तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
पृष्ठ 295, कुल 330 में से
संदर्भ में पढ़ें२३० तर्कभाषा [ बुद्धिः
स्मरणमपि यथार्थमयथार्थञ्चेति द्विविधम् । तदुभयं जागरे । स्वप्ने
तु सर्वं ज्ञानं स्मरणमयथार्थञ्च । दोषवशेन तदिति स्थाने इदमित्युदयात् ।
सर्वञ्च ज्ञानं निराकारमेव न तु ज्ञानेऽर्थेन स्वस्याकारो जन्यते ।
साकारज्ञानवादनिराकरणात् । अत एवाकारेणार्थानुमानमपि निरस्तम् ।
उपनिषत्कार के मत में स्वप्न काल में 'प्रातिभासिक' रथ आदि उत्पन्न होते हैं।
उनकी स्थिति तथा प्रतीति केवल स्वप्न-काल में ही रहती है। जागने पर वह
स्वयं समाप्त हो जाते हैं। इसी प्रकार भ्रम के स्थल में भी 'प्रातिभासिक रजत'
की उत्पत्ति होती है। उस नवोत्पन्न 'प्रातिभासिक' रजत की स्थिति उतने ही काल
तक रहती है जितनी देर तक भ्रम की स्थिति है। इसीलिए उसको 'प्राति-
भासिक रजत' कहते हैं। यह 'प्रातिभासिक' रजत सत्य है यह नहीं कहा जा
सकता है क्योंकि आगे चल कर उसका बाध होता है। और उसको नितान्त
असत् भी नहीं कहा जा सकता है क्योंकि उसकी प्रतीति होती है। इसलिए यह
'प्रातिभासिक-रजत' 'सत्त्वेन' और 'असत्त्वेन' निर्वक्तुम् अशक्य होने से 'अनि-
र्वचनीय' रजत कहा जाता है। भ्रम-स्थल में 'अनिर्वचनीय' रजत आदि का
ही भान होता है। इसलिए शाङ्कर वेदान्त के इस सिद्धान्त को 'अनिर्वचनीय
ख्याति' नाम दिया गया है।
पञ्चम 'अन्यथा-ख्यातिवाद' नैयायिकों का पक्ष है। नैयायिकों का कहना
है कि शुक्ति-रजतस्थल में 'प्रातिभासिक रजत' की उत्पत्ति मानना उचित नहीं
है। दोष के प्रभाव से जैसे पाण्डुरोग के रोगी को 'पीतः शंखः' प्रतीति होने
लगती है इसी प्रकार दोषवश से हट्टस्थ अर्थात् बाजार में रखे हुए रजत की
प्रतीति शुक्ति में होने लगती है। इसी का नाम 'अन्यथा-ख्याति' है।
स्मरण भी दो प्रकार का होता है—१ यथार्थ और २ अयथार्थ। जाग्रत्
अवस्था में दोनों प्रकार का स्मरण होता है। और स्वप्न में तो सारा ज्ञान
स्मरणात्मक और अयथार्थ ही होता है। दोषवश से [ तत् ] वह के स्थान पर
यह [ इदम् ] प्रतीति होने से।
ज्ञान के आकार से अर्थों का अनुमान करके अर्थों को अनुमेय मानने
वाले बौद्धों के 'वैभाषिक' सम्प्रदाय का उल्लेख पीछे किया जा चुका है उनके
सिद्धान्त का निराकरण करने के लिए आगे का प्रकरण प्रारम्भ करते हैं—
और सारा ज्ञान निराकार ही होता है। अर्थ, ज्ञान में अपना [ कोई ]
आकार उत्पन्न नहीं करता है। साकार ज्ञानवाद का खण्डन हो जाने से [ अर्थात्
यदि ज्ञान का आकार माना जाय तो वह कोई नियत आकार नहीं बन सकता