तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
२२६ तर्कभाषा [ विवर्तवादः
या 'विवर्त' कहते हैं। इस 'विवर्त' और 'परिणाम' का लक्षण इस प्रकार किया
गया है—
सतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विकार इत्युदीरितः ।
अतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विवर्त इत्युदाहृतः ॥
अर्थात् जहां तत्त्व-परिवर्तन सहित अन्यथा प्रतीति होती है उसको 'विकार'
कहते हैं। जैसे दही दूध का 'विकार' है। इसी को 'परिणाम' भी कहते हैं।
सांख्य दर्शन 'परिणामवाद' का प्रतिपादन करता है। और तत्त्व-परिवर्तन के
बिना होने वाली अन्यथा प्रतीति को 'विवर्त' कहते हैं। जैसे सर्प रज्जु का
'परिणाम' नहीं अपितु 'विवर्त' है। शाङ्कर वेदान्त 'विवर्तवाद' का संस्थापक
है। उसके मत में जगत् ब्रह्म का 'विवर्त' है। अर्थात् जगत् की प्रतीति ब्रह्म
में इसी प्रकार है जैसे रज्जु में सर्प की प्रतीति। इस प्रकार शाङ्कर मत में भी
जगत्, 'विज्ञान-वादी' बौद्धों के समान, स्वप्न-परिकल्पित वस्तुओं के तुल्य
भ्रममात्र है। उसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। वास्तविक सत्य वस्तु
ब्रह्म ही है।
इस प्रकार बौद्धों के 'विज्ञानवाद' और शङ्कराचार्य के 'ब्रह्मवाद' में बहुत
कुछ समानता है। उनमें जो मुख्य अन्तर है वह यह है कि बौद्ध सबको क्षणिक
मानते हैं इसलिए उनका 'विज्ञान' भी 'क्षणिक विज्ञान' है। इसके विपरीत
'शाङ्कर वेदान्त' का 'ब्रह्म' नित्य पदार्थ है। इसलिए दोनों में भेद तो है परन्तु
फिर भी उनका बहुत सा स्वरूप मिलता-जुलता है इसलिए सांख्य-प्रवचन
भाष्य में, निम्न पुराण-वचन के आधार पर उस शाङ्कर 'मायावाद' को 'प्रच्छन्न
बौद्ध' कहा गया है—
मायावादमसच्छास्त्रं 'प्रच्छन्नं बौद्धमेव' च ।
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ॥
बौद्धों के 'विज्ञानवाद' में और शङ्कर के 'ब्रह्मवाद' में क्रमशः 'विज्ञान'
और 'ब्रह्म' से अतिरिक्त अर्थों का अस्तित्व नहीं माना जाता है। उसका खण्डन
करने के लिए ही ग्रन्थकार ने यहां इस प्रसङ्ग की अवतारणा की है। सिद्धान्त
पक्ष से इन दोनों मतों के खण्डन में जो युक्ति दी गई है वह केवल इतनी ही
है कि द्रव्य आदि पदार्थ प्रत्यक्ष-सिद्ध हैं अतएव उनका अपलाप नहीं किया जा
सकता है। अतः उनका अस्तित्व मानना अनिवार्य है।
'तर्कभाषा' प्रधानतः न्याय की शैली के आधार पर लिखी गई है
इसीलिए न्याय के प्रमाण, प्रमेय आदि षोडश पदार्थों का निरूपण चल रहा है।
प्रमेय बारह माने गये हैं। उनमें से १ आत्मा, २ शरीर, ३ इन्द्रिय, इन तीनों के
बुद्धिनिरूपणम् ] प्रमेयनिरूपणम् २२७
५ बुद्धिः
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इत्यादिभिः पर्यायशब्दैर्याऽभिधीयते सा
बुद्धिः । अर्थप्रकाशो वा बुद्धिः । सा च संक्षेपतो द्विविधा । अनुभवः
स्मरणं च । अनुभवोऽपि द्विविधो, यथार्थोऽयथार्थश्चेति ।
तत्र यथार्थोऽर्थाऽविसंवादी । स च प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्जन्यते । यथा
चक्षुरादिभिरदुष्टैर्घटादिज्ञानम् । धूमलिङ्गकमग्निज्ञानम् । गोसादृश्य-
निरूपण के बाद चौथा पर्याय 'अर्थ' का आया । इस 'अर्थ' प्रमेय के अन्तर्गत
नवीन न्याय की शैली में वैशेषिकोक्त द्रव्य आदि छः पदार्थों का अन्तर्भाव कर
लिया गया है। वैसे न्याय-सूत्रकार ने अर्थ शब्द से वैशेषिकोक्त द्रव्य आदि षट्
पदार्थों का ग्रहण न करके रूपादि गुणों का ग्रहण किया है। जैसा कि—
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः ।
इस सूत्र से स्पष्ट है। परन्तु नवीन आचार्यों ने इसी 'अर्थ' प्रमेय के
अन्तर्गत वैशेषिक के द्रव्यादि षट् पदार्थों का ग्रहण कर उनका
निरूपण किया है। 'तर्कभाषा' ने भी इसी पद्धति का अवलम्बन कर यहाँ तक
वैशेषिकोक्त सब पदार्थों का वर्णन इस 'अर्थ' निरूपण-प्रसङ्ग में कर दिया है।
अब आगे क्रमप्राप्त पञ्चम प्रमेय 'बुद्धि' का निरूपण प्रारम्भ करते हैं। यद्यपि
वैशेषिक के गुणों के अन्तर्गत बुद्धि का संक्षिप्त वर्णन किया जा चुका है। परन्तु
न्याय में उसको अलग प्रमेय माना है अतएव आगे उसके क्रमप्राप्त होने
से उसका वर्णन करते हैं।
५. बुद्धि
बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान, प्रत्यय आदि पर्याय शब्दों से जिसको कहा जाता है
वह बुद्धि है। अथवा अर्थ के ज्ञान को बुद्धि कहते हैं। वह संक्षेप से दो प्रकार
की है [ एक ] अनुभव और [ दूसरी ] स्मरण । [ उनमें से ] अनुभव भी दो
प्रकार का होता है [ एक ] यथार्थ और [ दूसरा ] अयथार्थ ।
उसमें यथार्थ [ अनुभव ] अर्थ का अविसंवादी [ अर्थानुसारी ] होता है
और वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से उत्पन्न होता है। जैसे १ दोषरहित चक्षु
आदि से घट आदि का ज्ञान [ यह प्रत्यक्ष यथार्थानुभव है ] । २ धूम आदि
[ शुद्ध ] लिङ्ग से अग्नि आदि का ज्ञान [ यह यथार्थ अनुमानरूप अनुभव हुआ ] ।
३ गो के सादृश्य को देखने से गवय शब्द से वाच्य होने का ज्ञान [ यह उपमान
१ न्यायदर्शन, १, १, १४ ।
१२८ तर्कभाषा [ बुद्धिनिरूपणम्
दर्शनाद् गवयशब्दवाच्यताज्ञानम् । 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत'
इत्यादि वाक्याज्ज्योतिष्टोमस्य स्वर्गसाधनताज्ञानञ्च ।
अयथार्थस्तु अर्थव्यभिचारी, अप्रमाणजः । स त्रिविधः । संशय-
स्तर्को विपर्ययश्चेति, संशयतर्कौ वक्ष्येते ।
विपर्ययस्तु अतस्मिंस्तद्ग्रहः । भ्रम इति यावत् । यथा पुरोवर्तिन्य-
रजते शुक्तिकादौ रजतारेापः, 'इदं रजतम्' इति ।
प्रमाणजन्य यथार्थ अनुभव हुआ ] । ४ स्वर्ग की इच्छा रखने वाला ज्योतिष्टोम
याग करे, इस [ वेद ] वाक्य से ज्योतिष्टोम [ याग ] में स्वर्गसाधनता का ज्ञान
[ यह शब्द प्रमाणजन्य यथार्थ अनुभव हुआ ] ।
अयथार्थ [ अनुभव ] तो अर्थ का व्यभिचारी और अप्रमाण से उत्पन्न
