सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 300, कुल 330 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 300

संशयः ] संशयनिरूपणम् २३५
३ संशयः
एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानार्थविमर्शः संशयः । स च त्रिविधः ।
विशेषादर्शने सति समानधर्मदर्शनजः, विप्रतिपत्तिजः, असाधारणधर्मश्चेति ।
तत्रैको विशेषादर्शने सति समानधर्मदर्शनजः यथा 'स्थाणुर्वा पुरुषो
वा' इति । एकस्मिन्नेव हि पुरोवर्तिनि द्रव्ये स्थाणुत्वनिश्चायकं वक्र-
की अत्यन्त निवृत्ति को ही मोक्ष कहते हैं । परन्तु वेदान्ती मोक्ष में दुःख
निवृत्ति के अतिरिक्त नित्य सुख की प्राप्ति भी मानते हैं। उनका कहना है कि
आत्मा नित्य, विभु और आनन्द रूप है। संसार काल में देहादि के सम्बन्ध के
कारण नित्य-सुख की प्रतीति नहीं हो पाती है, परन्तु मोक्षावस्था में उसके
स्वस्वरूपभूत आनन्द की अभिव्यक्ति भी होती है। इसलिए मोक्ष में वह
आनन्दी भवति नित्य-सुख के अनुभव का 'आनन्दमय' हो जाता है। नैयायिक
मोक्ष में नित्य सुख की अभिव्यक्ति नहीं मानते हैं। इस विषय पर न्यायसूत्र के
वात्स्यायन भाष्य में बहुत विस्तार के साथ विचार किया गया है।
प्रमेयोंका निरूपण प्रारम्भ करते समय 'आत्म-शरीर-इन्द्रिय-अर्थ-बुद्धि-मनः-
प्रवृत्ति-दोष-प्रेत्यभाव-फल-दुःख-अपवर्गास्तु प्रमेयम्' इस सूत्र द्वारा बारह 'प्रमेय'
गिनाये थे। अपवर्ग का निरूपण समाप्त होने के साथ उन प्रमेयों का निरूपण
समाप्त हो जाता है। और इस प्रकार यहां तक न्याय के सोलह पदार्थों में से
'प्रमाण' तथा 'प्रमेय' इन दो पदार्थों का निरूपण समाप्त हो जाता है। अतएव
न्याय के प्रतिपाद्य तृतीय संशय पदार्थ का निरूपण प्रारम्भ करते हैं।
३ संशय
एक धर्म में विरुद्ध नाना धर्मों का परिज्ञान संशय [ कहलाता ] है। और
वह तीन प्रकार का होता है। १ विशेष के अदर्शन होते हुए समान धर्म के
दर्शन से उत्पन्न [ संशय दूसरा विशेषादर्शन होते हुए ] २ विप्रतिपत्ति से
उत्पन्न, [ संशय और तीसरा विशेषादर्शन होते हुए ] ३ साधारणधर्म के दर्शन
से उत्पन्न [ संशय ] ।
उनमें से पहिला विशेषादर्शन होने पर समानधर्म के दर्शन से उत्पन्न संशय
[ का उदाहरण ] जैसे [ यह ] स्थाणु है या पुरुष । सामने स्थित एक [ लम्बे
लम्बे ] द्रव्य में स्थाणुत्व के निश्चायक टेढ़ी मेढ़ी कोटर आदि [ अथवा ]
पुरुषत्व के निश्चय कराने वाले सिर हाथ आदि [ अवयवों ] को न देखने वाले
और [ सम्मुखस्थ पदार्थ में ] स्थाणु और पुरुष के समान धर्म ऊंचाई आदि
को देखने वाले पुरुष को [ उस पदार्थ के विषय में ] संशय होता है कि 'यह