तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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८ तर्कः
तर्कोऽनिष्टप्रसङ्गः । स च सिद्धव्याप्तिकयोर्धर्मयोर्व्याप्याङ्गीकारेण
अनिष्टव्यापकप्रसञ्जनरूपः । यथा 'यद्यत्र घटोऽभविष्यत् तर्हि भूतुल-
मिवादृक्ष्यत्' इति ।
स चायं तर्कः प्रमाणानामनुग्राहकः । तथाहि 'पर्वतोऽयं साग्निः
पर्यन्त अवयव प्रयोग को 'अनेलैटिक सिलाजिज्म' विश्लेषक-अनुमान कहा जाता
है । इनमें से 'सिन्थेटिक सिलाजिज्म' का स्वरूप इस प्रकार बनता है—
१ उदाहरण । जहां जहां धूम होता है वहां वहां अग्नि होती है जैसे
महानस में—
२ उपनय । यह पर्वत धूमवान् है ।
३ निगमन । इसलिए यह [ पर्वत ] वह्निमान् है ।
इसमें उदाहरण को 'मेजर प्रेमेसिस', उपनय को 'माइनर प्रेमेसिस',
और निगमन को 'कन्क्ल्यूज़न' कहा जाता है । परार्थानुमान में प्रयुक्त होने
वाले 'अनेलैटिक सिलाजिज्म' में प्रतिज्ञा को 'कन्क्ल्यूज़न', हेतु को 'माइनर
प्रेमेसिस' और उदाहरण को 'मेजर प्रेमेसिस' कहा जाता है। उस विश्लेषक
अनुमान का स्वरूप इस प्रकार होगा—
१ प्रतिज्ञा [ कन्क्ल्यूज़न ] यह पर्वत वह्निमान् है ।
२ हेतु [ माइनर प्रेमेसिस ] क्योंकि वह धूमवान् है ।
३ उदाहरण [ मेजर प्रेमेसिस ] और जहां जहां धूम होता है वहां वहां
वह्नि होती है जैसे महानस में ।
८ तर्क
अवयवों के निरूपण के बाद क्रमप्राप्त 'तर्क' का निरूपण प्रारम्भ करते हैं ।
तर्क अनिष्ट प्रसङ्ग [ को कहा जाता ] है। और वह दो व्याप्ति युक्त धर्मों
में से व्याप्य के स्वीकार करने से अनिष्ट व्यापक की प्रसक्ति रूप है । जैसे 'यदि
यहां घड़ा होता तो दिखलाई देता' । [ यहां 'जो होता है सो दिखलाई देता है'
यह व्याप्ति है। इसमें होना व्याप्य है दिखलाई देना व्यापक है । 'यदि यहां घड़ा
होता' इस व्याप्य को स्वीकार करके, 'तो दिखलाई देता' इस अनिष्ट की प्रसक्ति
करना तर्क है । जहां घड़ा दिखलाई नहीं देता है वहां उसकी प्रसक्ति ही अनिष्ट
प्रसञ्जन रूप है ]।
यह तर्क [ स्वयं प्रमाण नहीं है किन्तु ] प्रमाणों का अनुग्राहक [ समर्थक ]
है । जैसे कि 'यह पर्वत अग्नि युक्त है अथवा अग्नि रहित' इस सन्देह के बाद