होता है । वह तीन प्रकार है । १ संशय, २ तर्क और ३ विपर्यय । [ इनमें से ]
संशय और तर्क [ न्याय के षोडश पदार्थों में गिने हुए हैं अतएव आगे यथा-
स्थान ] कहे जावेंगे । [ विपर्यय को यहाँ कहते हैं ] अतत् में तत्
[ अरजत शुक्तिकादि में रजत ] की प्रतीति विपर्यय या भ्रम है । जैसे सामने
स्थित अरजत शुक्तिकादि में रजत का आरोप, कि यह रजत है । [भ्रम कहलाता है]।
ख्यातिपञ्चक—
भ्रमज्ञान अथवा विपर्यय ज्ञान का विश्लेषण कई दार्शनिक सम्प्रदायों
में भिन्न २ रीति से किया गया है । जिसके परिणामस्वरूप मुख्यतः 'पञ्च
ख्यातियां' प्रसिद्ध हैं ।
आत्मख्यातिरसतख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा ।
तथानिर्वचनीयख्यातिरित्येतत् ख्यातिपञ्चकम् ॥
'ख्याति' शब्द का अर्थ ज्ञान है । भ्रमस्थल में किसका ज्ञान होता है
इसको लेकर इन पांच 'ख्यातियों' की स्थापना हुई है । इनमें से 'आत्म-
ख्याति' और 'असत्ख्याति' यह दो बौद्ध पक्ष हैं । 'आत्मख्याति' में आत्म
शब्द से 'विज्ञानवादी' बौद्धों के 'विज्ञानतत्त्व' का ग्रहण करना चाहिए। 'विज्ञान-
वाद' के अनुसार घट-पट आदि बाह्य विषयों का तो कोई अस्तित्व है ही
नहीं । केवल 'विज्ञान' ही इन सब रूपों में भासता है यह बात पहिले कह चुके
हैं । इसलिए भ्रमस्थल में स्वयं 'विज्ञान' ही भ्रान्त घट के रूप में भी भासता
है । यही 'आत्मख्याति' पक्ष का सार है । दूसरी 'असत् ख्याति' 'शून्यवादी'
माध्यमिक बौद्धों का अभिमत पक्ष है । उनके मत में 'विज्ञान' का भी अस्तित्व
ख्यातिपञ्चकम् ] प्रमेयनिरूपणम् २२६
नहीं है और शून्य ही सब रूपों में भासता है इसलिए भ्रमस्थल में भी शून्य
का ही भान होता है । यह 'असत्ख्याति' का अभिप्राय है।
तीसरा 'अख्याति' पक्ष मीमांसकों में प्रभाकर-सम्प्रदाय का है। 'अख्याति'
का अर्थ 'ज्ञान का अभाव' अर्थात् 'भेदाग्रह' है। प्रभाकर का मत यह है कि
'अतस्मिंस्तत्प्रतीति' 'अतद्रूपप्रतिष्ठ-ज्ञान' अथवा 'तदभाववति तत्प्रकारकं ज्ञानं
भ्रमः' आदि भ्रम के जो लक्षण किए गए हैं उस प्रकार का भ्रमरूप ज्ञान होता ही
नहीं है। जिसको दूसरे लोग 'भ्रम' कहते हैं उसका विश्लेषण कर, प्रभाकर
यह कहते हैं कि यहाँ भ्रम का कोई अवसर नहीं है। जैसे शुक्ति में रजत की
प्रतीति को भ्रम कहा जाता है। यहां तर्कभाषाकार ने भी 'अतस्मिंस्तत्' रूप
भ्रम-ज्ञान का उदाहरण यही दिया है। प्रभाकर का कहना है कि यह
वस्तुतः एक ज्ञान नहीं है अपितु इसमें 'इदम्' और 'रजतम्' यह दो ज्ञान अलग
अलग हैं। 'इदम्' अंश का ज्ञान इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न
'प्रत्यक्ष' ज्ञान होता है और वह यथार्थ ज्ञान है। 'रजतम्' इस अंश की 'स्मृति'
होती है। वह भी यथार्थ है। इस प्रकार 'इदम्' अंश जो प्रत्यक्ष अनुभवात्मक
है वह इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होने से यथार्थ है। और 'रजतम्' यह अंश
संस्कारजन्य और स्मरणात्मक है, वह भी यथार्थ है। इसलिए दोनों अंशों में
से कहीं भी भ्रम नहीं है।
तब प्रश्न यह होता है कि शुक्ति को भ्रम से रजत समझ कर मनुष्य उसको उठाने
में क्यों प्रवृत्त हो जाता है इसका उत्तर यह है कि इन दोनों ज्ञानों के भेद का
ग्रहण उसको नहीं रहता है। उस समय उस व्यक्ति को यह ज्ञान नहीं रहता है कि
मुझे जो 'इदं रजतम्' ज्ञान हो रहा है उसमें से 'इदम्' अंश तो 'अनुभवात्मक'
प्रत्यक्ष है और 'रजतम्' अंश 'स्मरणात्मक' है। अनुभव और स्मरणरूप द्विविध
ज्ञान के भेद का ग्रहण न होने से ही मनुष्य उस सीप को उठाने में प्रवृत्त
हो जाता है। इसलिए इस व्यवहार का कारण 'भेदाग्रह' है। इसी 'भेदाग्रह'
को 'अख्याति', भेद की अख्याति, अर्थात् भेद का ज्ञान न होना कहते हैं।
इसी को 'अख्यातिवाद' कहते हैं। और वह प्रभाकर का सिद्धान्त है।
चौथा 'अनिर्वचनीय ख्याति' वाला पक्ष वेदान्तियों का है। उपनिषद् में
स्वप्न-वर्णन के प्रसङ्ग में आया है, 'तत्र न रथाः, न रथयोगाः, अथ रथान्
रथयोगान् पथः सृजते' । अर्थात् वहाँ न रथ होते हैं और न रथयुक्त मार्ग
आदि, परन्तु स्वप्नद्रष्टा रथों और रथयुक्त मार्गों की सृष्टि कर लेता है।
इस उपनिषद्वाक्य में 'सृजते' शब्द का प्रयोग होता है इससे सिद्ध होता है कि
२३० तर्कभाषा [ बुद्धिः
स्मरणमपि यथार्थमयथार्थञ्चेति द्विविधम् । तदुभयं जागरे । स्वप्ने
तु सर्वं ज्ञानं स्मरणमयथार्थञ्च । दोषवशेन तदिति स्थाने इदमित्युदयात् ।
सर्वञ्च ज्ञानं निराकारमेव न तु ज्ञानेऽर्थेन स्वस्याकारो जन्यते ।
साकारज्ञानवादनिराकरणात् । अत एवाकारेणार्थानुमानमपि निरस्तम् ।
उपनिषत्कार के मत में स्वप्न काल में 'प्रातिभासिक' रथ आदि उत्पन्न होते हैं।
उनकी स्थिति तथा प्रतीति केवल स्वप्न-काल में ही रहती है। जागने पर वह
स्वयं समाप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार भ्रम के स्थल में भी 'प्रातिभासिक रजत'
की उत्पत्ति होती है। उस नवोत्पन्न 'प्रातिभासिक' रजत की स्थिति उतने ही काल
तक रहती है जितनी देर तक भ्रम की स्थिति है। इसीलिए उसको 'प्राति-
भासिक रजत' कहते हैं। यह 'प्रातिभासिक' रजत सत्य है यह नहीं कहा जा
सकता है क्योंकि आगे चल कर उसका बाध होता है। और उसको नितान्त
असत् भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उसकी प्रतीति होती है। इसलिए यह
'प्रातिभासिक-रजत' 'सत्त्वेन' और 'असत्त्वेन' निर्वक्तुम् अशक्य होने से 'अनि-
र्वचनीय' रजत कहा जाता है। भ्रम-स्थल में 'अनिर्वचनीय' रजत आदि का
ही भान होता है। इसलिए शाङ्कर वेदान्त के इस सिद्धान्त को 'अनिर्वचनीय
ख्याति' नाम दिया गया है।
पञ्चम 'अन्यथा-ख्यातिवाद' नैयायिकों का पक्ष है। नैयायिकों का कहना
है कि शुक्ति-रजतस्थल में 'प्रातिभासिक रजत' की उत्पत्ति मानना उचित नहीं
है। दोष के प्रभाव से जैसे पाण्डुरोग के रोगी को 'पीतः शंखः' प्रतीति होने
