तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४८ तर्कभाषा [ स्वरूपासिद्धः
मैवम् । न हि स्वरूपेण कश्चिदाश्रयो भवत्यनुमानस्य, किन्तु सन्दि-
ग्धधर्मवत्त्वेन । तथा चोक्तं भाष्ये—
'नानुपलब्धे न निर्णीतेऽर्थेऽपि तु सन्दिग्धेऽर्थे न्यायः प्रवर्तते' ।
न च घटे नित्यत्वसन्देहोऽस्ति ! अनित्यत्वस्य निश्चितत्वात् । तेन
यद्यपि स्वरूपेण घटो विद्यते, तथाप्यनित्यत्वसन्देहाभावान्नासावाश्रय
इत्याश्रयासिद्धत्वादहेतुः ।
स्वरूपासिद्धस्तु स उच्यते यो हेतुराश्रये नावगम्यते । यथा 'सामान्यम-
नित्यं कृतकत्वात्' इति । कृतकत्वं हि हेतुराश्रये सामान्ये नास्त्येव ।
भागासिद्धोऽपि स्वरूपासिद्ध एव । यथा 'पृथिव्यादयश्चत्वारः परमाणवो
जा 'सकता है पूर्वसिद्ध घट के अनित्यत्व का ही साधक होने से । [ फिर आप
उसको 'आश्रयासिद्ध' कैसे कहते हैं ] ?
[ उत्तर ] ऐसा कहना ठीक नहीं है [ कि इस अनुमान में कार्यत्वात् हेतु
आश्रयासिद्ध नहीं है। क्योंकि ] कोई [ घट आदि ] वस्तु स्वरूप से अनुमान का
आश्रय [ अर्थात् पक्ष ] नहीं होती है, किन्तु [ 'सन्दिग्धसाध्यवान् पक्षः' इस
लक्षण के अनुसार ] सन्दिग्ध धर्म का आश्रय होने से ही । [ अनुमान का
आश्रय या पक्ष बनती है ] जैसा कि [वात्स्यायन] भाष्य में कहा भी है कि—
[ सर्वथा ] 'अज्ञात अर्थ अथवा [ सर्वथा ] निश्चित [ ज्ञात ] अर्थ में
[ न्याय ] अनुमान की प्रवृत्ति नहीं होती किन्तु सन्दिग्ध अर्थ में' [ ही अनुमान
की प्रवृत्ति होती है । इसलिए घट भी 'सन्दिग्ध-साध्यवान्' होने पर ही अनुमान
का 'आश्रय' अथवा 'पक्ष' हो सकता है ] ।
[ किन्तु ] घट में अनित्यत्व का सन्देह नहीं है । अनित्यत्व का निश्चय होने
से । इसलिए यद्यपि स्वरूपतः घट विद्यमान है तथापि अनित्यत्व का सन्देह न
होने से वह [ सन्दिग्धसाध्यवान् न होने से ] 'आश्रय' [ पक्ष ] नहीं है । इसलिए
[ कार्यत्वात् हेतु ] 'आश्रयासिद्ध' होने से अहेतु [ हेत्वाभास ] है ।
'स्वरूपासिद्ध' [ हेत्वाभास ] तो वह कहलाता है जो हेतु [ अपने ] आश्रय
[ पक्ष ] में नहीं पाया जाता है । जैसे 'सामान्य [ घटत्व जाति ] अनित्य है
कृतक [ जन्य ] होने से'। [ इस अनुमान में ] कृतकत्व हेतु आश्रय [ पक्ष ]
सामान्य में नहीं रहता है [ क्योंकि सामान्य कृतक नहीं, नित्य है । इसलिए
यहां 'कृतकत्व' हेतु 'स्वरूपासिद्ध' है ] ।
'भागासिद्ध' भी 'स्वरूपासिद्ध' ही [होता] है । 'जैसे पृथिवी आदि चार [के]
परमाणु नित्य हैं, गन्धयुक्त होने से' यहां 'गन्धवत्त्व' [हेतु] पक्ष बनाए हुए [पृथिवी,