तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
[ २८ ]
चतुर्थश्चौपनिषदो धर्मः साधारणः स्मृतः ।
वानप्रस्थाद् गृहस्थाच्च ततोऽन्यः संप्रवर्तते ॥
अस्मिन्नेव युगे तात विप्रः सर्वार्थदर्शिभिः ।
मेधातिथिर्बुधः····································॥
एनं धर्मं कृतवन्तः ।
( महाभा० शा० प०, अ० २४३ श्लो० १४-१७ )
इन श्लोकों से हमारी दोनों धारणाओं की पुष्टि होती है । पहिली यह कि
मेधातिथि गोतम एक ही व्यक्ति हैं और दूसरी यह कि उन्होंने न्यायशास्त्र के
प्रमेय, साध्य या अध्यात्मप्रधान युग का निर्माण किया । कठोपनिषद् के—
शान्तसंकल्पः सुमना यथा स्याद् वीतमन्युर्गौतमो माभिमृत्योः ।
त्वत् प्रसृष्टं माभिवदेत् प्रतीत एतत् त्रयाणां प्रथमं वरं वृणे ॥
यथोदकं शुद्धे शुद्धमासिक्तं तादृगेव भवति ।
एवं मुनेर्विजानत आत्मा भवति गौतम ॥
हन्त त इदं प्रवक्ष्यामि गुह्यं ब्रह्म सनातनम् ।
यथा च मरणं प्राप्य आत्मा भवति गौतम ॥
( कठोपनि० १. १. १० । २. ४. १५ । २. ५. ६. )
इन उद्धरणों में जिन गौतम का उल्लेख पाया जाता है कदाचित् वे गौतम ही
न्यायशास्त्र के अध्यात्मप्रधान युग के निर्माता हैं । शुक्ल-यजुर्वेदीय-माध्यन्दिनीय
शाखा के शतपथ ब्राह्मण काण्ड १ अ० ४ में भी कदाचित् इन ही गौतम का वर्णन
है । इन्हीं के गोत्र में आगे चलकर गौतम बुद्ध उत्पन्न हुए हैं । श्री सतीशचन्द्र
विद्याभूषण का मत है कि शतपथ ब्राह्मण में गौतम के स्थान आदि का जो
विवरण पाया जाता है वह मिथिला के समीपवर्ती उपरिलिखित 'गौतम स्थान'
से बिल्कुल मिलता जुलता है । [ सन् १९१३ में श्री सतीश बाबू ने 'गौतम स्थान'
की यात्रा स्वयं की थी और उसके बाद ही यह सम्मति दी थी ] इस सम्बन्ध में
उनके शब्द इस प्रकार हैं—
‘His ( Nachikatas Gotam ) remote ancestor was perhaps the sage
Nodha Gotam descended from that Gotama who is described in the
Rigveda ( Mandal I sukt 62 verse 13, 1. 77. 5, 1. 85. 11 ) and Shata-
path Bramhana of the white yajurveda, as having settled in a Place
the description of which tallies with that of Gotama-sthana in Mithila’
( Indian logic, P. P. 19 )
फलतः बहुत प्राचीन काल में महर्षि गौतम ने आत्मविद्या के आचार्य के रूप
में न्यायशास्त्र को जन्म दिया था। उसके बाद कालान्तर में समय की आवश्यकता के
[ २६ ]
अनुरूप उस प्रमेय या आत्मप्रधान न्यायशास्त्र को प्रमाणप्रधान शास्त्र का स्वरूप
मिला। न्यायशास्त्र ने अपने इस नवीन रूप में भी अपना मुख्य ध्येय तो
आत्मज्ञान ही रखा, इसमें सन्देह नहीं, परन्तु ध्येय होते हुये न्यायशास्त्र प्रमाणों के
विस्तृत विवेचन में चला गया और उसके सामने आत्मा का विवेचन गौण पड़
गया है। न्यायशास्त्र के वर्तमान स्वरूप में प्रमाणों के विवेचन का ही प्राधान्य है।
इसका परिचय न केवल उत्तरवर्ती न्याय साहित्य से ही अपितु वात्स्यायन भाष्य
और मूलसूत्रों से भी भली-भाँति मिलता है। न्यायशास्त्र के प्रथम सूत्र—प्रमाण
प्रमेय-संशय-प्रयोजन-दृष्टान्त-सिद्धान्त-अवयव-तर्क-निर्णय-वाद-जल्प-वितण्डा-
हेत्वाभास-छल-जाति-निग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः' में जिन षोडश
पदार्थों के तत्त्वज्ञान को निःश्रेयस का साधन बताया है, उनमें भी सर्वप्रथम स्थान
प्रमाण का रखा है और आत्मा का साक्षात् स्थान भी नष्ट कर प्रमेयों के भीतर
उसकी गणना की है। इससे स्पष्ट प्रतीत होता है कि वर्तमान न्यायशास्त्र ने
प्रमाणादि को अत्यधिक प्रधानता दी है। और उसका समर्थन करते हुए वात्स्यायन
भाष्य में लिखा है—
‘तेषां पृथगभिधानमन्तरेण अध्यात्मविद्यामात्रमियं स्याद् यथोपनिषदः'
अस्तु । न्यायशास्त्र अपने ‘अध्यात्मप्रधान' स्वरूप को छोड़कर इस नवीन रूप
में कब से आया यह कह सकना और भी कठिन है। ‘गोल्डस्टकर'१ का विचार है कि
न्यायशास्त्र का परिज्ञान पाणिनि को था और उनके बाद चतुर्थ शताब्दी B. C. में
कात्यायन को भी इन न्यायसूत्रों का परिज्ञान था। अतएव इसके पूर्व न्यायशास्त्र को
यह नवीन रूप कदाचित् प्राप्त हो चुका था। और उसका नवीन रूप में संस्करण
करने का श्रेय कदाचित् श्री अक्षपाद को दिया जाना चाहिए।
क्या भारतीय न्याय पर यूनानी प्रभाव है ?—
इसी प्रसङ्ग में हम डा० सतीशचन्द्र विद्याभूषण की एक और अद्भुत कल्पना
का भी उल्लेख कर देना चाहते हैं। आपने अपने एक लेख में२ बड़े समारम्भ के
साथ यह सिद्ध करने का यत्न किया है कि भारतीय न्यायशास्त्र को वर्तमानरूप
देने में ग्रीक दर्शन का बहुत बड़ा हाथ है। विशेषतः अनुमान में ‘पञ्चावयव वाक्य’
की प्रक्रिया का विकास भारत में बहुत पीछे हुआ उसके बहुत पूर्व ग्रीक में
‘अरिस्टाटिल’ ने इस ‘पञ्चावयव वाक्य’ की प्रक्रिया को परिपूर्ण और सुव्यवस्थित
रूप में प्रस्तुत कर दियाथा। आपने अपने विषय का उपपादन इस प्रकार किया है—
But so far as the five limbed syllogism of Hindu Logic is concerned
the Hindu logician may have been indebted some way or other to the
Greeks. While the syllogism definitely formulated as a logical doctrine
१. Gold stucker's panini P. P. 157
२. जनरल आफ रायल एशियाटिक सोसाइटी आफ ग्रेट ब्रिटेन एण्ड आयलैण्ड ।
[ ३० ]
by Aristotle in its Rhetoric, Prior Analytics and Posteriar Analytics
in the 4th century B. C., the Hindu logician shows but a vague conception
of it, as late as the first century B. C. It is not inconceivable that the
Knowledge of Aristotle's logic found its way through Alexandria,
syria and other countries into Taxila. This is rightly Corroborated
by the Hindu tradition that Narada who visited Alexandria [ S'weta
dwbipa ] and became an expert in the handling of the five limbed
syllogism...