लगती है इसी प्रकार दोषवश से हट्टस्थ अर्थात् बाजार में रखे हुए रजत की
प्रतीति शुक्ति में होने लगती है। इसी का नाम 'अन्यथा-ख्याति' है।
स्मरण भी दो प्रकार का होता है—१ यथार्थ और २ अयथार्थ। जाग्रत्
अवस्था में दोनों प्रकार का स्मरण होता है। और स्वप्न में तो सारा ज्ञान
स्मरणात्मक और अयथार्थ ही होता है। दोषवश से [ तत् ] वह के स्थान पर
यह [ इदम् ] प्रतीति होने से।
ज्ञान के आकार से अर्थों का अनुमान करके अर्थों को अनुमेय मानने
वाले बौद्धों के 'वैभाषिक' सम्प्रदाय का उल्लेख पीछे किया जा चुका है उनके
सिद्धान्त का निराकरण करने के लिए आगे का प्रकरण प्रारम्भ करते हैं—
और सारा ज्ञान निराकार ही होता है। अर्थ, ज्ञान में अपना [ कोई ]
आकार उत्पन्न नहीं करता है। साकार ज्ञानवाद का खण्डन हो जाने से [ अर्थात्
यदि ज्ञान का आकार माना जाय तो वह कोई नियत आकार नहीं बन सकता
मन आदयः ] प्रमेयनिरूपणम् २३१
प्रत्यक्षसिद्धत्वाद् घटादेः । सर्वं ज्ञानमर्थनिरूप्यं, अर्थप्रतिबद्धस्यैव तस्य
मनसा निरूपणात् । घटज्ञानवानहं, इत्येतावन्मात्रं गम्यते न तु 'ज्ञान-
वानहम्' इत्येतावन्मात्रं ज्ञायते ।
६ मनः
अन्तरिन्द्रियं मनः । तच्चोक्तमेव ।
७ प्रवृत्तिः
प्रवृत्तिः धर्माधर्ममयी यागादिक्रिया, तस्या जगद्व्यवहारसाधकत्वात् ।
८ दोषाः
दोषा राग-द्वेष-मोहाः ।
राग इच्छा ।
द्वेषो मन्युः, क्रोध इति यावत् ।
मोहो मिथ्याज्ञानं विपर्यय इति यावत् ।
६ प्रेत्यभावः
पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । स चात्मनः पूर्वदेहनिवृत्तिः, अपूर्वदेह-
सङ्घातलाभः ।
है । ] इसलिए आकार से अर्थ का अनुमान भी खण्डित हो जाता है । घटादि
के प्रत्यक्ष सिद्ध होने से [ उनको अनुमेय मानने की कोई आवश्यकता भी नहीं
है ] । सारा ज्ञान अर्थ से निरूपित होता है । 'मैं घटज्ञानवान् हूँ' [ विषय
सहित ] यही प्रतीत होता है [ केवल विषय रहित ] 'ज्ञानवानहम्' केवल
इतना ही प्रतीत नहीं होता है । [अतः सारा ज्ञान अर्थ से ही निरूपित होता है]।
अन्तरिन्द्रिय [ का नाम ] 'मन' है । और वह कहा जा चुका है ।
धर्म अधर्म रूप यागादि क्रिया [ और उससे उत्पन्न धर्माधर्म ] प्रवृत्ति
[ कहलाते ] हैं । उस [ धर्माधर्म रूप प्रवृत्ति ] के जगत् के व्यवहार का
साधक होने से ।
राग द्वेष मोह [ यह तीनों ] 'दोष' हैं ।
'राग' इच्छा [ को कहते ] हैं ।
'द्वेष' मन्यु अर्थात् क्रोध [ को कहते हैं ] ।
'मोह' मिथ्या ज्ञान अर्थात् विपर्यय [ को कहते हैं ] ।
पुनर्जन्म प्रेत्यभाव [ प्रेत्य मर कर, भाव अर्थात् फिर उत्पन्न होना ] है ।
और वह [ पुनर्जन्म ] आत्मा के पूर्व शरीर की समाप्ति और नवीन शरीर आदि
समूह की प्राप्ति [ हो ] है [ अर्थात् पुनरुत्पत्ति नहीं समझनी चाहिए । क्योंकि
२४२ तर्कभाषा [ फलादयः
१० फलम्
फलं पुनर्भोगः सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कारः ।
११ दुःखम्
पीडा दुःखम् । तच्चोक्तमेव ।
१२ अपवर्गः
मोक्षोऽपवर्गः । स चैकविंशतिप्रभेदभिन्नस्य दुःखस्यात्यन्तिकी निवृत्तिः।
एकविंशतिभेदास्तु शरीरं, षडिन्द्रियाणि, षड् विषयाः, षड् बुद्धयः,
सुखं दुःखञ्चेति गौणमुख्यभेदात् । सुखं तु दुःखमेव दुःखानुषङ्गि-
त्वात् । अनुषङ्गोऽविनाभावः । स चायमुपचारो मधुनि विषसंयुक्ते
मधुनोऽपि विषपक्षनिक्षेपवत् ।
स पुनरपवर्गः कथं भवति ?
उच्यते । शास्त्राद् विदितसमस्तपदार्थतत्त्वस्य, विषयदोषदर्शन-
विरक्तस्य मुमुक्षोर्ध्यायिनो ध्यानपरिपाकवशात् साक्षात्कृतात्मनः क्लेश-
आत्मा तो नित्य है वह कभी उत्पन्न नहीं होता है। देह इन्द्रिय आदि के साथ
आत्मा के पुनः सम्बन्ध का नाम ही प्रेत्यभाव या पुनर्जन्म है ] ।
सुख या दुःख में से किसी के अनुभव रूप भोग को 'फल' कहते हैं।
पीड़ा को 'दुःख' कहते हैं उसका वर्णन हो ही चुका ।
मोक्ष को 'अपवर्ग' कहते हैं। और वह [ मोक्ष ] इक्कीस प्रकार के दुःखों
की अत्यन्त निवृत्ति है [ दुःखों के ] इक्कीस भेद तो [ इस प्रकार हैं ] शरीर,
छः इन्द्रियाँ, छः विषय, छः ज्ञान, और सुख तथा दुःख । यह गौण और मुख्य
भेद से [ इक्कीस प्रकार के दुःख हैं, जिससे छूटने का नाम 'अपवर्ग' या मोक्ष
है ] । दुःख से मिश्रित होने के कारण [ लौकिक ] सुख भी दुःख ही है ।
अनुषङ्ग [ का अर्थ ] 'अविनाभाव' है। मधु के विष संयुक्त होने पर [मधु को भी]
विष समझे जाने के समान [ लौकिक सुख को दुःख से अविनाभूत, मिश्रित, होने
से दुःख समझने का ] उपचार [ गौणव्यवहार ] है ।
[ प्रश्न ] वह 'अपवर्ग' कैसे प्राप्त होता है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । [ सबसे पहिले ] शास्त्रों [ के अध्ययन ] से समस्त
पदार्थों का तत्त्व ज्ञान प्राप्त करके विषयों के दोषों को देखने से [ लौकिक
विषयों के प्रति ] विरक्त, [ हुए अतएव ] मोक्ष की इच्छा करने वाले [ और
उसकी प्राप्ति के लिए योग शास्त्र में वर्णित प्रकार से ] ध्यान करने वाले मुमुक्षु
साधक के ध्यान के परिपक्व होने से आत्मसाक्षात्कार करने वाले अतएव
[ आत्म ज्ञान हो जाने से अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश रूप पांच ]
कर्मभेदाः ] प्रमेयनिरूपणम् २३३
हीनस्य, निष्कामकर्मानुष्ठानादनागतधर्माऽधर्मावनर्जयतः पूर्वोपात्तञ्च
धर्माऽधर्मप्रचयं योगर्द्धिप्रभावाद् विदित्वा, समाहृत्य भुञ्जानस्य पूर्वकर्म-
निवृत्तौ वर्तमानशरीरापगमे पूर्वशरीराभावाच्छरीराद्येकविंशतिदुःखस-
म्बन्धो न भवति कारणाभावात् । सोऽयमेकविंशतिप्रभेदभिन्नदुःखा-
निर्मोक्षः। सोऽपवर्ग इत्युच्यते ।
क्लेशों से रहित [ अविद्याऽस्मितारागद्वेषाभिनिवेशा पञ्चक्लेशाः । १ ] अतएव [ राग
द्वेष आदि के अभाव में ] निष्काम भाव से कर्मों के अनुष्ठान करने के कारण
[ निष्काम कर्म से धर्म अधर्म रूप संस्कारों की उत्पत्ति नहीं होती है । इसलिए ]
