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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 299, कुल 330 में से

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पृष्ठ 299

२३४ तर्कभाषा [ कर्मनाशोपायाः
वेग संस्कार उत्पन्न हो जाता है उसके कारण चाक बहुत देर तक घूमता रहता
है इसी प्रकार प्रारब्ध कर्मों के वश यह शरीर अपने भोग के समाप्त होने तक
बना रहता है। 'तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमिवद् धृतशरीरः'१। आत्म ज्ञान के
बाद जितने समय तक वर्तमान शरीर का नाश नहीं होता है तब तक साधक
'जीवन्मुक्ति' की अवस्था में रहता है। इस अवस्था में वह जो कुछ भी कर्म
करता है उसके उन कर्मों से नए संस्कार नहीं बनते हैं। इसीलिए कहा है कि
मातृवध पितृवध जैसे कर्मों से भी उसका कुछ नहीं बिगड़ता है।
'सञ्चित' कर्मों के नाश के प्रकार—
अब सञ्चित कर्मों से छुटकारा पाने का प्रश्न शेष रह जाता है। इसके विषय
में दो प्रकार के मत हैं। गीता का कथन तो यह है कि 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि
भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन'। अर्थात् तत्त्वज्ञान की अग्नि उन सारे 'सञ्चित' कर्मों को
भस्म कर देती है। इस पक्ष में तत्त्वज्ञान के बाद योगी के लिए कुछ कर्तव्य
शेष नहीं रह जाता है। उसके मोक्ष में उतनी ही देर का विलम्ब है जब तक
उसके वर्तमान शरीर का पात नहीं होता। 'तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोच्यते'।
'सञ्चित' कर्मों के विनाश का दूसरा प्रकार वह है जिसका यहां तर्कभाषा-
कार ने वर्णन किया है। उसका आशय यह है कि तत्त्व ज्ञान होने पर योगी
को इस बात का ज्ञान भी योगसामर्थ्य से हो जाता है कि इस समय मेरे इतने
'सञ्चित' कर्म शेष पड़े हैं और साधारण प्रक्रिया के अनुसार इनका भोग मुझे
अमुक अमुक योनि में करना होगा। तब योगी, अपने योग-सामर्थ्य से एक
साथ उन सब शरीरों का निर्माण कर डालता है जिनमें उसके 'सञ्चित' कर्मों
का भोग होना है। इस प्रकार वह सारे 'सञ्चित' कर्मों को एक साथ ही भोग
डालता है। इसलिए भोग के लिए कोई 'सञ्चित' कर्म शेष नहीं रहता है। नया
कर्म उत्पन्न नहीं होता, और 'प्रारब्ध' का भोग से नाश हो जाता है इस
प्रकार नवीन शरीर की उत्पत्ति का कारण न होने से शरीरादि की उत्पत्ति
नहीं होती। यही मोक्ष है।
मोक्ष के स्वरूपविषयक दो मत—
जिस प्रकार मोक्ष प्राप्ति के प्रकार में दो प्रकार के मत हैं इसी प्रकार
मोक्ष के स्वरूप के विषय में भी दो प्रकार के मत हैं। नैयायिक आचार्य दुःख
१ सांख्यकारिका ६७ ।