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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 309, कुल 330 में से

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पृष्ठ 309

२४४ तर्कभाषा [ कथाभेदाः
न्यून-अधिक-अपसिद्धान्ताः, हेत्वाभासपञ्चकञ्च, इत्यष्टौ निग्रहाः ।
११ जल्पः
उभयसाधनवती विजिगीषुकथा जल्पः । सा च यथासम्भवं सर्वनिग्र-
हाणामधिकरणम् । परपक्षे दूषिते स्वपक्षस्थापनप्रयोगावसानश्च ।
१२ वितण्डा
स एव स्वपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा । सा च परपक्षदूषणमात्रपर्यव-
साना । नास्य वैतण्डिकस्य स्थाप्यः पक्षोऽस्ति ।
कथा तु नानावक्तृकपूर्वोत्तरपक्षप्रतिपादकवाक्यसन्दर्भः ।
और वह आठ निग्रहस्थानों का विषय है । वह [ आठ निग्रह स्थान जो वाद में
लागू हो सकते हैं, ये हैं ] १ न्यून, २ अधिक, ३ अपसिद्धान्त और पांच
हेत्वाभास । ये [ मिलकर ] आठ निग्रह [ स्थान, वाद में लागू होते ] हैं ।
११ जल्प
दोनों [ वादी प्रतिवादी, दोनों के द्वारा अपने अपने पक्ष ] के साधन से
युक्त विजयाभिलाषियों [ वादी प्रतिवादियों ] की कथा 'जल्प' [ कहलाती ] है ।
और वह यथासम्भव समस्त [ बाइस ] निग्रहस्थानों का अधिकरण है ।
और परपक्ष के खण्डन हो जाने पर अपने पक्ष के निणर्य में समाप्त होने वाली
[ कथा जल्प ] है ।
१२ वितण्डा
अपने पक्ष की स्थापना से रहित वह [ विजिगीषु कथारूप जल्प ] ही
'वितण्डा' [ कहलाता ] है । और वह केवल परपक्ष के दूषण में समाप्त होता
है । इस वैतण्डिक का [ अपना ] स्थापनीय [ कोई ] पक्ष नहीं होता है [ अर्थात्
वह किसी को अपना पक्ष कह कर स्थापित नहीं करता है केवल दूसरे के पक्ष
का खण्डन ही करना अपना प्रयोजन मानता है ] ।
अनेक वक्ताओं से युक्त पूर्व पक्ष और उत्तरपक्ष का प्रतिपादक वाक्यसमूह
कथा [ कहलाता ] है ।
कथा भेदों का तुलनात्मक विवेचन—
अनेक वक्ता मिल कर किसी तत्त्व के निर्णय अथवा जय पराजय के लिए
पूर्वोत्तर पक्ष के रूप में जो चर्चा या वार्तालाप करते हैं उसको 'कथा' कहते हैं ।
उसके तीन भेद हैं १ वाद, २ जल्प और ३ वितण्डा । इनमें से तत्त्वज्ञान की
इच्छा से गुरु या सब्रह्मचारी आदि के साथ जो 'कथा' होती है उसको 'वाद'