नए धर्म और अधर्म का उपार्जन न करने वाले; और पूर्वोपात्त धर्माधर्म को
योग शक्ति के प्रभाव से जान कर एक साथ भोग डालने वाले [ तत्त्व-ज्ञान हो
जाने पर राग, द्वेष, नहीं रहता अतएव निष्काम भाव से किए जाने वाले कर्मों
से नवीन धर्माधर्म उत्पन्न नहीं होते हैं । ] पूर्व कर्मों की समाप्ति पर वर्तमान
शरीर के नाश होने पर नए शरीर की उत्पत्ति [ के कारणभूत धर्माधर्म के
अभाव में ] न होने से इक्कीस प्रकार के दुःखों का सम्बन्ध [ आत्मा के साथ ]
कारण [ धर्माधर्म ] के अभाव से नहीं होता है। यही इक्कीस प्रकार के दुःखों
का विनाश मोक्ष है। वही 'अपवर्ग' कहलाता है।
कर्मों के भेद—
कर्म के तीन प्रकार हैं, एक 'प्रारब्ध' दूसरे 'सञ्चित' और तीसरे
'क्रियमाण' । जिन कर्मों का फल भोग करने के लिए यह शरीर प्राप्त हुआ
है उसका भोग प्रारम्भ हो चुका है अतएव वह 'प्रारब्ध' कहलाते हैं। इनका
नाश भोग पूर्ण होने पर ही होता है। 'क्रियमाण' कर्म वह है जो इस समय
में किया जा रहा है। इन कर्मों के संस्कार 'सञ्चित' होते रहते हैं । उनका
भोग आगे होगा अतएव वह 'सञ्चित' कर्म कहलाते हैं। जब तक तत्त्वज्ञान
या आत्मसाक्षात्कार नहीं होता है तब तक किए गए कर्मों से संस्कार बनते
हैं। परन्तु आत्मसाक्षात्कार के बाद किए जाने वाले कर्मों से संस्कार नहीं
बनते । इसलिये आत्मसाक्षात्कार के बाद मोक्ष की प्राप्ति के लिए 'प्रारब्ध'
कर्म और 'सञ्चित' कर्मों की समाप्ति का कार्य शेष रह जाता है। इन दोनों
की समाप्ति होने पर ही मोक्ष होता है। इनमें से 'प्रारब्ध' कर्मों का भोग
तो नियत समय तक अर्थात् जब तक इस वर्तमान शरीर की आयु निर्धारित
है तब तक चलता ही है। उसका उपपादन 'चक्रभूमि' के उदाहरण से किया
गया है। जैसे कुम्हार एक बार अपने 'चाक' को घुमा देता है तो उसमें जो
१ योग दर्शन २, ३ ।
२३४ तर्कभाषा [ कर्मनाशोपायाः
वेग संस्कार उत्पन्न हो जाता है उसके कारण चाक बहुत देर तक घूमता रहता
है इसी प्रकार प्रारब्ध कर्मों के वश यह शरीर अपने भोग के समाप्त होने तक
बना रहता है। 'तिष्ठति संस्कारवशाच्चक्रभ्रमिवद् धृतशरीरः'१। आत्म ज्ञान के
बाद जितने समय तक वर्तमान शरीर का नाश नहीं होता है तब तक साधक
'जीवन्मुक्ति' की अवस्था में रहता है। इस अवस्था में वह जो कुछ भी कर्म
करता है उसके उन कर्मों से नए संस्कार नहीं बनते हैं। इसीलिए कहा है कि
मातृवध पितृवध जैसे कर्मों से भी उसका कुछ नहीं बिगड़ता है।
'सञ्चित' कर्मों के नाश के प्रकार—
अब सञ्चित कर्मों से छुटकारा पाने का प्रश्न शेष रह जाता है। इसके विषय
में दो प्रकार के मत हैं। गीता का कथन तो यह है कि 'ज्ञानाग्निः सर्वकर्माणि
भस्मसात् कुरुतेऽर्जुन'। अर्थात् तत्त्वज्ञान की अग्नि उन सारे 'सञ्चित' कर्मों को
भस्म कर देती है। इस पक्ष में तत्त्वज्ञान के बाद योगी के लिए कुछ कर्तव्य
शेष नहीं रह जाता है। उसके मोक्ष में उतनी ही देर का विलम्ब है जब तक
उसके वर्तमान शरीर का पात नहीं होता। 'तस्य तावदेव चिरं यावन्न विमोच्यते'।
'सञ्चित' कर्मों के विनाश का दूसरा प्रकार वह है जिसका यहां तर्कभाषा-
कार ने वर्णन किया है। उसका आशय यह है कि तत्त्व ज्ञान होने पर योगी
को इस बात का ज्ञान भी योगसामर्थ्य से हो जाता है कि इस समय मेरे इतने
'सञ्चित' कर्म शेष पड़े हैं और साधारण प्रक्रिया के अनुसार इनका भोग मुझे
अमुक अमुक योनि में करना होगा। तब योगी, अपने योग-सामर्थ्य से एक
साथ उन सब शरीरों का निर्माण कर डालता है जिनमें उसके 'सञ्चित' कर्मों
का भोग होना है। इस प्रकार वह सारे 'सञ्चित' कर्मों को एक साथ ही भोग
डालता है। इसलिए भोग के लिए कोई 'सञ्चित' कर्म शेष नहीं रहता है। नया
कर्म उत्पन्न नहीं होता, और 'प्रारब्ध' का भोग से नाश हो जाता है इस
प्रकार नवीन शरीर की उत्पत्ति का कारण न होने से शरीरादि की उत्पत्ति
नहीं होती। यही मोक्ष है।
मोक्ष के स्वरूपविषयक दो मत—
जिस प्रकार मोक्ष प्राप्ति के प्रकार में दो प्रकार के मत हैं इसी प्रकार
मोक्ष के स्वरूप के विषय में भी दो प्रकार के मत हैं। नैयायिक आचार्य दुःख
१ सांख्यकारिका ६७ ।
संशयः ] संशयनिरूपणम् २३५
३ संशयः
एकस्मिन् धर्मिणि विरुद्धनानार्थविमर्शः संशयः । स च त्रिविधः ।
विशेषादर्शने सति समानधर्मदर्शनजः, विप्रतिपत्तिजः, असाधारणधर्मश्चेति ।
तत्रैको विशेषादर्शने सति समानधर्मदर्शनजः यथा 'स्थाणुर्वा पुरुषो
वा' इति । एकस्मिन्नेव हि पुरोवर्तिनि द्रव्ये स्थाणुत्वनिश्चायकं वक्र-
की अत्यन्त निवृत्ति को ही मोक्ष कहते हैं । परन्तु वेदान्ती मोक्ष में दुःख
निवृत्ति के अतिरिक्त नित्य सुख की प्राप्ति भी मानते हैं। उनका कहना है कि
आत्मा नित्य, विभु और आनन्द रूप है। संसार काल में देहादि के सम्बन्ध के
कारण नित्य-सुख की प्रतीति नहीं हो पाती है, परन्तु मोक्षावस्था में उसके
स्वस्वरूपभूत आनन्द की अभिव्यक्ति भी होती है। इसलिए मोक्ष में वह
आनन्दी भवति नित्य-सुख के अनुभव का 'आनन्दमय' हो जाता है। नैयायिक
मोक्ष में नित्य सुख की अभिव्यक्ति नहीं मानते हैं। इस विषय पर न्यायसूत्र के
वात्स्यायन भाष्य में बहुत विस्तार के साथ विचार किया गया है।
प्रमेयोंका निरूपण प्रारम्भ करते समय 'आत्म-शरीर-इन्द्रिय-अर्थ-बुद्धि-मनः-
प्रवृत्ति-दोष-प्रेत्यभाव-फल-दुःख-अपवर्गास्तु प्रमेयम्' इस सूत्र द्वारा बारह 'प्रमेय'
गिनाये थे। अपवर्ग का निरूपण समाप्त होने के साथ उन प्रमेयों का निरूपण
समाप्त हो जाता है। और इस प्रकार यहां तक न्याय के सोलह पदार्थों में से
'प्रमाण' तथा 'प्रमेय' इन दो पदार्थों का निरूपण समाप्त हो जाता है। अतएव
न्याय के प्रतिपाद्य तृतीय संशय पदार्थ का निरूपण प्रारम्भ करते हैं।
३ संशय
एक धर्म में विरुद्ध नाना धर्मों का परिज्ञान संशय [ कहलाता ] है। और
वह तीन प्रकार का होता है। १ विशेष के अदर्शन होते हुए समान धर्म के