I am inclined, therefore, to think that the syllogism did not
actually evolve in Indian logic out of inference, and that the Hindu
logician owed the idea of syllogism to the influence of Aristotle'.
( Introduction to the Indian Logic P. P. XV )
श्रीसतीश बाबू की इस कल्पना में हमें कोई सार नहीं दिखाई देता । आप
कहते हैं कि पञ्चावयव अनुमान वाक्यपद्धति का पूर्ण विकास ग्रीक में तो अरिस्टा-
टिल के समय चतुर्थ शताब्दी B. C. में ही हो चुका था और भारत में प्रथम
शताब्दी B. C. तक भी वह परिमार्जितरूप में नहीं आ पाया था । जिस Syllogism
पञ्चावयववाक्य के विषय में प्रथम शताब्दी B. C. तक भारतीय दार्शनिकों के
अज्ञान की घोषणा करने का साहस आप करते हैं उसी Syllogism के विषय में
'गोल्डस्टकर' जैसे उच्च श्रेणी के पाश्चात्त्य विद्वानों का दृढ़ विश्वास है कि वह 'अरि-
स्टाटिल' से भी पूर्व पाणिनि के समय (500 B. C.) से भी पूर्व भारत में पूर्ण रूप
से विकसित हो चुका था । 'गोल्डस्टकर' महोदय ने अपनी सुप्रसिद्ध पुस्तक
Panini में लिखा है—
That Nyay was known to Panini in the sense of Syllogism or
logical reasoning or perhaps logical science, I Conclude from the sutra
III. 3. 122¹ where its affix conveys the sense of instrumentality i. e,
that by which analysis [lit. enlarging] is effected, for in the some form
Nyaya is made the subject of another rule III. 3. 37². Where Panini
gives as its meaning 'Propriety, good conduct' which would lead to its
later meaning 'Policy'. Unless we draw this distinction betwean the
two sutras named, the first sutra become superfluous, Nor is it probable
that a civilization like that which is traceable in Panini's rules could
have done without a word for Syllogistic thought. ( Panini P. P. 116 )
१. अध्यायन्यायोद्यावसंहाराश्च । अष्टाध्यायी ३. ३. १२२ ।
२. परिन्योर्नीणोर्ध्यू ताभ्रेषेभ्योः । अष्टा० ३. ३. ३७ । यथाप्राप्तकरणमभ्रेषः ।
[ ३१ ]
अष्टाध्यायी के जिन दो सूत्रों का उल्लेख 'गोल्डस्टकर' महोदय ने किया है
उसके अतिरिक्त अन्य स्थलों पर भी न्याय का उल्लेख पाणिनि की अष्टाध्यायी में
मिलता है। यही नहीं अपितु चतुर्थ अध्याय के द्वितीय पाद के 'क्रतूक्थादिसूत्रा-
न्ताट्ठक्' ४, २, ६० के सूत्रान्तर्गत उक्थादि गण के 'गणपाठ' में 'न्याय' शब्द का
पाठ कर पाणिनि ने 'नैयायिक' शब्द की सिद्धि की है। ठक् प्रत्यय का विधान
करने वाला यह सूत्र 'तदधीते तद्वेद' इस अर्थ में ठक् का विधान करता है, जिससे
'नैयायिक' शब्द का अर्थ 'न्यायमधीते नैयायिकः' होता है। इस प्रकार पाणिनि
की अष्टाध्यायी और गोल्डस्टकर महोदय का ऐतिहासिक विवेचन सतीश बाबू की
कल्पना की निस्सारता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है।
प्राचीन न्याय का साहित्य
जैसा कि ऊपर कहा जा चुका है न्यायशास्त्र का प्रारम्भ कब से हुआ यह निश्चित
रूप से कह सकना कठिन है। परन्तु फिर भी गोल्डस्टकर और उसके आधारभूत
पाणिनि-सूत्रों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि न्यायशास्त्र बहुत पुरानी
और सम्भवतः नहीं, निश्चित रूप में पाणिनि से पूर्व की चीज़ है। न्यायशास्त्र का सबसे
पुराना ग्रन्थ जो इस समय मिलता है वह न्यायसूत्र है। परन्तु यह नहीं कहा जा
सकता कि यह न्यायसूत्र ठीक इसी रूप में पाणिनि के पूर्व की चीज है। इस बात
के अनेक प्रमाण हैं कि न्यायसूत्रों के अनेक सूत्र अत्यन्त आधुनिककाल के हैं। जिन
सूत्रों में बौद्ध सिद्धान्तों का खण्डन हुआ है उनकी रचना बौद्धकाल के बाद की है
बौद्ध मत की आलोचना के प्रकरण में लिखे गए अनेक सूत्रों के शब्द-विन्यास से
यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि वह सूत्र बौद्ध ग्रन्थों के आधार पर लिखे गए हैं। दोनों
की, विषय के साथ आनुपूर्वी और शब्दविन्यास में भी कुछ समानता है।
उदाहरण के लिए हम ऐसे कुछ सूत्र नीचे उद्धृत करते हैं—
| माध्यमिक सूत्र | न्याय सूत्र |
| नसंभवः स्वभावस्य युक्तः प्रत्ययहेतुभिः। | न स्वभावसिद्धिरापेक्षिकत्वाद् । |
| स्वभावः कृतको नामभविष्यति पुनः कथम् | व्याहतत्वादयुक्तम् । |
| ( माध्यमिक सूत्र. अ. १५. पृ. ९३ ) | ( न्या. सू. अ. ४. १ ३९-४० ) |
| ( B. T. S. Edition, Calcutta ) | स्वप्नविषयाभिमानवदयं प्रमाणप्रमेया- |
| यथा माया यथा स्वप्नो गन्धर्वनगरं यथा । | भिमानः । ( ४. २. ३१ ) |
| तथोत्पादस्तथा स्थानंतथा भङ्ग उदाहृतम्॥ | माया-गन्धर्वनगर-मृगतृष्णिकावद्वा । |
| ( मा. सू. अ. ७. ) | ( ४. २. ३२. ) |
१. उक्थ, लोकायत, न्यास, न्याय, पुनरुक्त, निरुक्त, निमित्त, द्विपदा, ज्योतिष, अनुपद्,
अनुकल्प, यज्ञ, धर्म, चर्चा, क्रमेतर, श्लक्षण, संहिता, पदक्रम, संघट, वृत्ति, परिषद्,
संग्रह, गण [गुण], आयुर्वेद । इत्युक्थादिः ॥ ४,२,६० ॥ (गणपाठ, ४. २. ६०. पा.)
