तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२४२ तर्कभाषा [ फलादयः
१० फलम्
फलं पुनर्भोगः सुखदुःखान्यतरसाक्षात्कारः ।
११ दुःखम्
पीडा दुःखम् । तच्चोक्तमेव ।
१२ अपवर्गः
मोक्षोऽपवर्गः । स चैकविंशतिप्रभेदभिन्नस्य दुःखस्यात्यन्तिकी निवृत्तिः।
एकविंशतिभेदास्तु शरीरं, षडिन्द्रियाणि, षड् विषयाः, षड् बुद्धयः,
सुखं दुःखञ्चेति गौणमुख्यभेदात् । सुखं तु दुःखमेव दुःखानुषङ्गि-
त्वात् । अनुषङ्गोऽविनाभावः । स चायमुपचारो मधुनि विषसंयुक्ते
मधुनोऽपि विषपक्षनिक्षेपवत् ।
स पुनरपवर्गः कथं भवति ?
उच्यते । शास्त्राद् विदितसमस्तपदार्थतत्त्वस्य, विषयदोषदर्शन-
विरक्तस्य मुमुक्षोर्ध्यायिनो ध्यानपरिपाकवशात् साक्षात्कृतात्मनः क्लेश-
आत्मा तो नित्य है वह कभी उत्पन्न नहीं होता है। देह इन्द्रिय आदि के साथ
आत्मा के पुनः सम्बन्ध का नाम ही प्रेत्यभाव या पुनर्जन्म है ] ।
सुख या दुःख में से किसी के अनुभव रूप भोग को 'फल' कहते हैं।
पीड़ा को 'दुःख' कहते हैं उसका वर्णन हो ही चुका ।
मोक्ष को 'अपवर्ग' कहते हैं। और वह [ मोक्ष ] इक्कीस प्रकार के दुःखों
की अत्यन्त निवृत्ति है [ दुःखों के ] इक्कीस भेद तो [ इस प्रकार हैं ] शरीर,
छः इन्द्रियाँ, छः विषय, छः ज्ञान, और सुख तथा दुःख । यह गौण और मुख्य
भेद से [ इक्कीस प्रकार के दुःख हैं, जिससे छूटने का नाम 'अपवर्ग' या मोक्ष
है ] । दुःख से मिश्रित होने के कारण [ लौकिक ] सुख भी दुःख ही है ।
अनुषङ्ग [ का अर्थ ] 'अविनाभाव' है। मधु के विष संयुक्त होने पर [मधु को भी]
विष समझे जाने के समान [ लौकिक सुख को दुःख से अविनाभूत, मिश्रित, होने
से दुःख समझने का ] उपचार [ गौणव्यवहार ] है ।
[ प्रश्न ] वह 'अपवर्ग' कैसे प्राप्त होता है ?
[ उत्तर ] कहते हैं । [ सबसे पहिले ] शास्त्रों [ के अध्ययन ] से समस्त
पदार्थों का तत्त्व ज्ञान प्राप्त करके विषयों के दोषों को देखने से [ लौकिक
विषयों के प्रति ] विरक्त, [ हुए अतएव ] मोक्ष की इच्छा करने वाले [ और
उसकी प्राप्ति के लिए योग शास्त्र में वर्णित प्रकार से ] ध्यान करने वाले मुमुक्षु
साधक के ध्यान के परिपक्व होने से आत्मसाक्षात्कार करने वाले अतएव
[ आत्म ज्ञान हो जाने से अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष, अभिनिवेश रूप पांच ]