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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 291, कुल 330 में से

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पृष्ठ 291

२२६ तर्कभाषा [ विवर्तवादः
या 'विवर्त' कहते हैं। इस 'विवर्त' और 'परिणाम' का लक्षण इस प्रकार किया
गया है—
सतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विकार इत्युदीरितः ।
अतत्त्वतोऽन्यथा प्रथा विवर्त इत्युदाहृतः ॥
अर्थात् जहां तत्त्व-परिवर्तन सहित अन्यथा प्रतीति होती है उसको 'विकार'
कहते हैं। जैसे दही दूध का 'विकार' है। इसी को 'परिणाम' भी कहते हैं।
सांख्य दर्शन 'परिणामवाद' का प्रतिपादन करता है। और तत्त्व-परिवर्तन के
बिना होने वाली अन्यथा प्रतीति को 'विवर्त' कहते हैं। जैसे सर्प रज्जु का
'परिणाम' नहीं अपितु 'विवर्त' है। शाङ्कर वेदान्त 'विवर्तवाद' का संस्थापक
है। उसके मत में जगत् ब्रह्म का 'विवर्त' है। अर्थात् जगत् की प्रतीति ब्रह्म
में इसी प्रकार है जैसे रज्जु में सर्प की प्रतीति। इस प्रकार शाङ्कर मत में भी
जगत्, 'विज्ञान-वादी' बौद्धों के समान, स्वप्न-परिकल्पित वस्तुओं के तुल्य
भ्रममात्र है। उसका कोई वास्तविक अस्तित्व नहीं है। वास्तविक सत्य वस्तु
ब्रह्म ही है।
इस प्रकार बौद्धों के 'विज्ञानवाद' और शङ्कराचार्य के 'ब्रह्मवाद' में बहुत
कुछ समानता है। उनमें जो मुख्य अन्तर है वह यह है कि बौद्ध सबको क्षणिक
मानते हैं इसलिए उनका 'विज्ञान' भी 'क्षणिक विज्ञान' है। इसके विपरीत
'शाङ्कर वेदान्त' का 'ब्रह्म' नित्य पदार्थ है। इसलिए दोनों में भेद तो है परन्तु
फिर भी उनका बहुत सा स्वरूप मिलता-जुलता है इसलिए सांख्य-प्रवचन
भाष्य में, निम्न पुराण-वचन के आधार पर उस शाङ्कर 'मायावाद' को 'प्रच्छन्न
बौद्ध' कहा गया है—
मायावादमसच्छास्त्रं 'प्रच्छन्नं बौद्धमेव' च ।
मयैव कथितं देवि कलौ ब्राह्मणरूपिणा ॥
बौद्धों के 'विज्ञानवाद' में और शङ्कर के 'ब्रह्मवाद' में क्रमशः 'विज्ञान'
और 'ब्रह्म' से अतिरिक्त अर्थों का अस्तित्व नहीं माना जाता है। उसका खण्डन
करने के लिए ही ग्रन्थकार ने यहां इस प्रसङ्ग की अवतारणा की है। सिद्धान्त
पक्ष से इन दोनों मतों के खण्डन में जो युक्ति दी गई है वह केवल इतनी ही
है कि द्रव्य आदि पदार्थ प्रत्यक्ष-सिद्ध हैं अतएव उनका अपलाप नहीं किया जा
सकता है। अतः उनका अस्तित्व मानना अनिवार्य है।
'तर्कभाषा' प्रधानतः न्याय की शैली के आधार पर लिखी गई है
इसीलिए न्याय के प्रमाण, प्रमेय आदि षोडश पदार्थों का निरूपण चल रहा है।
प्रमेय बारह माने गये हैं। उनमें से १ आत्मा, २ शरीर, ३ इन्द्रिय, इन तीनों के