तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंव्याप्यत्वासिद्धः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २५१
विशिष्टाभावाद्, विशिष्टस्य च हेतुत्वेनोपादानात् । शेषं पूर्ववत् ।
व्याप्यत्वासिद्धस्तु स एव यत्र हेतोर्व्याप्तिर्नावगम्यते । स द्विविधः ।
एकः साध्येनासहचरितः, अपरस्तु सोपाधिकसाध्यसम्बन्धी । तत्र प्रथमो यथा
'यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधरः, संश्च विवादास्पदीभूतः शब्दादिः'
इति । अत्र हि शब्दादिः 'पक्षः, तस्य क्षणिकत्वं साध्यं, सत्त्वं हेतुः-न
चास्य हेतोः क्षणिकत्वेन सह व्याप्तौ प्रमाणमस्ति ।
इदानीमुपाधिसहितो व्याप्यत्वासिद्धः प्रदर्श्यते । तद्यथा 'स श्यामो
मैत्रीतनयत्वात् परिदृश्यमानमैत्रीतनयस्तोमवत्' इति । अत्र हि मैत्री-
तनयत्वेन श्यामत्वं साध्यते । न च मैत्रीतनयत्वं श्यामत्वे प्रयोजकं,
अंश ] असमर्थ हैं । [ विशेष्य रूप गुणत्व यद्यपि शब्द में है परन्तु जो अन्य से
व्यावर्तक और प्रयोजनवत् होता है वही विशेष्य होता है । गुणत्व स्वरूपतः
शब्द में रहने पर भी प्रकृत नित्यत्व की सिद्धि में उपयोगी न होने से विशेष्य
नहीं कहा जा सकता है । अतएव ] विशेष्य के अभाव में विशिष्ट का अभाव
होने से, और विशिष्ट के हेतु रूप में गृहीत होने से 'स्वरूपासिद्ध' है । शेष सब
पूर्ववत् [ समझना चाहिये ] ।
'व्याप्यत्वासिद्ध' [ हेत्वाभास ] तो वह ही है जहां हेतु की व्याप्ति प्रतीत
नहीं होती । वह दो प्रकार का है । एक 'साध्य के साथ असहचरित' [ अर्थात्
व्याप्तिग्राहक-प्रमाणाभावात् व्याप्यत्वासिद्ध ] और दूसरा 'सोपाधिक साध्य-
सम्बन्धी' [ अर्थात् उपाधिसद्भावात् व्याप्यत्वासिद्ध ] उनमें पहिला [ उदाहरण ]
जैसे 'जो सत् है सो क्षणिक है जैसे मेघपटल, और विवादास्पद [ शब्द आदि ]
सत् है' । यहां शब्दादि पक्ष है, उसका क्षणिकत्व साध्य है और सत्त्व हेतु है ।
परन्तु उस [ सत्त्व ] हेतु की क्षणिकत्व के साथ व्याप्ति में कोई प्रमाण नहीं है ।
इसलिए यह 'व्याप्तिग्राहकप्रमाणाभावात् व्याप्यत्वासिद्ध है ] ।
यह पूरा अनुमान आचार्य ज्ञानश्री ने एक श्लोक में इस प्रकार दिखलाया है-
यत् सत् तत् क्षणिकं यथा जलधरः सन्तश्च भावा अमी
सत्ता शक्तिरिहार्थकर्मणि मितेः सिद्धेषु सिद्धा न सा ।
नाप्येकैव विधान्यथा परकृतेनापि क्रियादिर्भवेत् ।
द्वेधापि क्षणभङ्गसङ्गतिरतः साध्ये च विश्राम्यति ॥
अब 'उपाधि सहित व्याप्यत्वासिद्ध' को दिखलाते हैं जैसे कि 'वह श्याम
है मैत्री का पुत्र होने से परिदृश्यमान मैत्री के पुत्रों के समुदाय के समान । यहां
मैत्रीतनयत्व [ हेतु ] से श्यामत्व सिद्ध किया जा रहा है । परन्तु मैत्रीतनयत्व
श्यामत्व में प्रयोजक नहीं है अपितु शाकादि खाद्य पदार्थ [ अन्न ] का परिपाक ही