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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 315, कुल 330 में से

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पृष्ठ 315

२५० तर्कभाषा [ स्वरूपासिद्धः

असमर्थविशेषणासिद्धो यथा, 'शब्दो नित्यो गुणत्वे सत्यकारणकत्वात्'।
अत्र हि विशेषणस्य गुणत्वस्य न किञ्चित् सामर्थ्यमस्तीति । विशेष्यस्या-
कारणकत्वस्यैव नित्यत्वसाधने सामर्थ्यात् । अतोऽसमर्थविशेषणता ।
स्वरूपासिद्धत्वं तु विशेषणाभावे विशिष्टस्याप्यभावात् ।
ननु विशेषणं गुणत्वं तत्र शब्देऽस्त्येव, तत्कथं विशेषणाभावः ?
सत्यमस्त्येव गुणत्वं, किन्तु न तद्विशेषणम् । तदेव हि हेतोर्विशेषणं
भवति यदन्यव्यवच्छेदेन प्रयोजनवत् । गुणत्वं तु निष्प्रयोजनमतो-
ऽसमर्थमित्युक्तमेव ।
असमर्थविशेष्यो यथा तत्रैव तद्वैपरीत्येन प्रयोगः । तथाहि, 'शब्दो
नित्योऽकारणकत्वे सति गुणत्वात्' इति । अत्र तु विशेषणमात्रस्यैव नित्य-
त्वसाधने समर्थत्वादू विशेष्यमसमर्थम् । स्वरूपासिद्धत्वं तु विशेष्याभावे

रूप अस्पर्शत्व तो है परन्तु विशेष्य रूप द्रव्यत्व नहीं है क्योंकि शब्द द्रव्य नहीं
अपितु गुण है। इसलिए ] विशेष्य के अभाव में विशिष्ट हेतु [पक्षभूत शब्द में] नहीं
रहता है। [अतएव] विशिष्टहेतु [शब्दमें] नहीं है [इसलिए यह भी स्वरूपासिद्ध ही हुआ]।
'असमर्थ विशेषणासिद्ध' जैसे शब्द नित्य है गुण होकर कारण रहित होने से।
यहां [ इस अनुमान में ] विशेषण 'गुणत्व' की कुछ भी उपयोगिता [सामर्थ्य] नहीं
है। विशेष्य रूप 'अकारणकत्व' का ही नित्यत्व-सिद्धि में सामर्थ्य होने से ।
[ अर्थात् नित्यत्व की सिद्धि के लिए अकारणकत्व हेतु ही पर्याप्त है। जो कारण
रहित है जिसका कोई कारण नहीं होता वह नित्य कहलाता है फिर चाहे वह
द्रव्य हो या गुण। नित्यत्व की सिद्धि के लिए द्रव्यत्व अथवा गुणत्व का कोई
उपयोग नहीं है ] । इसलिए 'असमर्थ विशेषणता' है। [उस असमर्थ विशेषणका]
'स्वरूपासिद्धत्व' तो विशेषण के अभाव में विशिष्ट का अभाव होने से है।
[ प्रश्न ] विशेषण गुणत्व वहां शब्द में है ही, फिर विशेषण का अभाव
कैसे [ कहते हैं ] ?
[ उत्तर ] ठीक है गुणत्व [ शब्द में अवश्य ] है किन्तु वह विशेषण नहीं
है। वह ही हेतु का विशेषण होता है जो अन्य का व्यावर्तक और सप्रयोजन हो ।
[ इस अनुमान में ] गुणत्व तो निष्प्रयोजन ही है यह [ अभी ] कह चुके हैं।
[ शब्द के नित्यत्व की सिद्धि में अकारणकत्व की ही उपयोगिता है गुणत्व का
कोई उपयोग न होने से वह व्यर्थ ही है यह अभी कहा था ] ।
'असमर्थविशेष्यासिद्ध' जैसे उस [अनुमान] में ही उसका उल्टा प्रयोग करने से
जैसे कि 'शब्द नित्य है कारण रहित गुण होने से'। यहां तो नित्यत्व सिद्धि में
विशेषणमात्र [ अकारणकत्व ] का ही सामर्थ्य होने से विशेष्य [ गुणत्वे सति यह