तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२५२ तर्कभाषा [व्याप्यत्वासिद्धः
किन्तु शाकाद्यन्नपरिणाम एवात्र प्रयोजकः। प्रयोजकश्चोपाधिरुच्यते।
अतो मैत्रीतनयत्वेन श्यामत्वेन सम्बन्धे शाकाद्यन्नपरिणाम एवोपाधिः।
यथा वाग्नेर्धूमसम्बन्धे आर्द्वेन्धनसंयोगः। अतएवोपाधिसम्बन्धाद्
व्याप्तिर्नास्तीति व्याप्यत्वासिद्धोऽयं मैत्रीतनयत्वादिर्हेतुः।
तथा परोऽपि व्याप्यत्वासिद्धः। यथा 'क्रत्वन्तर्वर्तिनी हिंसा अधर्मसाधनं
हिंसात्वात् क्रतुबाह्यहिंसावत्' इति। न च हिंसात्वमधर्मे प्रयोजकं, किन्तु निषि-
द्धत्वमुपाधिरिति पूर्ववदुपाधिसद्भावाद् व्याप्यत्वासिद्धोऽयं हिंसात्वं हेतुः।
ननु 'साध्यव्यापकत्वे सति साधनाव्यापको यः स उपाधिः' इत्युपाधिलक्षणम्।
तच्च निषिद्धत्वे नास्ति तत् कथं निषिद्धत्वमुपाधिरिति।
मैवम्। निषिद्धत्वेऽप्युपाधिलक्षणस्य विद्यमानत्वात्। तथा हि साध्यस्य
अधर्मजनकत्वस्य व्यापकं निषिद्धत्वम्। यत्र यत्राधर्मसाधनत्वं, तत्र तत्रा-
यहां [श्यामत्व में] प्रयोजक है। और प्रयोजक को ही 'उपाधि' कहते हैं। इसलिए
मैत्रीतनयत्व के श्यामत्व के साथ [व्याप्ति अथवा साध्य-साधकभाव सम्बन्ध
[मानने] में शाकादि खाद्य पदार्थों [अन्न] का परिपाक ही 'उपाधि' है।
[इसलिए वह 'उपाधिसद्भावाद् व्याप्यत्वासिद्ध' है]
['उपाधिसद्भावात् व्याप्यत्वासिद्ध' का दूसरा उदाहरण भी दिखलाते हैं]
अथवा जैसे अग्नि के धूम के साथ [व्याप्ति] सम्बन्ध [यत्र यत्र वह्निस्तत्र तत्र
धूमः] में 'आर्द्र-इन्धनसंयोग' [उपाधि] है। [इसी प्रकार मैत्रीतनयत्वात् हेतु
में भी] इसलिए उपाधि का सद्भाव होने से व्याप्ति नहीं है इसलिए वह हेतु
व्याप्यत्वासिद्ध है।
और भी [उपाधिसद्भावात्] व्याप्यत्वासिद्ध [का तीसरा उदाहरण] जैसे, 'यज्ञ
के अन्तर्गत [की गई] हिंसा अधर्मजनिका है, हिंसा होने से, यज्ञ से बाहर की गई
हिंसा के समान'। [इस अनुमान में हिंसात्व हेतु है और उससे अधर्मजनकत्व साध्य
है और किन्तु] हिंसात्व अधर्मजनकत्व का प्रयोजक [कारण] नहीं है अपितु
निषिद्धत्व [रूप] उपाधि [ही अधर्मजनकत्व में प्रयोजक] है। इसलिए पूर्ववत्
उपाधि के विद्यमान होनेसे यह हिंसात्व हेतु [भी] 'व्याप्यत्वासिद्ध' [हेत्वाभास] है।
[प्रश्न] साध्य का व्यापक होकर जो साधन का अव्यापक हो वह 'उपाधि'
होता है यह 'उपाधि' का लक्षण [किया गया] है। और वह [लक्षण] निषिद्धत्व
में नहीं [घटता] है तो निषिद्धत्व [को] उपाधि कैसे [कहते] हैं?
[उत्तर] यह कहना ठीक नहीं है। निषिद्धत्व में उपाधिलक्षण के विद्यमान
होने से। क्योंकि साध्यरूप अधर्मजनकत्व का निषिद्धत्व व्यापक है। जहां जहां