[ ३२ ]
उपर्युक्त सारी स्थिति से यही परिणाम निकलता है कि न्याय-सूत्रों की रचना
भी एक काल में नहीं हुई। सबसे पूर्व गोतम के अध्यात्मप्रधान न्यायसूत्र
की रचना हुई। उसके बाद अध्यात्मप्रधान उपनिषद्विद्या से अक्षपाद ने आन्वीक्षिकी
न्याय विद्या को पृथक् करने के लिए उसके प्रमेयप्रधान स्वरूप के स्थान पर
प्रमाणप्रधान स्वरूप देकर अक्षपाद ने उसका नवीन संस्करण किया¹ और बौद्ध
युग में उसमें कुछ प्रक्षेप और परिवर्धन होकर ही न्याय-शास्त्र को वर्तमान
स्वरूप प्राप्त हो सका है।
'न्याय-सूत्रों' के बाद न्याय-शास्त्र का दूसरा पुराना ग्रन्थ 'वात्स्यायन भाष्य'
है जिसका रचनाकाल ४०० वि० (जैकोबी के अनुसार ३००, अन्यों के अनुसार
४०० वि०) के लगभग निर्धारित किया गया है। ४०० वि० से लेकर १००० वि०
तक के ६०० वर्षों में न्याय-शास्त्र के जिस प्रचुर साहित्य का निर्माण हुआ उस
सारे न्याय साहित्य का आधार ग्रन्थ 'न्यायसूत्र' और 'वात्स्यायन भाष्य' हैं। अन्य
जो कुछ भी साहित्य तैयार हुआ वह सभी इन्हीं के समर्थन में और उन्हीं के
टीका-प्रटीका के रूप लिखा गया है। इसी लिए उस सबको 'प्राचीन न्याय' साहित्य
के नाम से कहा जाता है।
यद्यपि न्याय सूत्रों के बाद 'प्राचीन न्याय' के विषय में कोई मौलिक ग्रन्थ नहीं
लिखा गया फिर भी १७ वीं शताब्दी तक प्राचीन न्याय के साहित्य का निर्माण
होता रहा, जो न्याय-सूत्रों की टीका-प्रटीका के रूप में ही था। इसमें से भी ४००
से लेकर १००० वि० तक जिस साहित्य का निर्माण हुआ वह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
१—भाष्यकार वात्स्यायन [ ३०० वि० ]—
न्याय दर्शन के भाष्यकार वात्स्यायन कौन हैं यह भी एक विवादग्रस्त प्रश्न
है। 'अभिधानचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ में हेमचन्द्र [जैन] ने 'वात्स्यायन' के
अनेक नामों का निर्देश किया है, जो इस प्रकार है—
'वात्स्यायनो मल्लनागः कौटिल्यश्चणकात्मजः ।
द्रामिलः पक्षिलस्वामी, विष्णुगुप्तोऽङ्गुलश्च सः ॥'
इसके अनुसार वात्स्यायन, पक्षिलस्वामी, कौटिल्य और चाणक्य सब एक ही
व्यक्ति के नाम हैं और वह द्रविड़ देश का रहनेवाला प्रतीत होता है जिसकी
राजधानी काञ्चीपुर वर्तमान काञ्चीवरम् थी। इसीलिए उसके नामों में 'द्रामिल'
भी एक नाम है और 'पक्षिलस्वामी' नाम भी उसी देशवासी का नाम जान पड़ता
है। इसके अतिरिक्त न्यायदर्शन अध्याय २, अ० १ सूत्र ४० में वात्स्यायन ने उदा-
१. आयुर्वेद के प्रसिद्ध ग्रन्थ चरक की रचना भी इसी प्रकार हुई, प्रथम अग्निवेश ने
फिर चरक ने उसका नवीन संस्करण किया जो आजकल उपलब्ध होता है। जैसा
कि 'दृढबल' ने लिखा, अग्निवेशकृते तन्त्रे चरकप्रतिसंस्कृते।
[ ३३ ]
हरणरूप में भात बनाने का वर्णन किया है जो उस देश का विशेष भोजन है। इन
सबसे प्रतीत होता है कि वात्स्यायन द्रविड़ देश के रहने वाले ही थे।
वात्स्यायन के जो नाम 'अभिधान-चिन्तामणि' में दिए हैं उनमें 'कौटिल्य' और
'चणकात्मज' यह दो नाम भी हैं। नन्दवंश के विध्वंसक और मौर्य साम्राज्य के
संस्थापक आर्य चाणक्य का नाम भारतीय इतिहास में अत्यन्त प्रसिद्ध है।
कौटिल्य भी उन्हीं का दूसरा नाम है। अब यदि 'अभिधान-चिन्तामणि' में 'वात्स्यायन'
के जो नाम दिए हैं वह सब वस्तुतः एक ही व्यक्ति के नाम हैं तो यह मानना
पड़ेगा कि आर्य चाणक्य ही वात्स्यायन नाम से न्यायदर्शन के भाष्यकार हैं।
वात्स्यायन भाष्य के प्रथम सूत्र के अन्त में आर्य चाणक्य-प्रणीत 'कौटिल्य
अर्थशास्त्र' नामक ग्रन्थ से एक श्लोक भी उद्धृत किया गया है, जो इस प्रकार है-
प्रदीपः सर्वविद्यानामुपायः सर्वकर्मणाम् ।
आश्रयः सर्वधर्माणां विद्योद्देशे प्रकीर्तिता ।
वात्स्यायन के नाम से ही वर्तमान समय में कामशास्त्र के आधारभूत
'कामसूत्र' मिलते हैं। अत एव अभिधान-चिन्तामणि के अनुसार 'न्याय भाष्य',
'कौटिल्य-अर्थशास्त्र' और 'कामसूत्र' तीनों के रचयिता एक ही व्यक्ति हैं। परन्तु
श्री सतीश चन्द्र विद्याभूषण जी इससे सहमत नहीं हैं।
वात्स्यायन का समय—
प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक 'दिङ्नाग' [ ५०० वि० सं० ] ने अपने 'प्रमाणसमुच्चय'
नामक ग्रन्थ में 'वात्स्यायन भाष्य' के अनेक अंशों की आलोचना तथा खण्डन
किया है। इससे यह निश्चित है कि वात्स्यायन, दिङ्नाग से पूर्ववर्ती अर्थात्
५०० वि० सं० से पूर्व के हैं।
दूसरे प्रसिद्ध बौद्ध दार्शनिक 'वसुबन्धु' हैं जिनका समय ४८० वि० सं० है।
उन्होंने अनुमान की जिस प्रणाली का तथा अवयवों का जो निरूपण किया है वह
'वात्स्यायन भाष्य' की प्रणाली से सर्वथा भिन्न है। यह प्रणाली यदि 'वात्स्यायन'
के सामने आई होती तो वे अवश्य उसकी आलोचना करते। अत एव यह प्रतीत
होता है कि 'वात्स्यायन', 'वसुबन्धु' के भी पूर्ववर्ती हैं।
परन्तु जैसा कि पहले कहा जा चुका है न्यायसूत्रों में अनेक ऐसे [ प्रक्षिप्त ]
सूत्र हैं जिनमें बौद्ध-सिद्धान्तों का निर्देश है और वह 'माध्यमिक सूत्र' तथा 'लङ्का-
वतार' के आधार पर है। अत एव वात्स्यायन का काल उक्त ग्रन्थों के पश्चात् ही
निश्चित होगा।
मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चन्द्रगुप्त का काल ३०० वि० ऐतिहासिक विद्वानों
