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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

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२४६ | तर्कभाषा | [ हेत्वाभासाः
१३ हेत्वाभासाः
उक्तानां पक्षधर्मत्वादिरूपाणां मध्ये येन केनापि रूपेण हीना अहे-
तवः । तेऽपि कतिपयहेतुरूपयोगाद्धेतुवदाभासमाना हेत्वाभासाः । ते च
असिद्ध-विरुद्ध-अनैकान्तिक-प्रकरणसम-कालात्ययापदिष्ट-भेदात् पञ्चैव ।
अत्रोदयनेन 'व्याप्तस्य हेतोः पक्षधर्मतया प्रतीतिः सिद्धिस्तदभावोऽ-
सिद्धिः' इत्यसिद्धिलक्षणमुक्तम् । तच्च यद्यपि विरुद्धादिष्वपि सम्भवतीति
साङ्कर्यं प्रतीयते । तथापि यथा न साङ्कर्यं तथोच्यते । यो हि
साधने पुरः परिस्फुरति समर्थश्च दुष्टज्ञप्तौ स एव दुष्टज्ञप्तिकारको
दूषणमिति यावत् नान्य इति । तेनैव पुरावस्फूर्तिकेन दुष्टौ ज्ञापितायां
कथापर्यवसाने जाते तदुपजीविनोऽन्यस्यानुपयोगात् । तथा च सति यत्र
१३ हेत्वाभास
[अनुमान प्रकरण में] कहे हुए पक्षधर्मत्व आदि [ १ पक्षसत्त्व, २ सपक्षसत्त्व
३ विपक्षव्यावृत्तत्व, ४ अबाधितविषयत्व, और ५ असत्प्रतिपक्षत्व इन पांच ]
रूपों में से किसी एक रूप से भी हीन [ होने से जो वस्तुतः ] अहेतु हैं । वह
भी [ तृतीयान्त या पञ्चम्यन्त प्रयोग आदि रूप तथा पक्षसत्त्वादि रूप ] हेतु के
कतिपय धर्मों के योग से हेतु के समान आभासित होने से 'हेत्वाभास' [ कहलाते ]
हैं । और वह १ असिद्ध, २ विरुद्ध, ३ अनैकान्तिक, ४ प्रकरणसम तथा काला-
त्ययापदिष्ट भेद से पांच ही होते हैं ।
इनमें से [ असिद्ध नामक प्रथम हेत्वाभास की व्याख्या करते समय 'न्याय-
वार्तिक-तात्पर्यटीका-परिशुद्धि' के लेखक ] उदयनाचार्य ने 'व्याप्तियुक्त हेतु की
पक्षधर्मतया प्रतीति सिद्धि [ कहलाती ] है और उसका अभाव असिद्धि है यह
असिद्धि का लक्षण किया है। और यह 'लक्षण' यद्यपि विरुद्ध आदि [ अन्य
हेत्वाभासों ] में भी हो सकता है इसलिए साङ्कर्य प्रतीत होता है फिर जिस
प्रकार साङ्कर्य [ दोष ] न हो [ सके ] इस प्रकार [ उसकी व्याख्या ] कहते हैं।
जो [ दूषण ] साधन में पहिले प्रतीत होता है और [ उस हेतु की ] दुष्टता-सूचन
में समर्थ होता है वही [ उस हेतु का ] दुष्टतासूचक अर्थात् दूषण होता है
[ बाद में प्रतीति होने वाला ] अन्य [ दूषण, दूषण ] नहीं । [ होता क्योंकि ]
उसी [ प्रथम प्रतीत होने वाले दोष ] से दुष्टता सूचित हो जाने पर [ वादी
अथवा प्रतिवादी के निग्रहस्थान में आ जाने से ] कथा की [ जय-पराजय निर्णय
रूप ] समाप्ति हो जाने से उसके आश्रित रहने [ और बाद में प्रतीत होने ] वाले
अन्य [ दोष ] का [ कोई ] उपयोग न होने से [ उस बाद में प्रतीत होनेवाले का