दर्शन से उत्पन्न [ संशय दूसरा विशेषादर्शन होते हुए ] २ विप्रतिपत्ति से
उत्पन्न, [ संशय और तीसरा विशेषादर्शन होते हुए ] ३ साधारणधर्म के दर्शन
से उत्पन्न [ संशय ] ।
उनमें से पहिला विशेषादर्शन होने पर समानधर्म के दर्शन से उत्पन्न संशय
[ का उदाहरण ] जैसे [ यह ] स्थाणु है या पुरुष । सामने स्थित एक [ लम्बे
लम्बे ] द्रव्य में स्थाणुत्व के निश्चायक टेढ़ी मेढ़ी कोटर आदि [ अथवा ]
पुरुषत्व के निश्चय कराने वाले सिर हाथ आदि [ अवयवों ] को न देखने वाले
और [ सम्मुखस्थ पदार्थ में ] स्थाणु और पुरुष के समान धर्म ऊंचाई आदि
को देखने वाले पुरुष को [ उस पदार्थ के विषय में ] संशय होता है कि 'यह
२३६ तर्कभाषा [ ३ संशयः
कोटरादिकं पुरुषत्वनिश्चायकञ्च शिरःपाण्यादिकं विशेषमपश्यतः
स्थाणुपुरुषयोः समानधर्ममूर्ध्वत्वादिकञ्च पश्यतः पुरुषस्य भवति संशयः
‘किमयं स्थाणुर्वा पुरुषो वा’ इति ।
द्वितीयस्तु संशयो विशेषादर्शने सति विप्रतिपत्तिजः । स यथा ‘शब्दो
नित उत अनित्य’ इति । तथा ह्येको ब्रूते शब्दो नित्य इति, अपरो ब्रूते
शब्दोऽनित्य इति । तयोर्विप्रतिपत्त्या मध्यस्थस्य पुंसो विशेषमपश्यतो
भवति संशयः ‘किमयं शब्दो नित्य’ उतानित्य इति ।
तृतीयोऽसाधारणधर्मदर्शनजस्तु संशयो यथा नित्यादनित्याच्च व्यावृत्तेन
भूमात्रासाधारणेन गन्धवत्त्वेन विशेषमपश्यतो भुवि नित्यत्वानित्यत्व-
संशयः । तथा हि ‘सकलनित्यव्यावृत्तेन गन्धवत्त्वेन योगाद्भूः किमनित्या,
उत सकलानित्यव्यावृत्तेन तेनैव योगान्नित्या’ इति संशयः ।
स्थाणु [ वृक्ष का ठूंठ ] है अथवा पुरुष’ [ इनमें विशेष धर्म वक्रकोटरादि
अथवा कर चरणादि का न दिखाई देना और समान धर्म आरोह-परिणाह
लम्बाई चौड़ाई का दिखाई देना ही संशय का कारण है । विशेषादर्शन तीनों
प्रकार के संशयों में कारण है ] ।
दूसरा संशय विशेष का अदर्शन होते हुए ‘विप्रतिपत्ति’ [ विपरीता विविधा
वा प्रतिपत्तिः विप्रतिपत्तिः । एक ही पदार्थ के विषय में दो व्यक्तियों का विपरीत
अथवा विविध प्रकार का ज्ञान ‘विप्रतिपत्ति’ कहलाता है ] से उत्पन्न [ संशय का
उदाहरण ] वह जैसे, ‘शब्द नित्य है अथवा अनित्य’ । क्योंकि एक [ वादी
वैयाकरण ] कहता है कि शब्द नित्य है और दूसरा [ प्रतिवादी नैयायिक ]
कहता है कि शब्द अनित्य है । उन दोनों की ‘विप्रतिपत्ति’ से विशेष [ नित्यत्व
या अनित्यत्व के निश्चायक हेतु ] को न देख सकने वाले, बीच के पुरुष को
संशय हो जाता है कि ‘क्या यह शब्द नित्य है अथवा अनित्य’ ।
तीसरा [ विशेषादर्शन होने पर ] असाधारणधर्म के दर्शन से उत्पन्न संशय
का उदाहरण ] तो जैसे, नित्य और अनित्य दोनों से पृथक् रहने वाले केवल
पृथिवी के असाधारण धर्म गन्धवत्त्व से, [नित्यत्व अथवा अनित्यत्व के निश्चायक]
विशेष धर्म को न जानने वाले [ पुरुष ] को पृथिवी [ के विषय ] में नित्यत्व
अथवा अनित्यत्व का संशय हो जाता है । जैसे कि [ आकाश आदि ] ‘समस्त
नित्य पदार्थों में न रहने वाले गन्धवत्त्व के योग से क्या पृथिवी अनित्य है ।
अथवा [ जल अग्नि आदि ] ‘किसी अनित्य पदार्थ में न रहने वाले उसी गन्धवत्त्व
के योग से पृथिवी नित्य है’ यह संशय हो जाता है । [ यह संशय गन्धवत्त्व रूप
असाधारण धर्म के दर्शन से होता है ।
प्रयोजनम् ] दृष्टान्तनिरूपणम् २३७
४ प्रयोजनम्
येन प्रयुक्तः प्रवर्तते तत् प्रयोजनम् । तच्च सुखदुःखावाप्तिहाना ।
तदर्था हि प्रवृत्तिः सर्वस्य ।
५ दृष्टान्तः
वादिप्रतिवादिनोः संप्रतिपत्तिविषयोऽर्थो दृष्टान्तः । स द्विवधः ।
न्याय सूत्र तथा उसके वात्स्यायन भाष्य में तीन के स्थान पर संशय के
पांच कारण गिनाए हैं । उनमें 'उपलब्धि की अव्यवस्था' तथा 'अनुपलब्धि की
अव्यवस्था' यह दो संशय के कारण और दिखाए हैं । समान 'धर्म' और 'विप्रति-
पत्ति' संशय के यह दोनों कारण 'न्यायसूत्र' तथा 'तर्कभाषा' दोनों ग्रन्थों में
समान हैं । 'असाधारण धर्म' के स्थान पर न्यायसूत्र में 'अनेकधर्मोपपत्तेः'
कहा है, और वात्स्यायन भाष्य में उसका अर्थ 'समानजातीयमसमानजातीय-
ञ्चानेकम्' किया है। न्याय सूत्र में संशय का लक्षण इस प्रकार किया गया है—
समानानेकधर्मोपपत्तेर्विप्रतिपत्तेरुपलब्ध्यनुपलब्ध्यव्यवस्थातश्च विशेषापेक्षो
विमर्शः संशयः¹ ।
४ प्रयोजन
न्याय के षोडश पदार्थों में संशय के बाद 'प्रयोजन' का स्थान आता है ।
अतएव ग्रन्थकार संशय के बाद 'प्रयोजन' का निरूपण करते हैं ।
जिससे प्रयुक्त होकर मनुष्य [ किसी कार्य में ] प्रवृत्त होता है वह 'प्रयोजन'
है । और वह [ मुख्यतः ] सुख की प्राप्ति और दुःख का नाश है । [ क्योंकि ]
उसी के लिए सब की प्रवृत्ति होती है ।
न्यायसूत्रकार ने प्रयोजन का लक्षण इस प्रकार किया है
यमर्थमधिकृत्य प्रवर्तते तत् प्रयोजनम्² ।
५ दृष्टान्त
प्रयोजन के बाद पांचवाँ पदार्थ 'दृष्टान्त' है । न्याय सूत्र में 'दृष्टान्त' का
लक्षण इस प्रकार किया गया है—
लौकिकपरीक्षकाणां यस्मिन्नर्थे बुद्धिसाम्यं स दृष्टान्तः³ ।
अर्थात् जिस अर्थ के विषय में साधारण लौकिक पुरुष और विशेषज्ञ
परीक्षक पुरुषों को एक सा ज्ञान हो जिसको दोनों एक रूप में मानते हों वह
अर्थ 'दृष्टान्त' हो सकता है। इसी बात को तर्कभाषाकार इस प्रकार कहते हैं—
वादी और प्रतिवादी दोनों के ऐकमत्य का विषय भूत अर्थ [ अर्थात्
१-३ न्याय सूत्र १, १, २३ । १, १, २४ । १, १, २५ ।
२३८ तर्कभाषा [ सिद्धान्तः
एकः साधर्म्यदृष्टान्तो यथा धूमवत्त्वस्य हेतोर्महानसम् । द्वितीयस्तु वैधर्म्य-
दृष्टान्तः । यथा तस्यैव महाह्रद इति ।
६ सिद्धान्तः
प्रामाणिकत्वेनाभ्युपगतोऽर्थः सिद्धान्तः । स चतुर्धा । सर्वतन्त्र-प्रति-
तन्त्र-अधिकरण-अभ्युपगम-सिद्धान्तभेदात् । तत्र सर्वतन्त्रसिद्धान्तो यथा
धर्मिमात्रसद्भावः । द्वितीयो यथा नैयायिकस्य मते मनस इन्द्रिय-
त्वम् । तद्धि समानतन्त्रे वैशेषिके सिद्धम् । तृतीयो यथा क्षित्यादिकर्तृत्व-
