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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 312, कुल 330 में से

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पृष्ठ 312

आश्रयासिद्धः ] हेत्वाभासनिरूपणम् २४७
विरोधो साध्यविपर्ययव्याप्याख्यो दुष्टज्ञप्तिव्यभिचाराद्यस्तथाभूतास्तेऽ-
नैकान्तिकाद्यस्त्रयः । ये पुनर्व्याप्तिपक्षधर्मताविशिष्टहेतुस्वरूपज्ञप्त्यभावेन
पूर्वोक्ता असिद्ध्यादयो दुष्टज्ञप्तिकारकाः, दूषणानीति यावत् । तथाभूतः
सोऽसिद्धः ।
स च त्रिविधः । आश्रयासिद्ध-स्वरूपासिद्ध-व्याप्यत्वासिद्धभेदात् । तत्र यस्य
हेतोराश्रयो नावगम्यते स आश्रयासिद्धः । यथा 'गगनारविन्दं सुरभि, अरवि-
न्दत्वात्, सरोजारविन्दवत्' । अत्र हि गगनारविन्दमाश्रयः स च नास्त्येव ।
अयमप्याश्रयासिद्धः । तथाहि 'घटोऽनित्यः कार्यत्वात् पटवत्'
इति । नन्वाश्रयस्य घटादेः सत्त्वात् कार्यत्वादिति हेतुर्नाश्रयासिद्धः,
सिद्धसाधकस्तु स्यात्, सिद्धस्य घटानित्यत्वस्य साधनात् ।
कोई मूल्य नहीं होता है । ] ऐसा होने पर जहां 'साध्यविपर्यय व्याप्ति' रूप विरोध
[ दोष पहिले प्रतीत होने से ] दुष्टतासूचक है वहां 'विरुद्ध' हेत्वाभास है [ विरोध
के बाद वहां असिद्ध का लक्षण भी भले ही प्रतीत हो परन्तु अब उसका कोई
उपयोग नहीं है। इसलिए वहाँ केवल विरुद्ध हेत्वाभास व्यवहार होगा । असिद्ध
व्यवहार नहीं होगा । अतएव 'असिद्ध' और 'विरुद्ध' का सङ्कर होने का कोई
अवसर नहीं है । ] इसी प्रकार जहां व्यभिचार आदि वैसे [ अर्थात् प्रथम प्रतीत
होकर दुष्टतासूचक ] हैं वह 'अनैकान्तिक' आदि तीन [ हेत्वाभास होंगे । वहां
भी बाद में असिद्ध का लक्षण प्रतीत होने पर भी 'असिद्ध' व्यवहार नहीं होगा
अतः साङ्कर्य की शङ्का नहीं हो सकती है ] और फिर जो व्याप्ति और पक्षधर्मता-
विशिष्टहेतु के स्वरूप का ज्ञापक न होने से पूर्वोक्त असिद्ध आदि दुष्टतासूचक
अर्थात् दूषण हैं वह 'असिद्ध' [ हेत्वाभास ] है । ऐसी व्याख्या करने से असिद्ध
का किसी के साथ सङ्कर नहीं हो सकता है ] ।
और वह [ असिद्ध ] तीन प्रकार का होता है । १ आश्रयासिद्ध, २ स्वरूपा-
सिद्ध और व्याप्यत्वासिद्ध भेद से । जिस हेतु का आश्रय [ अर्थात् पक्ष ] न
प्रतीत होता हो वह 'आश्रयासिद्ध' [ हेत्वाभास ] है । जैसे 'आकाश, कमल
सुगन्धित है, कमल होने से, तालाब में उत्पन्न हुए कमल के समान' । यहां
आकाश, कमल [ पुष्प ] आश्रय [ अर्थात् पक्ष ] है । और वह [ वस्तुतः ] है
ही नहीं । [ इसलिए 'अरविन्दत्वात्' यह हेतु 'आश्रयासिद्ध' हेत्वाभास है ] ।
यह भी 'आश्रयासिद्ध' है जैसे 'घट अनित्य है, कार्य होने से पट के समान' ।
[ प्रश्न ] आश्रयभूत घटादि के सत् [ विद्यमान ] होने से [ इस अनुमान में
प्रयुक्त ] 'कार्यत्वात्' हेतु 'आश्रयासिद्ध' नहीं हो सकता है । सिद्धसाधक तो कह!