तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमन आदयः ] प्रमेयनिरूपणम् २३१
प्रत्यक्षसिद्धत्वाद् घटादेः । सर्वं ज्ञानमर्थनिरूप्यं, अर्थप्रतिबद्धस्यैव तस्य
मनसा निरूपणात् । घटज्ञानवानहं, इत्येतावन्मात्रं गम्यते न तु 'ज्ञान-
वानहम्' इत्येतावन्मात्रं ज्ञायते ।
६ मनः
अन्तरिन्द्रियं मनः । तच्चोक्तमेव ।
७ प्रवृत्तिः
प्रवृत्तिः धर्माधर्ममयी यागादिक्रिया, तस्या जगद्व्यवहारसाधकत्वात् ।
८ दोषाः
दोषा राग-द्वेष-मोहाः ।
राग इच्छा ।
द्वेषो मन्युः, क्रोध इति यावत् ।
मोहो मिथ्याज्ञानं विपर्यय इति यावत् ।
६ प्रेत्यभावः
पुनरुत्पत्तिः प्रेत्यभावः । स चात्मनः पूर्वदेहनिवृत्तिः, अपूर्वदेह-
सङ्घातलाभः ।
है । ] इसलिए आकार से अर्थ का अनुमान भी खण्डित हो जाता है । घटादि
के प्रत्यक्ष सिद्ध होने से [ उनको अनुमेय मानने की कोई आवश्यकता भी नहीं
है ] । सारा ज्ञान अर्थ से निरूपित होता है । 'मैं घटज्ञानवान् हूँ' [ विषय
सहित ] यही प्रतीत होता है [ केवल विषय रहित ] 'ज्ञानवानहम्' केवल
इतना ही प्रतीत नहीं होता है । [अतः सारा ज्ञान अर्थ से ही निरूपित होता है]।
अन्तरिन्द्रिय [ का नाम ] 'मन' है । और वह कहा जा चुका है ।
धर्म अधर्म रूप यागादि क्रिया [ और उससे उत्पन्न धर्माधर्म ] प्रवृत्ति
[ कहलाते ] हैं । उस [ धर्माधर्म रूप प्रवृत्ति ] के जगत् के व्यवहार का
साधक होने से ।
राग द्वेष मोह [ यह तीनों ] 'दोष' हैं ।
'राग' इच्छा [ को कहते ] हैं ।
'द्वेष' मन्यु अर्थात् क्रोध [ को कहते हैं ] ।
'मोह' मिथ्या ज्ञान अर्थात् विपर्यय [ को कहते हैं ] ।
पुनर्जन्म प्रेत्यभाव [ प्रेत्य मर कर, भाव अर्थात् फिर उत्पन्न होना ] है ।
और वह [ पुनर्जन्म ] आत्मा के पूर्व शरीर की समाप्ति और नवीन शरीर आदि
समूह की प्राप्ति [ हो ] है [ अर्थात् पुनरुत्पत्ति नहीं समझनी चाहिए । क्योंकि