सिद्धौ कर्तुः सर्वज्ञत्वम् । चतुर्थो यथा जैमिनीयस्य नित्यानित्यविचारो
यथा भवतु, अस्तु 'तावच्छब्दो गुण' इति ।
जिसके विषय में वादी प्रतिवादी में मतभेद न हो ऐसा ] अर्थ 'दृष्टान्त' हो
[ सकता ] है । वह दो प्रकार का होता है । एक 'साधर्म्य-दृष्टान्त' जैसे धूमवत्त्व
हेतु का [ साधर्म्य दृष्टान्त ] महानस है । और दूसरा 'वैधर्म्य-दृष्टान्त' जैसे उसी
[ धूमवत्त्व हेतु ] का महाह्रद [ वैधर्म्य दृष्टान्त है ] ।
६ सिद्धान्त
दृष्टान्त के बाद छठा पदार्थ सिद्धान्त है । अतएव दृष्टान्त के बाद सिद्धान्त
का निरूपण करते हैं ।
प्रामाणिक रूप से स्वीकार किया जाने वाला अर्थ 'सिद्धान्त' [ कहलाता ]
है । वह चार प्रकार का [ होता ] है । १ 'सर्वतन्त्र' [ सिद्धान्त ], २ 'प्रतितन्त्र'
[ सिद्धान्त ], ३ 'अधिकरण' [ सिद्धान्त ], और ४ 'अभ्युपगम सिद्धान्त' भेद से ।
उनमें से—सर्वतन्त्र सिद्धान्त [ सर्वतन्त्र में तन्त्र शब्द का अर्थ 'शास्त्र' है । जो
सिद्धान्त सब शास्त्रों में माना जाय उसको 'सर्वतन्त्र-सिद्धान्त' कहते हैं ] जैसे धर्मी
मात्र [ घट पट आदि ] की सत्ता [ मानना ] । दूसरा [ 'प्रतितन्त्र सिद्धान्त'
उसको कहते हैं जो किसी विशेष शास्त्र में और उसके अपने समानतन्त्र में माना
जाय अन्य शास्त्रों में न माना जाय] जैसे नैयायिक के मत में मन का इन्द्रियत्व ।
वह [ उस न्याय के ] समानतन्त्र वैशेषिक में प्रसिद्ध है । तीसरा [ अधिकरण
सिद्धान्त वह कहलाता है जो अधिकरणभूत अर्थात् आधार भूत ऐसी बात का
प्रतिपादन करता है जिसकी सिद्धि हो जाने पर अन्य अनेक बातें स्वयं सिद्ध हो
जाती हैं । ] जैसे पृथिवी आदि के कर्ता [ईश्वर] की सिद्धि हो जाने पर उस कर्ता
की सर्वज्ञता [ स्वयं सिद्ध हो जाती है । क्योंकि पृथिवी आदि की रचना सर्वज्ञ,
सर्वशक्तिमान् के अतिरिक्त कोई नहीं कर सकता है ] ।
चौथा [ अभ्युपगम-सिद्धान्त वह कहलाता है जब अपना अभिमत न होने
अवयवाः ] अवयवनिरूपणम् २३६
७ अवयवाः
अनुमानवाक्यस्यैकदेशा अवयवाः । ते च प्रतिज्ञादयः पञ्च । तथा
च न्यायसूत्रम्—
‘प्रतिज्ञाहेतूदाहरणोपनयनिगमनान्यवयवाः’ ।
तत्र साध्यधर्मविशिष्टपक्षप्रतिपादकं वचनं प्रतिज्ञा, यथा पर्वतोऽयं
वह्निमानिति । तृतीयान्तं पञ्चम्यन्तं वा लिङ्गप्रतिपादकं वचनं हेतुः । यथा
धूमवत्त्वेन धूमवत्त्वादिति वा । सव्याप्तिकं दृष्टान्तवचनमुदाहरणम् । यथा
पर अर्थ की विशेष परीक्षा के लिए थोड़ी देर को स्वीकार कर लिया जाय ] जैसे
मीमांसक [ शब्द को द्रव्य मानते हैं और नित्य मानते हैं। नैयायिक शब्द को
गुण और अनित्य मानते हैं । ऐसी दशा में शब्द की ] नित्यता या अनित्यता का
विशेष विचार हो सके इसलिए [ थोड़ी देर के लिए ] मान लो कि शब्द गुण है ।
[ इसको, 'अभ्युपगम-सिद्धान्त' कहते हैं । ]
इस 'अभ्युपगम-सिद्धान्त' का प्रयोग अर्थ की विशेष परीक्षा के लिए तो
किया ही जाता है । उसके अतिरिक्त अपनी बुद्धि के अतिशय के प्रदर्शन
तथा दूसरे प्रतिवादी की बुद्धि की हीनता दिखलाने के लिए भी किया जाता है ।
७ अवयव
सिद्धान्त के निरूपण के बाद न्याय के सप्तम पदार्थ अवयव का निरूपण
क्रम-प्राप्त है । अतएव उसका निरूपण प्रारम्भ करते हैं ।
अनुमान 'वाक्य के एकदेश' अवयव [ कहलाते ] हैं । वह प्रतिज्ञा आदि
पाँच हैं । जैसा कि न्यायसूत्र [ में कहा ] है—
१ प्रतिज्ञा, २ हेतु, ३ उदाहरण, ४ उपनय, और ५ निगमन अवयव हैं ।
१ उनमें से साध्य-धर्म-युक्त 'पक्ष' का प्रतिपादन करने वाला वचन 'प्रतिज्ञा'
[ कहलाता ] है । जैसे यह 'पर्वत वह्नियुक्त है' । [ इसमें पर्वत 'पक्ष' है, वह्नि
'साध्य' है । 'वह्निमान् पर्वतः' इस रूप में साध्य-धर्म-विशिष्ट 'पक्ष' का
प्रतिपादक वचन होने से यह प्रतिज्ञा है ] ।
२ तृतीयान्त अथवा पञ्चम्यन्त लिङ्ग का प्रतिपादक वचन 'हेतु' है । जैसे
'धूमवत्त्वेन' अथवा 'धूमवत्त्वात्' ।
३ व्याप्ति सहित दृष्टान्त का कथन 'उदाहरण' है । जैसे 'जो जो धूमयुक्त
होता है वह अग्नि युक्त होता है, जैसे महानस' [ रसोई घर ] ।
१ न्या० सू० १, १, ३२
२४० तर्कभाषा [ अवयवाः
यो यो धूमवान् सोऽग्निमान् यथा महानस इति । पक्षे लिङ्गोपसंहार-
वचनमुपनयः । यथा वह्निव्याप्यधूमवांश्चायमिति, तथा चायमिति वा ।
पक्षे साध्योपसंहारवचनं निगमनम् । यथा तस्मादग्निमान् इति, तस्मात्त-
थेति वा । एते च प्रतिज्ञादयः पञ्चानुमानवाक्यस्यावयवा इवावयवा, न
तु समवायिकारणं, शब्दस्याकाशसमवेतत्वादिति ।
४ पक्ष [ पर्वत आदि ] में लिङ्ग का उपसंहार कथन करना 'उपनय'
[ कहलाता ] है । जैसे और 'यह [ पर्वत ] वह्नि के व्याप्य धूम से युक्त है' ।
अथवा और 'यह [ पर्वत ] वैसा [ महानस के समान धूमवान् ] है' ।
५ पक्ष [ पर्वत ] में साध्य [ वह्नि ] का उपसंहार कथन करना 'निगमन'
है । जैसे, 'इसलिए [ पर्वत ] अग्निमान् है' । अथवा 'इसलिए [ पर्वत ] वैसा
[ अग्निमान् ] है ।'
यह प्रतिज्ञा आदि पांच अनुमान-वाक्य के अवयव के समान [ होने से
गौण रूप से ] अवयव [ कहलाते ] हैं, 'समवायिकारण' नहीं हैं । शब्द [ रूप
अनुमान वाक्य ] के आकाश में समवेत होने से [ आकाश ही उसका समवायि-
कारण है । प्रतिज्ञादि नहीं ] । [ वास्तव में तो अवयव और अवयवी का
समवाय संबन्ध बताया जा चुका है और अवयव अवयवी के 'समवायि-
कारण' होते हैं । जैसे तन्तु पट के 'समवायिकारण' हैं । यहां प्रतिज्ञा आदि
अनुमान वाक्य के इस प्रकार के अवयव नहीं हैं जिससे उनको अनुमान वाक्य
का 'समवायिकारण' कहा जा सके । क्योंकि वाक्य तो शब्द रूप है और
शब्द का 'समवायिकारण' आकाश ही है । इसलिये शब्दरूप अनुमान वाक्य का
'समवायिकारण' आकाश ही होगा । प्रतिज्ञादि अवयव नहीं ] ।
पांच तथा तीन अवयवों का प्रयोग—
न्याय और वैशेषिक दोनों में परार्थ अनुमान वाक्य के पांच अवयव माने
गए हैं परन्तु वैशेषिक दर्शन में उनके नाम १ प्रतिज्ञा, २ अपदेश, ३ निदर्शन,
