तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१२८ तर्कभाषा [ बुद्धिनिरूपणम्
दर्शनाद् गवयशब्दवाच्यताज्ञानम् । 'ज्योतिष्टोमेन स्वर्गकामो यजेत'
इत्यादि वाक्याज्ज्योतिष्टोमस्य स्वर्गसाधनताज्ञानञ्च ।
अयथार्थस्तु अर्थव्यभिचारी, अप्रमाणजः । स त्रिविधः । संशय-
स्तर्को विपर्ययश्चेति, संशयतर्कौ वक्ष्येते ।
विपर्ययस्तु अतस्मिंस्तद्ग्रहः । भ्रम इति यावत् । यथा पुरोवर्तिन्य-
रजते शुक्तिकादौ रजतारेापः, 'इदं रजतम्' इति ।
प्रमाणजन्य यथार्थ अनुभव हुआ ] । ४ स्वर्ग की इच्छा रखने वाला ज्योतिष्टोम
याग करे, इस [ वेद ] वाक्य से ज्योतिष्टोम [ याग ] में स्वर्गसाधनता का ज्ञान
[ यह शब्द प्रमाणजन्य यथार्थ अनुभव हुआ ] ।
अयथार्थ [ अनुभव ] तो अर्थ का व्यभिचारी और अप्रमाण से उत्पन्न
होता है । वह तीन प्रकार है । १ संशय, २ तर्क और ३ विपर्यय । [ इनमें से ]
संशय और तर्क [ न्याय के षोडश पदार्थों में गिने हुए हैं अतएव आगे यथा-
स्थान ] कहे जावेंगे । [ विपर्यय को यहाँ कहते हैं ] अतत् में तत्
[ अरजत शुक्तिकादि में रजत ] की प्रतीति विपर्यय या भ्रम है । जैसे सामने
स्थित अरजत शुक्तिकादि में रजत का आरोप, कि यह रजत है । [भ्रम कहलाता है]।
ख्यातिपञ्चक—
भ्रमज्ञान अथवा विपर्यय ज्ञान का विश्लेषण कई दार्शनिक सम्प्रदायों
में भिन्न २ रीति से किया गया है । जिसके परिणामस्वरूप मुख्यतः 'पञ्च
ख्यातियां' प्रसिद्ध हैं ।
आत्मख्यातिरसतख्यातिरख्यातिः ख्यातिरन्यथा ।
तथानिर्वचनीयख्यातिरित्येतत् ख्यातिपञ्चकम् ॥
'ख्याति' शब्द का अर्थ ज्ञान है । भ्रमस्थल में किसका ज्ञान होता है
इसको लेकर इन पांच 'ख्यातियों' की स्थापना हुई है । इनमें से 'आत्म-
ख्याति' और 'असत्ख्याति' यह दो बौद्ध पक्ष हैं । 'आत्मख्याति' में आत्म
शब्द से 'विज्ञानवादी' बौद्धों के 'विज्ञानतत्त्व' का ग्रहण करना चाहिए। 'विज्ञान-
वाद' के अनुसार घट-पट आदि बाह्य विषयों का तो कोई अस्तित्व है ही
नहीं । केवल 'विज्ञान' ही इन सब रूपों में भासता है यह बात पहिले कह चुके
हैं । इसलिए भ्रमस्थल में स्वयं 'विज्ञान' ही भ्रान्त घट के रूप में भी भासता
है । यही 'आत्मख्याति' पक्ष का सार है । दूसरी 'असत् ख्याति' 'शून्यवादी'
माध्यमिक बौद्धों का अभिमत पक्ष है । उनके मत में 'विज्ञान' का भी अस्तित्व