद्धान्त' कहते हैं । ]
इस 'अभ्युपगम-सिद्धान्त' का प्रयोग अर्थ की विशेष परीक्षा के लिए तो
किया ही जाता है । उसके अतिरिक्त अपनी बुद्धि के अतिशय के प्रदर्शन
तथा दूसरे प्रतिवादी की बुद्धि की हीनता दिखलाने के लिए भी किया जाता है ।
७ अवयव
सिद्धान्त के निरूपण के बाद न्याय के सप्तम पदार्थ अवयव का निरूपण
क्रम-प्राप्त है । अतएव उसका निरूपण प्रारम्भ करते हैं ।
अनुमान 'वाक्य के एकदेश' अवयव [ कहलाते ] हैं । वह प्रतिज्ञा आदि
पाँच हैं । जैसा कि न्यायसूत्र [ में कहा ] है—
१ प्रतिज्ञा, २ हेतु, ३ उदाहरण, ४ उपनय, और ५ निगमन अवयव हैं ।
१ उनमें से साध्य-धर्म-युक्त 'पक्ष' का प्रतिपादन करने वाला वचन 'प्रतिज्ञा'
[ कहलाता ] है । जैसे यह 'पर्वत वह्नियुक्त है' । [ इसमें पर्वत 'पक्ष' है, वह्नि
'साध्य' है । 'वह्निमान् पर्वतः' इस रूप में साध्य-धर्म-विशिष्ट 'पक्ष' का
प्रतिपादक वचन होने से यह प्रतिज्ञा है ] ।
२ तृतीयान्त अथवा पञ्चम्यन्त लिङ्ग का प्रतिपादक वचन 'हेतु' है । जैसे
'धूमवत्त्वेन' अथवा 'धूमवत्त्वात्' ।
३ व्याप्ति सहित दृष्टान्त का कथन 'उदाहरण' है । जैसे 'जो जो धूमयुक्त
होता है वह अग्नि युक्त होता है, जैसे महानस' [ रसोई घर ] ।
१ न्या० सू० १, १, ३२