तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 298, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ेंकर्मभेदाः ] प्रमेयनिरूपणम् २३३
हीनस्य, निष्कामकर्मानुष्ठानादनागतधर्माऽधर्मावनर्जयतः पूर्वोपात्तञ्च
धर्माऽधर्मप्रचयं योगर्द्धिप्रभावाद् विदित्वा, समाहृत्य भुञ्जानस्य पूर्वकर्म-
निवृत्तौ वर्तमानशरीरापगमे पूर्वशरीराभावाच्छरीराद्येकविंशतिदुःखस-
म्बन्धो न भवति कारणाभावात् । सोऽयमेकविंशतिप्रभेदभिन्नदुःखा-
निर्मोक्षः। सोऽपवर्ग इत्युच्यते ।
क्लेशों से रहित [ अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशा पञ्चक्लेशाः । १ ] अतएव [ राग
द्वेष आदि के अभाव में ] निष्काम भाव से कर्मों के अनुष्ठान करने के कारण
[ निष्काम कर्म से धर्म अधर्म रूप संस्कारों की उत्पत्ति नहीं होती है । इसलिए ]
नए धर्म और अधर्म का उपार्जन न करने वाले; और पूर्वोपात्त धर्माधर्म को
योग शक्ति के प्रभाव से जान कर एक साथ भोग डालने वाले [ तत्त्व-ज्ञान हो
जाने पर राग, द्वेष, नहीं रहता अतएव निष्काम भाव से किए जाने वाले कर्मों
से नवीन धर्माधर्म उत्पन्न नहीं होते हैं । ] पूर्व कर्मों की समाप्ति पर वर्तमान
शरीर के नाश होने पर नए शरीर की उत्पत्ति [ के कारणभूत धर्माधर्म के
अभाव में ] न होने से इक्कीस प्रकार के दुःखों का सम्बन्ध [ आत्मा के साथ ]
कारण [ धर्माधर्म ] के अभाव से नहीं होता है। यही इक्कीस प्रकार के दुःखों
का विनाश मोक्ष है। वही 'अपवर्ग' कहलाता है।
कर्मों के भेद—
कर्म के तीन प्रकार हैं, एक 'प्रारब्ध' दूसरे 'सञ्चित' और तीसरे
'क्रियमाण' । जिन कर्मों का फल भोग करने के लिए यह शरीर प्राप्त हुआ
है उसका भोग प्रारम्भ हो चुका है अतएव वह 'प्रारब्ध' कहलाते हैं। इनका
नाश भोग पूर्ण होने पर ही होता है। 'क्रियमाण' कर्म वह है जो इस समय
में किया जा रहा है। इन कर्मों के संस्कार 'सञ्चित' होते रहते हैं । उनका
भोग आगे होगा अतएव वह 'सञ्चित' कर्म कहलाते हैं। जब तक तत्त्वज्ञान
या आत्मसाक्षात्कार नहीं होता है तब तक किए गए कर्मों से संस्कार बनते
हैं। परन्तु आत्मसाक्षात्कार के बाद किए जाने वाले कर्मों से संस्कार नहीं
बनते । इसलिये आत्मसाक्षात्कार के बाद मोक्ष की प्राप्ति के लिए 'प्रारब्ध'
कर्म और 'सञ्चित' कर्मों की समाप्ति का कार्य शेष रह जाता है। इन दोनों
की समाप्ति होने पर ही मोक्ष होता है। इनमें से 'प्रारब्ध' कर्मों का भोग
तो नियत समय तक अर्थात् जब तक इस वर्तमान शरीर की आयु निर्धारित
है तब तक चलता ही है। उसका उपपादन 'चक्रभूमि' के उदाहरण से किया
गया है। जैसे कुम्हार एक बार अपने 'चाक' को घुमा देता है तो उसमें जो
१ योग दर्शन २, ३ ।