ने निर्धारित किया है और उपर्युक्त प्रमाणों के आधार पर भी उनका समय भी
४०० वि० सं० के लगभग ही निश्चित होता है। अत एव इससे इस बात की भी
पुष्टि होती है कि 'वात्स्यायन' और 'कौटिल्य' सम्भवतः एक ही व्यक्ति हैं।
३ त० भू०
[ ३४ ]
२—वार्तिककार श्री उद्योतकर—[ ६३५ वि० ]
प्राचीन न्याय के साहित्य में 'वात्स्यायन भाष्य, के बाद समय और महत्त्व दोनों
की दृष्टि से दूसरा स्थान 'न्यायवार्तिक' का है इसके निर्माता श्री 'उद्योतकराचार्य'
का समय आधुनिक विद्वानों की दृष्टि में ६३५ वि० के लगभग है। 'उद्योतकर'
के पूर्ववर्ती 'दिङ्नाग' आदि बौद्ध आचार्यों ने 'वात्स्यायन भाष्य' का जो खण्डन
किया उसी का उद्धार करने के लिए उद्योतकर ने इस 'न्याय-वार्तिक' की रचना
की है। उन्होंने स्वयं लिखा है—
यदक्षपादः प्रवरो मुनीनां, शमाय शास्त्रं जगतो जगाद ।
कुतार्किकाज्ञाननिवृत्तिहेतोः, करिष्यते तस्य मया प्रबन्धः ॥
'वासवदत्ता' नामक प्रसिद्ध गद्य काव्य के निर्माता श्री महाकवि 'सुबन्धु' ने
भी अपने ग्रन्थ में न्याय के स्वरूप की रक्षा करने वाले के रूप में उद्योतकर का
स्मरण किया है—
न्यायस्थितिमिवोद्योतकरस्वरूपां, बौद्धसङ्गतिमिवालङ्कार-
भूषिताम्······वासवदत्तां ददर्श।
'पाशुपताचार्य' और 'भारद्वाज' इन दो नामों से भी कहीं-कहीं 'उद्योतकर' का
उल्लेख मिलता है। यह दोनों नाम उनके गोत्र और सम्प्रदाय के कारण प्रसिद्ध हैं।
उन्होंने स्वयं भी विशेषण रूप से अपने लिए इन दोनों शब्दों का प्रयोग किया है-
इति श्रीपरमर्षिभारद्वाज-पशुपताचार्य-श्रीमदुद्योतकर-कृतौ न्यायवार्तिके पञ्चमोऽध्यायः
श्री 'उद्योतकर' ने अपने ग्रन्थ में अधिकतर बौद्ध आचार्य 'दिङ्नाग' और नागार्जुन
का खण्डन किया है और 'दिङ्नाग' के लिए सर्वत्र 'भदन्त¹' शब्द का प्रयोग किया
है जो बौद्ध भिक्षुओं का आदरसूचक शब्द है। नैयायिकों और बौद्धों का सबसे मुख्य
विवाद आत्म तत्त्व के विषय में है। 'उद्योतकर' ने इस प्रश्न को एक विचित्र ढंग से
उठाया है। उनका कहना है कि बौद्ध विद्वान् यदि आत्म तत्त्व का खण्डन करते हैं
तो वह वस्तुतः अपने ही सिद्धान्त और अपने ही धर्म ग्रन्थों के विपरीत बोलते हैं।
संयुक्तनिकाय ३. २. से निम्नांश उद्धृत कर वे उसे आत्मतत्त्व का समर्थक बतलाते हैं—
तथा भारं वो भिक्षवो देशिष्यामि भारहारं च, भारः पञ्चस्कन्धा
भारहारश्च पुद्गल इति । यश्चात्मा नास्तीति स मिथ्यादृष्टिको भवतीति सूत्रम्।
भारं वो भिक्खवे देसिस्सामि । भारहारं च । कतमो भिक्खवे
भारो । पंचुपादान स्कन्धा तिस्स वचनीयम् । कतमो च भिक्खवे
भारहारो । पुग्गलो तिस्स वचनीयम् ।
इसके विपरीत बौद्ध विद्वानों का आत्म तत्त्व का खण्डन करना उनके धर्म
१ अहो प्रमाणानभिज्ञता भदन्तस्य । न्याय वा० १. १. ६.
[ ३५ ]
ग्रन्थों के ही विपरीत जाता है। इस प्रकार 'दिङ्नाग', 'वसुबन्धु', 'नागार्जुन'
आदि बौद्ध आचार्यों का खण्डन 'वार्तिक' में जगह-जगह मिलता है।
सिद्धान्त की दृष्टि से वार्तिककार सूत्रकार से अनेक स्थलों पर आगे बढ़ गये
हैं। जिन बातों का वर्णन सूत्र में नहीं है और न हो सकता था इस प्रकार के
अनेक महत्त्वपूर्ण सिद्धान्तों का उल्लेख वार्तिक में हुआ है और वहीं से उत्तरवर्ती
न्याय साहित्य में आया है। इस प्रकार के सिद्धान्तों में से कुछ इस प्रकार हैं—
प्रत्यक्ष प्रकरण में—षोढा सन्निकर्ष।
अनुमान प्रकरण में—अनुमान के केवलान्वयी, केवलव्यतिरेकी और अन्वय-
व्यतिरेकी वह तीन प्रकार के भेद।
शब्द प्रकरण में—स्फोटानुसार पूर्वपूर्ववर्णानुभवजनित-संस्कारसहकृत-चरम
वर्ण के श्रवण से उत्पन्न पद तथा वाक्य की प्रतीति।
३—श्री वाचस्पति मिश्र ( ८४० वि० )
न्यायवार्तिक की भी बौद्ध विद्वानों की ओर से कुछ प्रतिकूल आलोचना हुई।
उसके उद्धार के लिए वाचस्पति मिश्र को 'न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका' लिखने
की आवश्यकता पड़ी। वाचस्पति मिश्र मिथिला के रहनेवाले अति प्रतिभाशाली
विद्वान् थे। उनके गुरु का नाम त्रिलोचन था, सभी दर्शनों पर उनका समान
अधिकार था और सभी दर्शनों पर उनके महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ मिलते हैं जिनमें
सबसे महत्त्वपूर्ण स्थान 'वेदान्त दर्शन' के 'शाङ्कर भाष्य' की टीका 'भामती' का
है। टीका का यह नामकरण उन्होंने अपनी पत्नी के नाम पर किया है।
उनके विषय में प्रसिद्ध है कि वे एक बड़े विरक्त और सच्चे दार्शनिक विद्वान्
थे। विवाहित होते हुए भी वे सदा गृहस्थ धर्म से पराङ्मुख रहे और अनवरत
रूप से गम्भीर मनन और दार्शनिक साहित्य की सृष्टि में प्रयत्नशील रहे।
वृद्धावस्था के आने तक उनके कोई सन्तान नहीं हुई तो एक दिन उनकी
पत्नी ने दुःखी होकर वंश की रक्षा और नाम चलाने की आवश्यकता की ओर
उनका ध्यान दिलाया। इस पर उन्होंने पत्नी को जो उत्तर दिया वह विश्वसाहित्य
की सर्वोच्च भावनाओं में से एक है।
उन्होंने कहा-पुत्र के होने पर भी तुम्हारा नाम और वंश चलता रहे इसका क्या
ठिकाना। मैं अब तक उस ओर नहीं गया, अब क्या जाऊँ। पर हाँ तुम्हारे नाम
को अमर करने के लिए मैं अपनी सर्वोत्तम कृति वेदान्त भाष्य की टीका का