४ अनुसन्धान और ५ प्रत्याम्नाय रखे गये हैं । अन्य दर्शनों में अवयवों के
प्रयोग के सम्बन्ध में मतभेद पाया जाता है ।
१ बौद्ध दार्शनिक केवल एक हेतु को, अथवा अधिक से अधिक हेतु और
दृष्टान्तै दो का ही प्रयोग आवश्यक मानते हैं ।
२ जैन दार्शनिकों ने अधिकारी भेद से अवयवों की संख्या का भेद निर्धारित
१ प्रमाणवार्तिक १, २८ ।
२ प्रमाणवार्तिक १, २८ ।
अवयवसंख्याभेदः ] अवयवनिरूपणम् २४१
किया है। वादिदेव नामक जैन आचार्य ने विशिष्ट अधिकारी के लिए केवल
एक हेतु का प्रयोग ही पर्याप्त माना है¹। दूसरे प्रकार के अधिकारी के लिए
प्रतिज्ञा तथा हेतु दो अवयवों का प्रयोग पर्याप्त माना है। इन दोनों अवयवों के
विषय में जैन और बौद्ध परम्परा समान है। परन्तु जैनों ने अन्य प्रकार के
अधिकारियों के लिए तीन, चार और पांच अवयवों का प्रयोग भी माना है।
३ सांख्य कारिका की माठर वृत्ति के अनुसार सांख्य में प्रतिज्ञा, हेतु
और उदाहरण इन तीन अवयवों का ही प्रयोग माना गया है।
४ शालिकनाथ मीमांसक प्रभाकर के अनुयायी हैं। उन्होंने अपनी
'प्रकरण पञ्चिका' में³ और कुमारिलभट्ट के अनुयायी पार्थसारथिमिश्र ने
'श्लोक-वार्तिक' की टीका⁴ में मीमांसक सम्मत तीन अवयवों का ही वर्णन
किया है। जैन आचार्य हेमचन्द्र तथा अनन्तवीर्य ने मीमांसकों के चार
अवयव मानने का उल्लेख किया है। वह यथार्थ नहीं है। क्योंकि मीमांसकों के
दोनों सम्प्रदाय तीन अवयव ही मानते हैं। उन तीन अवयवों के भी दो
प्रकार हो सकते हैं।
'उदाहरणपर्यन्तं यद्बोदाहरणादिकम् ।'
अर्थात् तीन अवयव या तो उदाहरण पर्यन्त हो सकते हैं अथवा उदा-
हरणादिक तीन हो सकते हैं। उदाहरण पर्यन्त तीन का अर्थ प्रतिज्ञा, हेतु
तथा उदाहरण यह तीन होगा। और उदाहरणादिक तीन का अर्थ उदाहरण,
उपनय, निगमन यह तीन होगा।
पश्चिमी तर्क में अवयवों का प्रयोग—
पश्चिमी तर्क के प्रवर्तक अरस्तू ने भी इसी प्रकार अनुमान वाक्य के तीन
अवयव माने हैं और उनका विभाजन 'उदाहरण पर्यन्त' और 'उदाहरणादि'
इन दो प्रक्रियाओं से किया है। उसके अनुसार परार्थानुमान में उदाहरण
पर्यन्त अर्थात् प्रतिज्ञा, हेतु, उदाहरण इन तीन अवयवों का प्रयोग होता है।
और स्वार्थानुमान में उदाहरणादिक अर्थात् उदाहरण, उपनय और निगमन
इन तीन अवयवों का प्रयोग होता है। स्वार्थानुमान में प्रयुक्त होने वाले
उदाहरणादिक अवयव प्रयोग को पश्चिमी तर्क में 'सिन्थैटिक सिलाजिज्म' संयोजक
अनुमान कहा जाता है। और परार्थानुमान में प्रयुक्त होने वाले उदाहरण
१ स्याद्वाद २० पृ० ५४८ । २ स्याद्वाद २० पृ० ५६४ ।
३ प्रकरण पञ्चिका पृ० ८३, ८५ । ४ अनुमानश्लोक ।
१६ त० भा०
२४२ तर्कभाषा [ तर्कः
८ तर्कः
तर्कोऽनिष्टप्रसङ्गः । स च सिद्धव्याप्तिकयोर्धर्मयोर्व्याप्याङ्गीकारेण
अनिष्टव्यापकप्रसञ्जनरूपः । यथा 'यद्यत्र घटोऽभविष्यत् तर्हि भूतुल-
मिवादृक्ष्यत्' इति ।
स चायं तर्कः प्रमाणानामनुग्राहकः । तथाहि 'पर्वतोऽयं साग्निः
पर्यन्त अवयव प्रयोग को 'अनेलैटिक सिलाजिज्म' विश्लेषक-अनुमान कहा जाता
है । इनमें से 'सिन्थेटिक सिलाजिज्म' का स्वरूप इस प्रकार बनता है—
१ उदाहरण । जहां जहां धूम होता है वहां वहां अग्नि होती है जैसे
महानस में—
२ उपनय । यह पर्वत धूमवान् है ।
३ निगमन । इसलिए यह [ पर्वत ] वह्निमान् है ।
इसमें उदाहरण को 'मेजर प्रेमेसिस', उपनय को 'माइनर प्रेमेसिस',
और निगमन को 'कन्क्ल्यूज़न' कहा जाता है । परार्थानुमान में प्रयुक्त होने
वाले 'अनेलैटिक सिलाजिज्म' में प्रतिज्ञा को 'कन्क्ल्यूज़न', हेतु को 'माइनर
प्रेमेसिस' और उदाहरण को 'मेजर प्रेमेसिस' कहा जाता है। उस विश्लेषक
अनुमान का स्वरूप इस प्रकार होगा—
१ प्रतिज्ञा [ कन्क्ल्यूज़न ] यह पर्वत वह्निमान् है ।
२ हेतु [ माइनर प्रेमेसिस ] क्योंकि वह धूमवान् है ।
३ उदाहरण [ मेजर प्रेमेसिस ] और जहां जहां धूम होता है वहां वहां
वह्नि होती है जैसे महानस में ।
८ तर्क
अवयवों के निरूपण के बाद क्रमप्राप्त 'तर्क' का निरूपण प्रारम्भ करते हैं ।
तर्क अनिष्ट प्रसङ्ग [ को कहा जाता ] है। और वह दो व्याप्ति युक्त धर्मों
में से व्याप्य के स्वीकार करने से अनिष्ट व्यापक की प्रसक्ति रूप है । जैसे 'यदि
यहां घड़ा होता तो दिखलाई देता' । [ यहां 'जो होता है सो दिखलाई देता है'
यह व्याप्ति है। इसमें होना व्याप्य है दिखलाई देना व्यापक है । 'यदि यहां घड़ा
होता' इस व्याप्य को स्वीकार करके, 'तो दिखलाई देता' इस अनिष्ट की प्रसक्ति
करना तर्क है । जहां घड़ा दिखलाई नहीं देता है वहां उसकी प्रसक्ति ही अनिष्ट
प्रसञ्जन रूप है ]।
यह तर्क [ स्वयं प्रमाण नहीं है किन्तु ] प्रमाणों का अनुग्राहक [ समर्थक ]
है । जैसे कि 'यह पर्वत अग्नि युक्त है अथवा अग्नि रहित' इस सन्देह के बाद
निर्णयः ] निर्णयनिरूपणम् २४३
उतानग्निः' इति सन्देहानन्तरं यदि कश्चिन्मन्येतानग्निरयमिति तदा
तं प्रति 'यद्ययमनग्निरभविष्यत् तदानग्नित्वादधूमोऽप्यभविष्यत्' इत्य-
धूमत्वप्रसञ्जनं क्रियते । स एष प्रसङ्गस्तर्क इत्युच्यते । अयं चानुमानस्य
विषयशोधकः । प्रवर्त्तमानस्य धूमवत्त्वलिङ्गकानुमानस्य विषयमग्निमनु-
जानाति। अनग्निमत्त्वस्य प्रतिक्षेपात्। अतोऽनुमानस्य भवत्यनुग्राहक इति।
अत्र कश्चिदाह, 'तर्कः संशय एवान्तर्भवति' इति । तन्न । एककोटि-
निश्चितविषयत्वात् तर्कस्य ।
९ निर्णयः
निर्णयोऽवधारणज्ञानम् । तच्च प्रमाणानां फलम् ।
१० वादः
तत्त्वबुभुत्सोः कथा वादः । स चाष्टनिग्रहाणामधिकरणम् । ते च
यदि कोई यह कहे कि 'यह अग्नि रहित होता है' तो 'अग्नि रहित होने से धूम
रहित भी होना चाहिए' इस प्रकार [धूमवान् दिखलाई देने वाले पर्वत में अनिष्ट]
अधूमवत्त्व [ धूम राहित्य ] की प्रसक्ति की जाती है । यह [ अनिष्ट ] प्रसङ्ग
'तर्क' कहा जाता है । और यह अनुमान का विषय शोधक होता है । प्रवर्त्तमान
