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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 294, कुल 330 में से

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पृष्ठ 294

ख्यातिपञ्चकम् ] प्रमेयनिरूपणम् २२६
नहीं है और शून्य ही सब रूपों में भासता है इसलिए भ्रमस्थल में भी शून्य
का ही भान होता है । यह 'असत्ख्याति' का अभिप्राय है।
तीसरा 'अख्याति' पक्ष मीमांसकों में प्रभाकर-सम्प्रदाय का है। 'अख्याति'
का अर्थ 'ज्ञान का अभाव' अर्थात् 'भेदाग्रह' है। प्रभाकर का मत यह है कि
'अतस्मिंस्तत्प्रतीति' 'अतद्रूपप्रतिष्ठ-ज्ञान' अथवा 'तदभाववति तत्प्रकारकं ज्ञानं
भ्रमः' आदि भ्रम के जो लक्षण किए गए हैं उस प्रकार का भ्रमरूप ज्ञान होता ही
नहीं है। जिसको दूसरे लोग 'भ्रम' कहते हैं उसका विश्लेषण कर, प्रभाकर
यह कहते हैं कि यहाँ भ्रम का कोई अवसर नहीं है। जैसे शुक्ति में रजत की
प्रतीति को भ्रम कहा जाता है। यहां तर्कभाषाकार ने भी 'अतस्मिंस्तत्' रूप
भ्रम-ज्ञान का उदाहरण यही दिया है। प्रभाकर का कहना है कि यह
वस्तुतः एक ज्ञान नहीं है अपितु इसमें 'इदम्' और 'रजतम्' यह दो ज्ञान अलग
अलग हैं। 'इदम्' अंश का ज्ञान इन्द्रिय और अर्थ के सन्निकर्ष से उत्पन्न
'प्रत्यक्ष' ज्ञान होता है और वह यथार्थ ज्ञान है। 'रजतम्' इस अंश की 'स्मृति'
होती है। वह भी यथार्थ है। इस प्रकार 'इदम्' अंश जो प्रत्यक्ष अनुभवात्मक
है वह इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्य होने से यथार्थ है। और 'रजतम्' यह अंश
संस्कारजन्य और स्मरणात्मक है, वह भी यथार्थ है। इसलिए दोनों अंशों में
से कहीं भी भ्रम नहीं है।
तब प्रश्न यह होता है कि शुक्ति को भ्रम से रजत समझ कर मनुष्य उसको उठाने
में क्यों प्रवृत्त हो जाता है इसका उत्तर यह है कि इन दोनों ज्ञानों के भेद का
ग्रहण उसको नहीं रहता है। उस समय उस व्यक्ति को यह ज्ञान नहीं रहता है कि
मुझे जो 'इदं रजतम्' ज्ञान हो रहा है उसमें से 'इदम्' अंश तो 'अनुभवात्मक'
प्रत्यक्ष है और 'रजतम्' अंश 'स्मरणात्मक' है। अनुभव और स्मरणरूप द्विविध
ज्ञान के भेद का ग्रहण न होने से ही मनुष्य उस सीप को उठाने में प्रवृत्त
हो जाता है। इसलिए इस व्यवहार का कारण 'भेदाग्रह' है। इसी 'भेदाग्रह'
को 'अख्याति', भेद की अख्याति, अर्थात् भेद का ज्ञान न होना कहते हैं।
इसी को 'अख्यातिवाद' कहते हैं। और वह प्रभाकर का सिद्धान्त है।
चौथा 'अनिर्वचनीय ख्याति' वाला पक्ष वेदान्तियों का है। उपनिषद् में
स्वप्न-वर्णन के प्रसङ्ग में आया है, 'तत्र न रथाः, न रथयोगाः, अथ रथान्
रथयोगान् पथः सृजते' । अर्थात् वहाँ न रथ होते हैं और न रथयुक्त मार्ग
आदि, परन्तु स्वप्नद्रष्टा रथों और रथयुक्त मार्गों की सृष्टि कर लेता है।
इस उपनिषद्वाक्य में 'सृजते' शब्द का प्रयोग होता है इससे सिद्ध होता है कि