नाम तुम्हारे नाम पर रख देता हूँ। तुम्हारा पुत्र संभव है एक या दो पीढ़ी
तुम्हारा नाम चलाता, परन्तु अब तुम्हारा नाम सदा के लिए अमर हो जायगा'।
और सचमुच आज 'वाचस्पति मिश्र' और 'भामती' की इस युगल
जोड़ी का नाम भारतीय साहित्य में सदा के लिए अमर हो गया है जो उनके
सैकड़ों पुत्रों और सहस्रों पौत्र-प्रपौत्रों से भी नहीं होता। ऐसे महापुरुष का पावन
चरित्र पढ़ कर हमारा हृदय गद्गद् और शरीर रोमाञ्चित हो उठता है। यह त्याग,
[ ३६ ]
यह तपस्या, यह शास्त्रनिष्ठा, और यह एकाग्रता सचमुच स्वर्गीय विभूति है।
'वाचस्पति मिश्र' के जीवन में उनके समावेश ने उनको 'देव कोटि' में पहुँचा
दिया है। उनके चरणों में शतशः नमस्कार
४—श्री उदयनाचार्य [ ९८४ वि० ]
न्याय साहित्य के स्रष्टाओं में श्री वाचस्पति मिश्र के बाद श्री उदयनाचार्य का
स्थान है। बौद्ध दार्शनिकों ने जिस प्रकार वाचस्पति मिश्र से पूर्व नैयायिक विद्वानों
की आलोचना की उसी प्रकार वाचस्पति मिश्र की भी आलोचना की। उसके
उद्धार के लिए श्री उदयनाचार्य ने 'न्यायवार्तिक-तात्पर्य टीका-परिशुद्धि' नामक
ग्रन्थ की रचना की। इसके अतिरिक्त बौद्ध विद्वानों के संघर्ष के कारण ही उन्होंने
'न्यायकुसुमाञ्जलि' और 'आत्मतत्त्वविवेक' नामक दो अत्यन्त उच्च श्रेणी के
दार्शनिक ग्रन्थों की रचना की है। इनमें से 'कुसुमाञ्जलि' में ईश्वर-सिद्धि का
सफल और स्तुत्य प्रयास किया गया है। उसकी रचना बौद्ध दार्शनिक श्री
'कल्याणरक्षित' [ ८२९ वि० ] की 'ईश्वरभङ्गकारिका' के उत्तर के रूप में हुई है।
दूसरे 'आत्मतत्त्व विवेक' की रचना 'कल्याणरक्षित' की 'अन्यापोहविचारकारिका'
और 'श्रुतिपरीक्षा' तथा 'धर्मोत्तराचार्य' [ ८४७ वि० ] के 'अपोहनाम प्रकरण' एवं
'क्षणभङ्ग सिद्धि' के उत्तर रूप में हुई है। इसका दूसरा नाम 'बौद्धधिक्कार' भी है।
इसमें उन्होंने अपोह, क्षणभङ्ग और श्रुत्यप्रामाण्य का खण्डन किया है। और क्षण-
भङ्ग, बाह्यार्थ भङ्ग, गुणगुणि भेदभङ्ग तथा अनुपलब्ध इन चार बौद्ध सिद्धान्तों की
आलोचना करते हुए नित्य आत्मा की सत्ता सिद्ध की है।
ईश्वर और आत्मा के विषय में 'उदयनाचार्य' के बौद्धों के साथ बहुधा शास्त्रार्थ
होते रहते थे जिनमें युक्तियों द्वारा बौद्धों के पराजित होने पर भी बौद्ध ईश्वर
की सत्ता स्वीकार नहीं करते थे। एक बार इसी प्रकार के शास्त्रार्थ के बाद वे एक
ब्राह्मण और एक बौद्ध को लेकर एक पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए और वहाँ से
उन्होंने दोनों को नीचे ढकेल दिया। अकस्मात् नीचे गिर कर बौद्ध मर गया और
ब्राह्मण बच गया। जिससे लोगों ने ईश्वरवाद की सत्यता स्वीकार की।
इसके बाद इस नर हत्या का प्रायश्चित करने की दृष्टि से वे जगन्नाथ पुरी की
यात्रा को गए परन्तु वहाँ उन्हें 'जगन्नाथ' के दर्शन नहीं हुए। इसे उन्होंने अपना
अपमान समझा और उस समय जगन्नाथ को संबोधन करके कहा—
ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मामवज्ञाय तिष्ठसि ।
समायाते पुनबौद्धे मदधीना तव स्थितिः ॥
हे भगवान् ! आप ऐश्वर्य के मद में मत्त होकर आज मेरा अपमान कर रहे हैं,
लेकिन जिस समय बौद्ध आपका खण्डन करने आवेंगे उस समय आपकी स्थिति
मेरे ही द्वारा होगी।
इस प्रकार जगन्नाथ के दर्शनों से निराश होकर इन्होंने बनारस में तुषानल में
[ ३७ ]
प्रवेश कर अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया। उनका एक ग्रन्थ ‘लक्षणावली’ भी
है जिससे उनके काल का निर्णय होता है। उसमें उन्होंने लिखा है—
तर्काम्बराङ्कप्रमितेष्वतीतेषु शकान्ततः ।
वर्षेषूदयनश्चक्रे सुबोधां लक्षणावलीम् ॥
उदयन के बाद बौद्ध धर्म का पर्याप्त पतन हो चुकने के कारण और विशेषकर
११०० वि० के बाद तो प्रायः बौद्ध विद्वानों का बिल्कुल ही अभाव-सा हो गया।
इस लिए बौद्ध और नैयायिकों का क्रियात्मक संघर्ष प्रायः समाप्त हो गया। केवल
नैयायिकों की पुस्तकों में बौद्ध विद्वानों की आलोचना और पूर्वोक्त बातों का पिष्ट-
पेषण होता रहा। दूसरी ओर से उत्तर देने वाला कोई नहीं था अतएव नैयायिकों
की वह सारी आलोचना निर्जीव आलोचना रही। उसमें कोई आकर्षण
न रह गया।
उदयनाचार्य के बाद यह टीका-प्रटीका की पद्धति तो समाप्त हो गई, परन्तु
प्राचीन पद्धति से न्यायसूत्रों के ऊपर स्वतन्त्र वृत्ति आदि की रचना लगभग
सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक चलती रही। इस बीच में प्राचीन न्याय के जिस
साहित्य का निर्माण हुआ उसकी सूची नीचे दी जा रही है। उदयन के उत्तरवर्ती
नैयायिकों में जयन्त भट्ट का नाम विशेष उल्लेख योग्य है उनकी न्याय-
मञ्जरी एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है। इस प्रकार प्राचीन न्याय का यह परिच्छेद प्रायः
समाप्त हो गया।
प्राचीन न्याय-सम्बन्धी जो कुछ साहित्य मिलता है उसकी सूची इस प्रकार
तैयार की जा सकती है—
१ न्याय सूत्र गौतम अक्षपादकृत [ मूलग्रन्थ ]
टीकाएं—
न्यायभाष्य वात्स्यायन ३०० ई०
न्यायवार्तिक उद्योतकर ६३५ ”
न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका वाचस्पति मिश्र ८४० ”
न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका-परिशुद्धि उदयनाचार्य ९८४ ”
न्यायमञ्जरी जयन्त भट्ट १००० ”
