तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअवयवसंख्याभेदः ] अवयवनिरूपणम् २४१
किया है। वादिदेव नामक जैन आचार्य ने विशिष्ट अधिकारी के लिए केवल
एक हेतु का प्रयोग ही पर्याप्त माना है¹। दूसरे प्रकार के अधिकारी के लिए
प्रतिज्ञा तथा हेतु दो अवयवों का प्रयोग पर्याप्त माना है। इन दोनों अवयवों के
विषय में जैन और बौद्ध परम्परा समान है। परन्तु जैनों ने अन्य प्रकार के
अधिकारियों के लिए तीन, चार और पांच अवयवों का प्रयोग भी माना है।
३ सांख्य कारिका की माठर वृत्ति के अनुसार सांख्य में प्रतिज्ञा, हेतु
और उदाहरण इन तीन अवयवों का ही प्रयोग माना गया है।
४ शालिकनाथ मीमांसक प्रभाकर के अनुयायी हैं। उन्होंने अपनी
'प्रकरण पञ्चिका' में³ और कुमारिलभट्ट के अनुयायी पार्थसारथिमिश्र ने
'श्लोक-वार्तिक' की टीका⁴ में मीमांसक सम्मत तीन अवयवों का ही वर्णन
किया है। जैन आचार्य हेमचन्द्र तथा अनन्तवीर्य ने मीमांसकों के चार
अवयव मानने का उल्लेख किया है। वह यथार्थ नहीं है। क्योंकि मीमांसकों के
दोनों सम्प्रदाय तीन अवयव ही मानते हैं। उन तीन अवयवों के भी दो
प्रकार हो सकते हैं।
'उदाहरणपर्यन्तं यद्बोदाहरणादिकम् ।'
अर्थात् तीन अवयव या तो उदाहरण पर्यन्त हो सकते हैं अथवा उदा-
हरणादिक तीन हो सकते हैं। उदाहरण पर्यन्त तीन का अर्थ प्रतिज्ञा, हेतु
तथा उदाहरण यह तीन होगा। और उदाहरणादिक तीन का अर्थ उदाहरण,
उपनय, निगमन यह तीन होगा।
पश्चिमी तर्क में अवयवों का प्रयोग—
पश्चिमी तर्क के प्रवर्तक अरस्तू ने भी इसी प्रकार अनुमान वाक्य के तीन
अवयव माने हैं और उनका विभाजन 'उदाहरण पर्यन्त' और 'उदाहरणादि'
इन दो प्रक्रियाओं से किया है। उसके अनुसार परार्थानुमान में उदाहरण
पर्यन्त अर्थात् प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण इन तीन अवयवों का प्रयोग होता है।
और स्वार्थानुमान में उदाहरणादिक अर्थात् उदाहरण, उपनय और निगमन
इन तीन अवयवों का प्रयोग होता है। स्वार्थानुमान में प्रयुक्त होने वाले
उदाहरणादिक अवयव प्रयोग को पश्चिमी तर्क में 'सिन्थैटिक सिलाजिज्म' संयोजक
अनुमान कहा जाता है। और परार्थानुमान में प्रयुक्त होने वाले उदाहरण
१ स्याद्वाद २० पृ० ५४८ । २ स्याद्वाद २० पृ० ५६४ ।
३ प्रकरण पञ्चिका पृ० ८३, ८५ । ४ अनुमानश्लोक ।
१६ त० भा०