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सर्वकोश
तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)

Tarkabhasha of Keshavamishra

आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा

DevanagariHindipublished330 पृष्ठ

पृष्ठ 292, कुल 330 में से

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पृष्ठ 292

बुद्धिनिरूपणम् ] प्रमेयनिरूपणम् २२७
५ बुद्धिः
बुद्धिरुपलब्धिर्ज्ञानं प्रत्यय इत्यादिभिः पर्यायशब्दैर्याऽभिधीयते सा
बुद्धिः । अर्थप्रकाशो वा बुद्धिः । सा च संक्षेपतो द्विविधा । अनुभवः
स्मरणं च । अनुभवोऽपि द्विविधो, यथार्थोऽयथार्थश्चेति ।
तत्र यथार्थोऽर्थाऽविसंवादी । स च प्रत्यक्षादिप्रमाणैर्जन्यते । यथा
चक्षुरादिभिरदुष्टैर्घटादिज्ञानम् । धूमलिङ्गकमग्निज्ञानम् । गोसादृश्य-
निरूपण के बाद चौथा पर्याय 'अर्थ' का आया । इस 'अर्थ' प्रमेय के अन्तर्गत
नवीन न्याय की शैली में वैशेषिकोक्त द्रव्य आदि छः पदार्थों का अन्तर्भाव कर
लिया गया है। वैसे न्याय-सूत्रकार ने अर्थ शब्द से वैशेषिकोक्त द्रव्य आदि षट्
पदार्थों का ग्रहण न करके रूपादि गुणों का ग्रहण किया है। जैसा कि—
गन्धरसरूपस्पर्शशब्दाः पृथिव्यादिगुणास्तदर्थाः ।
इस सूत्र से स्पष्ट है। परन्तु नवीन आचार्यों ने इसी 'अर्थ' प्रमेय के
अन्तर्गत वैशेषिक के द्रव्यादि षट् पदार्थों का ग्रहण कर उनका
निरूपण किया है। 'तर्कभाषा' ने भी इसी पद्धति का अवलम्बन कर यहाँ तक
वैशेषिकोक्त सब पदार्थों का वर्णन इस 'अर्थ' निरूपण-प्रसङ्ग में कर दिया है।
अब आगे क्रमप्राप्त पञ्चम प्रमेय 'बुद्धि' का निरूपण प्रारम्भ करते हैं। यद्यपि
वैशेषिक के गुणों के अन्तर्गत बुद्धि का संक्षिप्त वर्णन किया जा चुका है। परन्तु
न्याय में उसको अलग प्रमेय माना है अतएव आगे उसके क्रमप्राप्त होने
से उसका वर्णन करते हैं।
५. बुद्धि
बुद्धि, उपलब्धि, ज्ञान, प्रत्यय आदि पर्याय शब्दों से जिसको कहा जाता है
वह बुद्धि है। अथवा अर्थ के ज्ञान को बुद्धि कहते हैं। वह संक्षेप से दो प्रकार
की है [ एक ] अनुभव और [ दूसरी ] स्मरण । [ उनमें से ] अनुभव भी दो
प्रकार का होता है [ एक ] यथार्थ और [ दूसरा ] अयथार्थ ।
उसमें यथार्थ [ अनुभव ] अर्थ का अविसंवादी [ अर्थानुसारी ] होता है
और वह प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों से उत्पन्न होता है। जैसे १ दोषरहित चक्षु
आदि से घट आदि का ज्ञान [ यह प्रत्यक्ष यथार्थानुभव है ] । २ धूम आदि
[ शुद्ध ] लिङ्ग से अग्नि आदि का ज्ञान [ यह यथार्थ अनुमानरूप अनुभव हुआ ] ।
३ गो के सादृश्य को देखने से गवय शब्द से वाच्य होने का ज्ञान [ यह उपमान
१ न्यायदर्शन, १, १, १४ ।