न्यायनिबन्ध-प्रकाश वर्धमान १२२५ ”
न्यायालङ्कार श्रीकण्ठ
न्यायसूत्रोद्धार वाचस्पति मिश्र (द्वितीय) १४५० ”
न्याय रहस्य रामभद्र १६३० ”
न्यायसिद्धान्तमाला जयराम १७०० ”
न्यायसूत्रवृत्ति विश्वनाथ १६३४ ”
न्यायसंक्षेप गोविन्द खन्ना १६५० ”
[ ३८ ]
मध्य न्याय
'प्राचीन न्याय' का संक्षिप्त परिचय हम ऊपर दे चुके हैं । 'नव्य-न्याय' का
परिचय आगे देंगे । इन दोनों के बीच में न्याय साहित्य का एक स्तर और है
जिसे हम 'मध्य-न्याय' कह सकते हैं । इस 'मध्य-न्याय' के भी दो भाग हैं एक
'बौद्ध-न्याय' और दूसरा 'जैन-न्याय' । बौद्ध और जैन-भारत के दो प्रमुख धर्म हैं
जिनका उदय ईसा के पूर्व छठी शताब्दी में हुआ था । परन्तु बौद्ध और जैन
न्याय उतने प्राचीन नहीं हैं । वास्तविक बौद्ध-न्याय का प्रारम्भ पञ्चम शताब्दी वि०
में आचार्य दिङ्नाग [ ४५०-५२० ] से, और वास्तविक 'जैन-न्याय' का प्रारम्भ
आचार्य सिद्धसेन दिवाकर [ ४८०-५५० ] से होता है । उनके पूर्व इन दोनों धर्मों
का लगभग एक हजार वर्ष से अधिक का इतिहास है । इस एक हजार वर्ष के
लम्बे काल में दोनों धर्मों में पर्याप्त दार्शनिक प्रगति हुई है । बौद्ध धर्म में इस
बीच सौत्रान्तिक, वैभाषिक, माध्यमिक तथा योगाचार नाम से चार दार्शनिक
सम्प्रदायों का विकास हो चुका था और नागार्जुन, असङ्ग, वसुबन्धु सरीखे
दार्शनिक यहाँ जन्म ले चुके थे । इसी प्रकार जैन धर्म में भी उपास्वाति जैसे
प्रकाण्ड दार्शनिक 'तत्त्वार्थाधिगम सूत्र' सदृश प्रौढ़ ग्रंथों की रचना कर चुके थे ।
परन्तु वह वस्तुतः उन दोनों धर्मों का 'प्रमेय प्रधान' युग था । महात्मा बुद्ध एवं
महावीर स्वामी ने जिस धर्म का उपदेश किया वह 'प्रमेय प्रधान' धर्म था । उसकी
विवेचना के लिये उन्होंने आवश्यकतानुसार उस समय की प्रचलित न्याय आदि
की प्रणालियों को ही अपना लिया था । इसलिये उन प्रारम्भिक एक सहस्र वर्षों
में हमें 'बौद्ध न्याय' या 'जैन न्याय' की अलग उपलब्धि नहीं होती है । पञ्चम
शताब्दी वि० में आकर बौद्धों में आचार्य दिङ्नाग ने, और जैनों में आचार्य
सिद्धसेन दिवाकर ने क्रमशः 'प्रमाण समुच्चय' एवं 'न्यायावतार' ग्रन्थ लिख कर
'बौद्ध न्याय' तथा 'जैन न्याय' को स्वतन्त्र स्वरूप एवं नवीन विवेचना शैली से
उपस्थित किया । इसीलिये आचार्य 'दिङ्नाग' 'बौद्ध न्याय' के तथा 'सिद्धसेन
दिवाकर' 'जैन न्याय' के प्रवर्त्तक या जन्मदाता माने जाते हैं ।
दिङ्नाग [ ४५०-५२० ई० ]
न्याय दर्शन के भाष्यकार 'पक्षिल स्वामी' या 'वात्स्यायन' 'काञ्जीवरम्' के
रहने वाले थे । इसी प्रकार बौद्ध न्याय के जन्मदाता आचार्य 'दिङ्नाग' भी
'काञ्चीवरम्' के एक प्रतिष्ठित ब्राह्मण कुल में उत्पन्न हुये थे । बौद्धों की 'वात्सी
पुत्रीय' शाखा के अनुयायी 'नागदत्त' नामक पण्डित ने उनको बौद्ध धर्म में
दीक्षित किया । उन्हीं से दिङ्नाग ने हीनयान के अनुसार त्रिपिटकों का अध्ययन
किया । उसके बाद प्रसिद्ध बौद्ध विद्वान् वसुबन्धु से उन्होंने हीनयान तथा महा-
यान के त्रिपिटक आदि का अध्ययन किया । अपनी प्रखर तर्क शक्ति के कारण वे
'तर्क पुङ्गव' कहे जाते थे । उनकी प्रतिभा से प्रभावित होकर उस समय के प्रसि-
द्धतम 'नालन्दा विश्वविद्यालय' ने उनको अपने यहाँ निमन्त्रित किया था ।
[ ३६ ]
उन्होंने उड़ीसा, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत का व्यापक रूप से भ्रमण किया
था। लगभग ७० वर्ष की आयु में उड़ीसा के किसी वन प्रदेश में शान्तिपूर्वक
निर्वाण प्राप्त किया।
दिङ्नाग का सबसे मुख्य न्याय ग्रन्थ 'प्रमाण समुच्चय' है। मूल ग्रन्थ संस्कृत
में अनुष्टुप् छन्द के कारिका रूप में लिखा गया था और उन पर दिङ्नाग ने स्वयं
ही वृत्ति भी लिखी थी। परन्तु उसका संस्कृत संस्करण लुप्त हो गया। उसके
स्थान पर तिब्बती भाषा में उसका अनुवाद पाया जाता है। मूल ग्रन्थ १ प्रत्यक्ष
परिच्छेद, २ स्वार्थानुमान परिच्छेद, ३ परार्थानुमान परिच्छेद, ४ हेतुदृष्टान्त
परिच्छेद, ५ अपोह परिच्छेद तथा ६ जाति परिच्छेद रूप ६ परिच्छेदों में विभक्त
था। इनमें केवल प्रथम परिच्छेद का तिब्बती भाषा से संस्कृत में प्रत्यनुवाद
होकर प्रकाशित हुआ है। दिङ्नाग ने नैयायिकों के चार प्रमाणों के स्थान पर
प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं। अतः इस ग्रन्थ में दो ही प्रमाणों
का विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त ६-७ ग्रन्थ और भी दिङ्नाग ने
लिखे हैं जिनका उल्लेख आगे सूची में किया जायगा।
जिस प्रकार वात्स्यायन भाष्य पर वार्तिक, तात्पर्य टीका आदि अनेक व्याख्या
ग्रन्थ लिखे गये हैं उसी प्रकार दिङ्नाग के इस 'प्रमाण समुच्चय' पर धर्मकीर्ति
[ ६५० ई० ] ने 'प्रमाण वार्तिक कारिका' तथा 'प्रमाणवार्तिक वृत्ति', देवेन्द्रबोधि
[ ६५० ] ने 'प्रमाण वार्तिक पञ्चिका' तथा 'प्रमाण वार्तिक पञ्चिका टीका', रविगुप्त
[ ७७५ ] ने प्रमाण वार्तिक वृत्ति, और जिनेन्द्र बोधि ने 'विशाला मलबती नाम-
प्रमाण समुच्चय टीका' प्रज्ञाकर गुप्त [ ९४० ई० ] ने 'प्रमाण वार्तिकालङ्कार' आदि
ग्रन्थों का निर्माण किया है।
इस प्रकार 'दिङ्नाग' [ ४५०-५२० ] से प्रारम्भ होकर मोक्षाकर गुप्त [११००]
