तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्वरूपासिद्धः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २४६
.नित्यगन्धवत्त्वात्' इति । गन्धवत्त्वं हि पक्षीकृतेषु सर्वेषु नास्ति, पृथिवी-
मात्रवृत्तित्वात् । अतएव भागे स्वरूपासिद्धः ।
तथा विशेषणासिद्ध-विशेष्यासिद्ध-असमर्थविशेषणा-सिद्ध-असमर्थविशेष्यासिद्धा-
दयः स्वरूपासिद्धभेदाः । तत्र विशेषणासिद्धो यथा 'शब्दो नित्यो द्रव्यत्वे
सत्यस्पर्शत्वात्' । अत्र हि द्रव्यत्वविशिष्टमस्पर्शत्वं हेतुर्नास्पर्शत्वमात्रम् ।
शब्दे च द्रव्यत्वं विशेषणं नास्ति गुणत्वात्, अतो विशेषणासिद्धः । न
चासति विशेषणे द्रव्यत्वे तद्विशिष्टमस्पर्शत्वमस्ति । विशेषणाभावे
विशिष्टस्याप्यभावात् । यथा दण्डमात्राऽभावे पुरुषाऽभावे वा दण्ड-
विशिष्टस्य पुरुषस्याभावः । तेन सत्यप्यस्पर्शत्वे द्रव्यत्वविशिष्टस्य
हेतोरभावात् स्वरूपासिद्धत्वम् ।
विशेष्यासिद्धो यथा 'शब्दो नित्योऽस्पर्शत्वे सति द्रव्यत्वात्' इति ।
अत्रापि विशिष्टो हेतुः । न च विशेष्याऽभावे विशिष्टं स्वरूपमस्ति ।
विशिष्टश्च हेतुर्नास्त्येव ।
जल, वायु, अग्नि इन चार के परमाणु ] सब में नहीं है । केवल पृथिवी में
रहने वाला होने से । इसलिए [ पक्षभूत चार परमाणुओं के ] भाग [ अर्थात्
पृथिवी को छोड़ कर शेष तीन प्रकार के परमाणुओं ] में [ अविद्यमान होने से ]
स्वरूपासिद्ध है ।
इसी प्रकार १ 'विशेषणासिद्ध', २ 'विशेष्यासिद्ध', ३ 'असमर्थविशेषणासिद्ध'
और ४ 'असमर्थविशेष्यासिद्ध' आदि [ भी ] स्वरूपासिद्ध के भेद हैं । उनमें से
'विशेषणासिद्ध' जैसे, 'शब्द नित्य है द्रव्य होकर स्पर्श रहित होने से' । यहां [इस
अनुमान में ] द्रव्यत्वविशिष्ट अस्पर्शत्व हेतु है केवल अस्पर्शत्वमात्र नहीं । और
शब्द में विशेषणभूत द्रव्यत्व नहीं है । [शब्द के] गुण होने से । इसलिए [ 'विशे-
षणाभावे विशिष्टस्याप्यभावः' इस नियम के अनुसार द्रव्यत्व रूप विशेषण के
अभाव में 'द्रव्यत्वे सत्यस्पर्शत्वात्' यह विशिष्ट हेतु भी नहीं है] विशेषणासिद्ध' है ।
विशेषण द्रव्यत्व के न होने पर तद्विशिष्ट अस्पर्शत्व [ रूप विशिष्ट हेतु ] भी
नहीं है । विशेषण के अभाव में विशिष्ट का अभाव होने से । जैसे [ दण्डी पुरुषः
इस प्रतीति में विशेषण रूप ] दण्डमात्र के अभाव में अथवा [ विशेष्यभूत ]
पुरुष के अभाव में [अर्थात् केवल दण्ड अथवा केवल पुरुष होने पर] दण्डविशिष्ट
पुरुष का अभाव होता है । इसलिए [ शब्द में ] अस्पर्शत्व [ स्पर्शराहित्य ] होने
पर भी द्रव्यत्व विशिष्ट [ अस्पर्शत्व रूप ] हेतु के न होने से 'स्वरूपासिद्धत्व' है ।
'विशेष्यासिद्ध' जैसे [ उसी को उल्टा कर देने से ] 'शब्द नित्य है स्पर्श-
रहित [ होकर ] द्रव्य होने से' । यहां भी विशिष्ट हेतु है । [ शब्द में विशेषण