तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४० तर्कभाषा [ अवयवाः
यो यो धूमवान् सोऽग्निमान् यथा महानस इति । पक्षे लिङ्गोपसंहार-
वचनमुपनयः । यथा वह्निव्याप्यधूमवांश्चायमिति, तथा चायमिति वा ।
पक्षे साध्योपसंहारवचनं निगमनम् । यथा तस्मादग्निमान् इति, तस्मात्त-
थेति वा । एते च प्रतिज्ञादयः पञ्चानुमानवाक्यस्यावयवा इवावयवा, न
तु समवायिकारणं, शब्दस्याकाशसमवेतत्वादिति ।
४ पक्ष [ पर्वत आदि ] में लिङ्ग का उपसंहार कथन करना 'उपनय'
[ कहलाता ] है । जैसे और 'यह [ पर्वत ] वह्नि के व्याप्य धूम से युक्त है' ।
अथवा और 'यह [ पर्वत ] वैसा [ महानस के समान धूमवान् ] है' ।
५ पक्ष [ पर्वत ] में साध्य [ वह्नि ] का उपसंहार कथन करना 'निगमन'
है । जैसे, 'इसलिए [ पर्वत ] अग्निमान् है' । अथवा 'इसलिए [ पर्वत ] वैसा
[ अग्निमान् ] है ।'
यह प्रतिज्ञा आदि पांच अनुमान-वाक्य के अवयव के समान [ होने से
गौण रूप से ] अवयव [ कहलाते ] हैं, 'समवायिकारण' नहीं हैं । शब्द [ रूप
अनुमान वाक्य ] के आकाश में समवेत होने से [ आकाश ही उसका समवायि-
कारण है । प्रतिज्ञादि नहीं ] । [ वास्तव में तो अवयव और अवयवी का
समवाय संबन्ध बताया जा चुका है और अवयव अवयवी के 'समवायि-
कारण' होते हैं । जैसे तन्तु पट के 'समवायिकारण' हैं । यहां प्रतिज्ञा आदि
अनुमान वाक्य के इस प्रकार के अवयव नहीं हैं जिससे उनको अनुमान वाक्य
का 'समवायिकारण' कहा जा सके । क्योंकि वाक्य तो शब्द रूप है और
शब्द का 'समवायिकारण' आकाश ही है । इसलिये शब्दरूप अनुमान वाक्य का
'समवायिकारण' आकाश ही होगा । प्रतिज्ञादि अवयव नहीं ] ।
पांच तथा तीन अवयवों का प्रयोग—
न्याय और वैशेषिक दोनों में परार्थ अनुमान वाक्य के पांच अवयव माने
गए हैं परन्तु वैशेषिक दर्शन में उनके नाम १ प्रतिज्ञा, २ अपदेश, ३ निदर्शन,
४ अनुसन्धान और ५ प्रत्याम्नाय रखे गये हैं । अन्य दर्शनों में अवयवों के
प्रयोग के सम्बन्ध में मतभेद पाया जाता है ।
१ बौद्ध दार्शनिक केवल एक हेतु को, अथवा अधिक से अधिक हेतु और
दृष्टान्तै दो का ही प्रयोग आवश्यक मानते हैं ।
२ जैन दार्शनिकों ने अधिकारी भेद से अवयवों की संख्या का भेद निर्धारित
१ प्रमाणवार्तिक १, २८ ।
२ प्रमाणवार्तिक १, २८ ।