धूमवत्त्व लिङ्गक अनुमान के विषय [ साध्य ] अग्नि का अनुमोदन करता है ।
अनग्निमत्त्व का निषेध करके । इस लिए अनुमान का अनुग्राहक होता है ।
यहां [ तर्क के विषय में ] कोई कहता है कि 'तर्क संशय के ही अन्तर्गत
हो जाता है' । वह ठीक नहीं है । तर्क के एक कोटि में निश्चित रूप होने से
[ संशय उभयकोटिक ज्ञान होता है । 'स्थाणुर्वा पुरुषो वा' इस संशय के उदाहरण
में किसी एक कोटि में निश्चय नहीं है परन्तु तर्क एक कोटि में निश्चित है इसलिए
वह संशय के अन्तर्गत नहीं हो सकता है ]
जैन परम्परा में अकलङ्क ने परोक्ष प्रमाण के एक भेद के रूप में 'तर्क'
को भी एक प्रमाण माना है। मीमांसा में 'तर्क' के लिए 'ऊह' शब्द का प्रयोग
हुआ है । त्रिविधश्च ऊहः । मंत्र-साम-संस्कार-विषयः । परन्तु न्याय और बौद्ध
दोनों परम्पराओं में 'तर्क' को प्रमाण रूप नहीं अपितु प्रमाणों का 'अनुग्राहक'
ही माना है। मीमांसा में भी यही स्थिति समझनी चाहिए ।
९ निर्णय
'निर्णय' निश्चयात्मक ज्ञान [ कहलाता ] है और वह प्रमाणों का फल
[ होता ] है ।
१० वाद
तत्त्वज्ञान के इच्छुकों [ वादी प्रतिवादी ] की कथा 'वाद' [ कहलाती ] है ।
२४४ तर्कभाषा [ कथाभेदाः
न्यून-अधिक-अपसिद्धान्ताः, हेत्वाभासपञ्चकञ्च, इत्यष्टौ निग्रहाः ।
११ जल्पः
उभयसाधनवती विजिगीषुकथा जल्पः । सा च यथासम्भवं सर्वनिग्र-
हाणामधिकरणम् । परपक्षे दूषिते स्वपक्षस्थापनप्रयोगावसानश्च ।
१२ वितण्डा
स एव स्वपक्षस्थापनाहीनो वितण्डा । सा च परपक्षदूषणमात्रपर्यव-
साना । नास्य वैतण्डिकस्य स्थाप्यः पक्षोऽस्ति ।
कथा तु नानावक्तृकपूर्वोत्तरपक्षप्रतिपादकवाक्यसन्दर्भः ।
और वह आठ निग्रहस्थानों का विषय है । वह [ आठ निग्रह स्थान जो वाद में
लागू हो सकते हैं, ये हैं ] १ न्यून, २ अधिक, ३ अपसिद्धान्त और पांच
हेत्वाभास । ये [ मिलकर ] आठ निग्रह [ स्थान, वाद में लागू होते ] हैं ।
११ जल्प
दोनों [ वादी प्रतिवादी, दोनों के द्वारा अपने अपने पक्ष ] के साधन से
युक्त विजयाभिलाषियों [ वादी प्रतिवादियों ] की कथा 'जल्प' [ कहलाती ] है ।
और वह यथासम्भव समस्त [ बाइस ] निग्रहस्थानों का अधिकरण है ।
और परपक्ष के खण्डन हो जाने पर अपने पक्ष के निणर्य में समाप्त होने वाली
[ कथा जल्प ] है ।
१२ वितण्डा
अपने पक्ष की स्थापना से रहित वह [ विजिगीषु कथारूप जल्प ] ही
'वितण्डा' [ कहलाता ] है । और वह केवल परपक्ष के दूषण में समाप्त होता
है । इस वैतण्डिक का [ अपना ] स्थापनीय [ कोई ] पक्ष नहीं होता है [ अर्थात्
वह किसी को अपना पक्ष कह कर स्थापित नहीं करता है केवल दूसरे के पक्ष
का खण्डन ही करना अपना प्रयोजन मानता है ] ।
अनेक वक्ताओं से युक्त पूर्व पक्ष और उत्तरपक्ष का प्रतिपादक वाक्यसमूह
कथा [ कहलाता ] है ।
कथा भेदों का तुलनात्मक विवेचन—
अनेक वक्ता मिल कर किसी तत्त्व के निर्णय अथवा जय पराजय के लिए
पूर्वोत्तर पक्ष के रूप में जो चर्चा या वार्तालाप करते हैं उसको 'कथा' कहते हैं ।
उसके तीन भेद हैं १ वाद, २ जल्प और ३ वितण्डा । इनमें से तत्त्वज्ञान की
इच्छा से गुरु या सब्रह्मचारी आदि के साथ जो 'कथा' होती है उसको 'वाद'
कथाभेदाः ] कथाभेदनिरूपणम् २४५
कहते हैं। अपने पाण्डित्य आदि के द्योतन के लिए दो प्रतिद्वन्द्वी पण्डितों
आदि में जो 'कथा' होती है उस के 'जल्प' और 'वितण्डा' दो भेद हैं। यदि
वह दोनों वादी और प्रतिवादी अपने अपने पक्ष की स्थापना और दूसरे का
खण्डन करते हैं तो उस 'कथा' को 'जल्प' कहते हैं। और जहां एक वादी तो
अपने पक्ष की स्थापना करता है परन्तु दूसरा प्रतिवादी अपने पक्ष की
स्थापना नहीं करता केवल पहिले का खण्डन मात्र करता है उसको वितण्डा
कहते हैं। इस प्रकार न्याय शास्त्र में कथा के तीन भेद माने गए हैं।
आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ 'चरक' में भी इन त्रिविध कथाओं की चर्चा की
गई है। परन्तु वहां उनके वर्णन की शैली में कुछ भेद है। 'चरक' ने 'कथा'
के स्थान पर 'सम्भाषा' शब्द का प्रयोग किया है और उस 'सम्भाषा' के प्रथम
दो भेद किए हैं एक 'सन्धाय-सम्भाषा' और दूसरा 'विगृह्य-सम्भाषा'। इनमें
से 'सन्धाय सम्भाषा' न्याय की 'वाद' कथा के स्थान पर है। और दूसरे
'विगृह्य सम्भाषा' के फिर 'जल्प' और 'वितण्डा' यह दो भेद किए गए हैं।
इस प्रकार चरक का 'विगृह्य-सम्भाषा' और न्याय का 'विजिगीषु-कथा' शब्द
समानार्थक हैं। इसीलिए न्याय दर्शन के वात्स्यायन भाष्य में 'विगृह्येति
विजिगीषया' और न्याय सूत्र में 'ताभ्यां विगृह्य कथनम्' में भी 'विगृह्य'
शब्दों का प्रयोग किया गया है।
जैन परम्परा में 'कथा' का केवल एक ही भेद माना है 'वाद'। उन्होंने
'जल्प' और 'वितण्डा' को 'कथा' नहीं अपि तु 'कथाभास' माना है। इस
विषय को उनके 'कथात्रयभङ्ग' नामक ग्रन्थ में विस्तार पूर्वक वर्णन किया
गया है। न्याय परम्परा में विजिगीषु 'छल' और असदुत्तर रूप 'जाति' का
प्रयोग कर के भी अपने प्रतिवादी को पराजित कर सकता है परन्तु जैन
आचार्यों ने कथा में 'छल' आदि के प्रयोग का सर्वथा निषेध किया है। इस-
लिए उनके मतानुसार 'विजिगीषु' भी लगभग 'तत्त्वबुभुत्सु' के समकक्ष ही है।
प्रारम्भ में बौद्ध भी कथा के तीन ही प्रकार के भेद मानते थे परन्तु अन्त में
जैनों के समान वह भी कथा का एक ही भेद मानने लगे।
कथा के 'वाद' 'जल्प' 'वितण्डा' रूप तीनों भेदों के निरूपण के बाद,
क्रम प्राप्त होने से हेत्वाभास का दोबारा वर्णन प्रारम्भ करते हैं। यद्यपि पहिले
अनुमान के प्रकरण में भी हेत्वाभासों का वर्णन किया जा चुका है परन्तु यहां
क्रम प्राप्त होने से उनका दोबारा वर्णन किया जा रहा है। यह हेत्वाभासों का
दोबारा वर्णन तो अवश्य है परन्तु वह केवल पुनरुक्ति-मात्र नहीं है। अपितु
उस में कुछ विशेष ज्ञातव्य नई बातें भी यहां दी गई हैं।