तक 'बौद्ध न्याय' के साहित्य का निर्माण होता रहा, जिनमें ३१ आचार्यों ने
ग्रन्थों की रचना की। इनमें भी दिङ्नाग [ ४५०-५२० ], धर्मकीर्ति [ ६५० ]
और शान्त रक्षित [ ७४९ ] विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
सिद्धसेन दिवाकर [ ४८०-५५० ]
ब्राह्मण न्यायाचार्यों में वात्स्यायन का और बौद्ध न्यायाचार्यों में आचार्य
दिङ्नाग का जो स्थान है वही स्थान जैन न्याय के इतिहास में सिद्धसेन दिवाकर
का है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ न्यायसार की रचना कर जैन न्याय को जन्म
दिया। उनके पूर्व भद्रबाहु द्वितीय [ ३७५ ] और उमास्वाति [ ८५ ] ने भी अपने
ग्रन्थों में दार्शनिक सिद्धान्तों की चर्चा की है परन्तु वह 'जैन न्याय' के जन्मदाता
नहीं माने जाते हैं। सिद्धसेन दिवाकर [ ४८०-५५० ] से लेकर यशो विजय
[ १६८८ ] तक ३७ जैन विद्वानों ने 'जैन न्याय' पर अपने-अपने ग्रन्थ लिख कर
न्याय साहित्य के निर्माण में योग दिया है।
[ ४० ]
भारत की राजनीतिक स्थिति में परिवर्तन हो जाने पर मुख्यतः राज्याश्रय से
पोषित बौद्ध धर्म अधिक काल तक भारत में ठहर नहीं सका। प्रतिकूल
परिस्थितियों के उत्पन्न होते ही बौद्ध विद्वान् भारत को छोड़कर अपने अधिक
अनुकूल पड़ने वाले तिब्बत, लङ्का आदि देशों को चले गये। इसलिये सन् ११००
में 'मोक्षाकर गुप्त' की 'तर्कभाषा' की रचना के बाद 'बौद्ध न्याय' की प्रगति एक
दम रुक गई। परन्तु 'जैन धर्म' उन प्रतिकूल परिस्थितियों में दृढ़तापूर्वक भारत
में ही जमा रहा। इसलिये उसका साहित्य निर्माण का कार्य चलता ही रहा।
और १६८८ तक 'यशोविजय' की सुन्दर दार्शनिक कृतियाँ प्राप्त होती रहीं। इस
प्रकार इतने लम्बे समय में 'बौद्ध न्याय' तथा 'जैन न्याय' का जो साहित्य तैयार
हुआ उसकी सूची हम आगे दे रहे हैं। इसी को हम 'मध्य न्याय' का साहित्य
कह सकते हैं।
मध्यकालीन न्याय के निर्माताओं का विवरण
पञ्चम शताब्दी के प्रारम्भ से सत्रहवीं शताब्दी तक के बौद्ध तथा जैन
न्यायाचार्यों के समयानुक्रम तथा ग्रन्थों का परिचय
बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य
१ दिङ्नाग [ ४५०-५२० ई० ]—
१ 'प्रमाण समुच्चय', २ प्रमाण समुच्चय
वृत्ति, ३ न्याय प्रवेश, ४ प्रमाण शास्त्र
न्यायप्रवेश, ५ हेतु चक्र, ६ त्रिकाल
परीक्षा, ७ आलम्बन परीक्षा, ८ आल-
म्बन परीक्षा वृत्ति ।
दिङ्नाग ने वात्स्यायन का खण्डन
किया है ।
२ परमार्थ [ ४९८-५६९ ]—
चीन देश को गया । वसुबन्धु
के 'तर्कशास्त्र' गोतम के 'न्यायसूत्र'
का चीनी भाषा में अनुवाद किया ।
'न्यायसूत्र' पर भाष्य भी लिखा ।
३ शङ्करस्वामी [ ५५० ई० ]—
दिङ्नाग के शिष्य हैं। 'हेतुविद्यान्यायप्रवेश-
शास्त्र' अपर नाम 'न्यायप्रवेश तर्कशास्त्र'
४ धर्मपाल [ ६००-६३५ ई० ]—
१ आलम्बनप्रत्यय ध्यानशास्त्रव्याख्या
२ विद्यामात्र सिद्धिशास्त्र व्याख्या
३ षट्शास्त्र वैपुल्य व्याख्या
५ आचार्य शीलभद्र [ ६३५ ई० ]—
नालन्दा विश्वविद्यालय में धर्मपाल
से अध्ययन कर वहाँ के आचार्य
बने ह्वेनत्सांग को पढ़ाया ।
६ आचार्य धर्मकीर्ति [ ६५० ई० ]—
१ प्रमाणवार्तिक कारिका, २ प्रमाण
वार्तिक वृत्ति, ३ प्रमाण विनिश्चय,
४ न्यायबिन्दु, ५ हेतुबिन्दु विवरण,
६ तर्क न्याय या वादन्याय, ७ सन्ता-
नान्तरसिद्धि, ८ सम्बन्ध परीक्षा
९ सम्बन्ध परीक्षा वृत्ति ।
जैन न्याय के निर्माता आचार्य
१ सिद्धसेन दिवाकर [४८०-५५० ई०]—
१ न्यायावतार
२ जिनभद्र गणी [ ४८४-५८८ ]
अपर नाम क्षमा श्रमण
आवश्यक निर्युक्ति पर 'विशेषावश्यक
भाष्य' नामक टीका
३ सिद्धसेन गणी [ ६०० ई० ]
उमास्वाति के 'तत्त्वार्थाधिगम सूत्र'
पर 'तत्त्वार्थ टीका'
४ समन्त भद्र [ ६०० ई० ]—
उमास्वाति के 'तत्त्वार्थाधिगम सूत्र पर
१ 'गन्ध हस्तीमहाभाष्य' नामक टीका
२ आप्त मीमांसा, ३ युक्तियानुशासन,
४ रत्नकरण्डक
५ अकलङ्क देव [ ७५० ई० ]—
१ आप्त मीमांसा पर अष्टशती टीका
२ न्याय विनिश्चय, ३ लघीयस्त्रय
४ तत्त्वार्थ वार्तिक व्याख्यानालङ्कार
५ अकलङ्कस्तोत्र, ६ स्वरूप सम्बोधन
६ विद्यानन्द [ ८०० ई० ]—
१ आप्तमीमांसालङ्कृतिया अष्टसहस्र
२ प्रमाण परीक्षा, ३ आप्त परीक्षा
४ तत्त्वार्थ श्लोक वार्तिक
[ ४२ ]
बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य
७ देवेन्द्रबोधि [ ६५० ई० ]—
प्रमाण वार्तिक पञ्जिका
८ शाक्यबोधि [ ६७५ ई० ]—
प्रमाण वार्तिक पञ्जिका टीका
९ विनीतदेव [ ७०० ई० ]—
१ न्यायविन्दु टीका, २ हेतु विन्दु
टीका, ३ वादन्याय व्याख्या, ४सम्बन्ध
परीक्षा टीका, ५ आलम्बन परीक्षा
टीका, ६ सन्तानान्तर सिद्धि टीका ।
१० रविगुप्त [ ७२५ ई० ]—
प्रमाण वार्तिक वृत्ति ।
११ जिनेन्द्र बोधि [ ७२५ ई० ]—
विशालामलवती नाम प्रमाण
समुच्चय टीका ।
१२ शान्त रक्षित [ ७४९ ई० ]—
१ तत्त्व संग्रह कारिका, २वादन्याय
वृत्ति विपञ्चितार्थ ।
१३ कमलशील [ ७५० ई० ]—
१ न्याय विन्दु पूर्वपक्ष संक्षिप्त
२ तत्त्वसंग्रह पञ्जिका ।
१४ कल्याण रक्षित [ ८२९ ई० ]—
१ सर्वज्ञसिद्धि कारिका, २ बाह्यार्थ
सिद्धि कारिका, ३ अन्यापोह विचार
कारिका, ४ ईश्वरभङ्ग कारिका,
५ श्रुतिपरीक्षा ।
१५ धर्मोत्तराचार्य [ ८४७-ई० ]—
१ न्यायविन्दु टीका, २ प्रमाणपरीक्षा,
३ अपोह नाम प्रकरणम्, ४ परलोक
