तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२३८ तर्कभाषा [ सिद्धान्तः
एकः साधर्म्यदृष्टान्तो यथा धूमवत्त्वस्य हेतोर्महानसम् । द्वितीयस्तु वैधर्म्य-
दृष्टान्तः । यथा तस्यैव महाह्रद इति ।
६ सिद्धान्तः
प्रामाणिकत्वेनाभ्युपगतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्धा । सर्वतन्त्र-प्रति-
तन्त्र-अधिकरण-अभ्युपगम-सिद्धान्तभेदात् । तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो यथा
धर्मिमात्रसद्भावः । द्वितीयो यथा नैयायिकस्य मते मनस इन्द्रिय-
त्वम् । तद्धि समानतन्त्रे वैशेषिके सिद्धम् । तृतीयो यथा क्षित्यादिकर्तृत्व-
सिद्धौ कर्तुः सर्वज्ञत्वम् । चतुर्थो यथा जैमिनीयस्य नित्यानित्यविचारो
यथा भवतु, अस्तु 'तावच्छब्दो गुण' इति ।
जिसके विषय में वादी प्रतिवादी में मतभेद न हो ऐसा ] अर्थ 'दृष्टान्त' हो
[ सकता ] है । वह दो प्रकार का होता है । एक 'साधर्म्य-दृष्टान्त' जैसे धूमवत्त्व
हेतु का [ साधर्म्य दृष्टान्त ] महानस है । और दूसरा 'वैधर्म्य-दृष्टान्त' जैसे उसी
[ धूमवत्त्व हेतु ] का महाह्रद [ वैधर्म्य दृष्टान्त है ] ।
६ सिद्धान्त
दृष्टान्त के बाद छठा पदार्थ सिद्धान्त है । अतएव दृष्टान्त के बाद सिद्धान्त
का निरूपण करते हैं ।
प्रामाणिक रूप से स्वीकार किया जाने वाला अर्थ 'सिद्धान्त' [ कहलाता ]
है । वह चार प्रकार का [ होता ] है । १ 'सर्वतन्त्र' [ सिद्धान्त ], २ 'प्रतितन्त्र'
[ सिद्धान्त ], ३ 'अधिकरण' [ सिद्धान्त ], और ४ 'अभ्युपगम सिद्धान्त' भेद से ।
उनमें से—सर्वतन्त्र सिद्धान्त [ सर्वतन्त्र में तन्त्र शब्द का अर्थ 'शास्त्र' है । जो
सिद्धान्त सब शास्त्रों में माना जाय उसको 'सर्वतन्त्र-सिद्धान्त' कहते हैं ] जैसे धर्मी
मात्र [ घट पट आदि ] की सत्ता [ मानना ] । दूसरा [ 'प्रतितन्त्र सिद्धान्त'
उसको कहते हैं जो किसी विशेष शास्त्र में और उसके अपने समानतन्त्र में माना
जाय अन्य शास्त्रों में न माना जाय] जैसे नैयायिक के मत में मन का इन्द्रियत्व ।
वह [ उस न्याय के ] समानतन्त्र वैशेषिक में प्रसिद्ध है । तीसरा [ अधिकरण
सिद्धान्त वह कहलाता है जो अधिकरणभूत अर्थात् आधार भूत ऐसी बात का
प्रतिपादन करता है जिसकी सिद्धि हो जाने पर अन्य अनेक बातें स्वयं सिद्ध हो
जाती हैं । ] जैसे पृथिवी आदि के कर्ता [ईश्वर] की सिद्धि हो जाने पर उस कर्ता
की सर्वज्ञता [ स्वयं सिद्ध हो जाती है । क्योंकि पृथिवी आदि की रचना सर्वज्ञ,
सर्वशक्तिमान् के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता है ] ।
चौथा [ अभ्युपगम-सिद्धान्त वह कहलाता है जब अपना अभिमत न होने