सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 310, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 310

कथाभेदाः ] कथाभेदनिरूपणम् २४५
कहते हैं। अपने पाण्डित्य आदि के द्योतन के लिए दो प्रतिद्वन्द्वी पण्डितों
आदि में जो 'कथा' होती है उस के 'जल्प' और 'वितण्डा' दो भेद हैं। यदि
वह दोनों वादी और प्रतिवादी अपने अपने पक्ष की स्थापना और दूसरे का
खण्डन करते हैं तो उस 'कथा' को 'जल्प' कहते हैं। और जहां एक वादी तो
अपने पक्ष की स्थापना करता है परन्तु दूसरा प्रतिवादी अपने पक्ष की
स्थापना नहीं करता केवल पहिले का खण्डन मात्र करता है उसको वितण्डा
कहते हैं। इस प्रकार न्याय शास्त्र में कथा के तीन भेद माने गए हैं।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'चरक' में भी इन त्रिविध कथाओं की चर्चा की
गई है। परन्तु वहां उनके वर्णन की शैली में कुछ भेद है। 'चरक' ने 'कथा'
के स्थान पर 'सम्भाषा' शब्द का प्रयोग किया है और उस 'सम्भाषा' के प्रथम
दो भेद किए हैं एक 'सन्धाय-सम्भाषा' और दूसरा 'विगृह्य-सम्भाषा'। इनमें
से 'सन्धाय सम्भाषा' न्याय की 'वाद' कथा के स्थान पर है। और दूसरे
'विगृह्य सम्भाषा' के फिर 'जल्प' और 'वितण्डा' यह दो भेद किए गए हैं।
इस प्रकार चरक का 'विगृह्य-सम्भाषा' और न्याय का 'विजिगीषु-कथा' शब्द
समानार्थक हैं। इसीलिए न्याय दर्शन के वात्स्यायन भाष्य में 'विगृह्येति
विजिगीषया' और न्याय सूत्र में 'ताभ्यां विगृह्य कथनम्' में भी 'विगृह्य'
शब्दों का प्रयोग किया गया है।
जैन परम्परा में 'कथा' का केवल एक ही भेद माना है 'वाद'। उन्होंने
'जल्प' और 'वितण्डा' को 'कथा' नहीं अपि तु 'कथाभास' माना है। इस
विषय को उनके 'कथात्रयभङ्ग' नामक ग्रन्थ में विस्तार पूर्वक वर्णन किया
गया है। न्याय परम्परा में विजिगीषु 'छल' और असदुत्तर रूप 'जाति' का
प्रयोग कर के भी अपने प्रतिवादी को पराजित कर सकता है परन्तु जैन
आचार्यों ने कथा में 'छल' आदि के प्रयोग का सर्वथा निषेध किया है। इस-
लिए उनके मतानुसार 'विजिगीषु' भी लगभग 'तत्त्वबुभुत्सु' के समकक्ष ही है।
प्रारम्भ में बौद्ध भी कथा के तीन ही प्रकार के भेद मानते थे परन्तु अन्त में
जैनों के समान वह भी कथा का एक ही भेद मानने लगे।
कथा के 'वाद' 'जल्प' 'वितण्डा' रूप तीनों भेदों के निरूपण के बाद,
क्रम प्राप्त होने से हेत्वाभास का दोबारा वर्णन प्रारम्भ करते हैं। यद्यपि पहिले
अनुमान के प्रकरण में भी हेत्वाभासों का वर्णन किया जा चुका है परन्तु यहां
क्रम प्राप्त होने से उनका दोबारा वर्णन किया जा रहा है। यह हेत्वाभासों का
दोबारा वर्णन तो अवश्य है परन्तु वह केवल पुनरुक्ति-मात्र नहीं है। अपितु
उस में कुछ विशेष ज्ञातव्य नई बातें भी यहां दी गई हैं।