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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 308, कुल 330 में से

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पृष्ठ 308

निर्णयः ] निर्णयनिरूपणम् २४३
उतानग्निः' इति सन्देहानन्तरं यदि कश्चिन्मन्येतानग्निरयमिति तदा
तं प्रति 'यद्ययमनग्निरभविष्यत् तदानग्नित्वादधूमोऽप्यभविष्यत्' इत्य-
धूमत्वप्रसञ्जनं क्रियते । स एष प्रसङ्गस्तर्क इत्युच्यते । अयं चानुमानस्य
विषयशोधकः । प्रवर्त्तमानस्य धूमवत्त्वलिङ्गकानुमानस्य विषयमग्निमनु-
जानाति। अनग्निमत्त्वस्य प्रतिक्षेपात्। अतोऽनुमानस्य भवत्यनुग्राहक इति।
अत्र कश्चिदाह, 'तर्कः संशय एवान्तर्भवति' इति । तन्न । एककोटि-
निश्चितविषयत्वात् तर्कस्य ।
९ निर्णयः
निर्णयोऽवधारणज्ञानम् । तच्च प्रमाणानां फलम् ।
१० वादः
तत्त्वबुभुत्सोः कथा वादः । स चाष्टनिग्रहाणामधिकरणम् । ते च
यदि कोई यह कहे कि 'यह अग्नि रहित होता है' तो 'अग्नि रहित होने से धूम
रहित भी होना चाहिए' इस प्रकार [धूमवान् दिखलाई देने वाले पर्वत में अनिष्ट]
अधूमवत्त्व [ धूम राहित्य ] की प्रसक्ति की जाती है । यह [ अनिष्ट ] प्रसङ्ग
'तर्क' कहा जाता है । और यह अनुमान का विषय शोधक होता है । प्रवर्त्तमान
धूमवत्त्व लिङ्गक अनुमान के विषय [ साध्य ] अग्नि का अनुमोदन करता है ।
अनग्निमत्त्व का निषेध करके । इस लिए अनुमान का अनुग्राहक होता है ।
यहां [ तर्क के विषय में ] कोई कहता है कि 'तर्क संशय के ही अन्तर्गत
हो जाता है' । वह ठीक नहीं है । तर्क के एक कोटि में निश्चित रूप होने से
[ संशय उभयकोटिक ज्ञान होता है । 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इस संशय के उदाहरण
में किसी एक कोटि में निश्चय नहीं है परन्तु तर्क एक कोटि में निश्चित है इसलिए
वह संशय के अन्तर्गत नहीं हो सकता है ]
जैन परम्परा में अकलङ्क ने परोक्ष प्रमाण के एक भेद के रूप में 'तर्क'
को भी एक प्रमाण माना है। मीमांसा में 'तर्क' के लिए 'ऊह' शब्द का प्रयोग
हुआ है । त्रिविधश्च ऊहः । मंत्र-साम-संस्कार-विषयः । परन्तु न्याय और बौद्ध
दोनों परम्पराओं में 'तर्क' को प्रमाण रूप नहीं अपितु प्रमाणों का 'अनुग्राहक'
ही माना है। मीमांसा में भी यही स्थिति समझनी चाहिए ।
९ निर्णय
'निर्णय' निश्चयात्मक ज्ञान [ कहलाता ] है और वह प्रमाणों का फल
[ होता ] है ।
१० वाद
तत्त्वज्ञान के इच्छुकों [ वादी प्रतिवादी ] की कथा 'वाद' [ कहलाती ] है ।