सिद्धि, ५ क्षणभङ्गसिद्धि, ६ प्रमाण
विनिश्चय टीका ।
१६ मुक्ताकुम्भ [ ९०० ई० ]—
क्षणभङ्गसिद्धि व्याख्या ।
१७ अर्चट [ ९०० ई० ]—
हेतुविन्दु विवरण
जैन न्याय के निर्माता आचार्य
७ माणिक्यनन्दी [ ८०० ई० ]—
परीक्षामुख सूत्र या परीक्षा मुख शास्त्र
८ प्रभाचन्द्र [ ८२५ ई० ]
प्रमेय कमलमार्तण्ड [परीक्षामुखटीका]
न्यायकुमुद चन्द्रोदय [लघीयस्त्र टीका]
९ मल्ल वादिन् [ ८२७ ई० ]—
न्यायविन्दु टीका या धर्मोत्तर टिप्पण
१० रभस नन्दी [ ८५० ई० ]—
सम्बन्धोद्योत [सम्बन्धपरीक्षाकीटीका]
११ अमृतचन्द्र सूरि [ ९५० ई० ]—
१ तत्त्वार्थसार, २ आत्मख्याति
१२ देवसेन भट्टारक [८९९-९५० ई०]-
१ न्यायचक्र, २ दर्शनसार
१३ प्रद्यु
[ ४३ ]
बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य
१८ अशोक [ ९०० ई० ]—
१ अवयविनिराकरण
२ सामान्यदूषण दिक् प्रसारिता
१९ चन्द्रगोमिन् [द्वितीय, ९२५ ई०]—
न्याय सिद्ध्यालोक
२० प्रज्ञाकर गुप्त [ ९४० ई० ]—
प्रमाण वार्तिकालङ्कार
सहावलम्बनिश्चय
विक्रमशिला विश्वविद्यालय के दक्षिण
द्वार के द्वारपाल प्रज्ञाकरमति [९८३]
इनसे भिन्न थे ।
२१ आचार्य जेतारि [ ९८० ई० ]—
१ हेतुतत्त्वोपदेश, २ बालावतारातर्क
३ धर्मधर्मिविनिश्चय
२२ जिन [ ९४० ई० ]—
प्रमाण वार्तिकालङ्कार टीका
२३ रत्नकीर्ति [ १००० ई० ]—
१ अपोहसिद्धि, २ क्षणभङ्गसिद्धि
२४ रत्नवज्र [ १०४० ई० ]—
‘युक्ति प्रयोग’
२५ जिनमित्र [ १०२५ ई० ]—
न्यायविन्दु पिण्डितार्थ
२६ दानशील [१०२५ ई०] पुस्तक पाठोपाय
२७ ज्ञान श्री मित्र [ १०४० ई० ]—
‘कार्यकारणभावसिद्धि’
२८ ज्ञान श्री भद्र [ १०५० ई० ]—
‘प्रमाण विनिश्चय टीका’
जैन न्याय के निर्माता आचार्य
१८ देवसूरी [ १०८६ ई० ]—
१ प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कार
२ स्याद्वाद रत्नोकर
[ प्रमाणनयतत्त्वालोकालङ्कार टीका ]
१९ चन्द्रप्रभ सूरि [ ११०२ ई० ]
दर्शनशुद्धि या प्रमेयरत्नकोष
न्यायावतार वृत्ति
२० हेमचन्द्रसूरी [ १०८८-११७२ ई० ]-
१ प्रमाण मीमांसा
२ अभिधान चिन्तामणि
३ काव्यानुशास्त्रवृत्ति
४ छन्दोनुशास्त्रवृत्ति
५ अनेकार्थसंग्रह, ६ द्व्याश्रर्यमहाकाव्य
७ त्रिषष्टि शलाका पुरुष चरित
८ योगशास्त्र, ९ निघण्टु शेष
२१ नेमिचन्द्र कवि [ ११५० ई० ]—
‘पार्श्वनाथ चरित’ में कणाद के खण्डन
करने का वर्णन है । ग्रन्थ नहीं मिलता।
२२ आनन्द सूरी [ व्याघ्र शिशुक ]
[ १०९३-११३५ ]—
२३ अमर चन्द्र सूरी [ सिंहशिशुक ]
‘सिंह व्याघ्र लक्षण’ प्रवर्त्तक
२४ हरिभद्रसूरी [ ११२० ई० ]
१ षड् दर्शन समुच्चय
२ न्याय प्रवेश सूत्र
३ न्यायावतार वृत्ति
४ दशवैकालिकानियुक्ति टीका
२५ पार्श्वदेव गणी [ ११३३ ई० ]—
‘न्यायप्रवेश पञ्जिका’
२६ श्रीचन्द्र [११३७]-न्यायप्रवेशटिप्पण
२७ देवभद्र [ ११५० ई० ]—
‘न्यायावतार टिप्पण’
२८ चन्द्रसेन सूरी ११५० ई० ]—
‘उत्पाद सिद्धि प्रकरण’
[ ४४ ]
बौद्ध न्याय के निर्माता आचार्य
२९ रत्नाकर शान्ति [ १०४० ई० ]—
अपर नाम कलिका सर्वज्ञ
१ विज्ञप्तिमात्रसिद्धि, २ अन्तर्व्याप्ति
३० यमारि [ १०५० ई० ]—
प्रमाणवार्तिकालङ्कार टीका
३१ शङ्करानन्द [ १०५० ई० ]—
१ प्रमाणवार्तिक टीका,
२ सम्बन्धपरीक्षानुसार
३ अपोह सिद्धि, ४ प्रतिबन्धसिद्धि
३२ शुभाकर गुप्त [ १०८० ई० ]—
जैन हरिभद्रसूरी [११२७] ने इनके
मत का उल्लेख किया है। ग्रन्थ नहीं
मिलता।
३३ मोक्षाकर गुप्त [ ११०० ई० ]—
तर्कभाषा
संस्कृत ग्रन्थ नहीं मिलता। तिब्बती
भाषा में अनुवाद पाया जाता है।
पुस्तक में तीन परिच्छेद हैं। जिनमें
क्रमशः—१ प्रत्यक्ष, २ स्वार्थानुमान,
३ परार्थानुमान का वर्णन है। अल्प-
बुद्धि बालकों को धर्मकीर्ति के
सिद्धान्तों का ज्ञान करने के लिए
लिखी है।
जैन न्याय के निर्माता आचार्य
२९ रत्नप्रभ सूरी [ ११८१ ई० ]—
‘स्याद्वादरत्नाकरावतारिका’
३० तिलकाचार्य [ ११८०-१२४० ई० ]
१ आवश्यकलघु वृत्ति
२ प्रत्येकबुद्धचरित
३१ मल्लिसैन सूरी [ १२९२ ई० ]—
‘स्याद्वाद मञ्जरी’
३२ राजशेखर सूरी [ १३४८ ई० ]—
‘रत्नावतारिका पञ्जिका’
‘न्यायकन्दली पञ्जिका’ [ वैशेषिक ]
३३ ज्ञानचन्द्र [ १३५० ई० ]—
‘रत्नावतारिका टिप्पण’
३४ गुणरत्न [ १४०९ ई० ]—
षड्दर्शन समुच्चय पर
तर्क रहस्य दीपिका वृत्ति
३५ श्रुतसागर गणी [ १४९३ ई० ]—
‘तत्त्वार्थ दीपिका’
३६ धर्मभूषण [ १६०० ई० ]—
न्याय दीपिका
३७ विनय विजय [१६१३-१६८१ ई०]—
‘न्यायकर्णिका’
३८ यशोविजयगणी [१६०८-१६८८ ई०]
१ न्याय प्रदीप, २ तर्कभाषा
३ न्यायरहस्य, ४ न्यायामृततरङ्गिणी
५ न्यायखण्ड खाद्य
६ अष्टसाहस्री विवरण, ७ न्यायालोक
[ ४५ ]
नव्य न्याय
भारत में बौद्ध धर्म के पतन के बाद, भारतीय इतिहास के एक नवीन युग
का प्रारम्भ हुआ जिसका प्रभाव भारतीय संस्कृति के अन्य भागों की भांति दार्श-
निक क्षेत्र पर भी पड़ा और न्याय साहित्य के निर्माण में उसने एक नवीन प्रकार
का परिवर्तन उत्पन्न कर दिया। दसवीं और ग्यारहवीं शताब्दियाँ इस परिवर्तन
का संक्रान्तिकाल थीं। उनमें निर्माण होने वाले न्याय साहित्य की शैली भी बदली
हुई है और १२ वीं शताब्दी में तो उसमें अत्यधिक परिवर्तन हो गया है। इसीलिये
इस काल के न्याय साहित्य को 'नव्य न्याय' शब्द से कहा जाता है। इस नव्य
न्याय के युग में जिस साहित्य का निर्माण हुआ उसकी दो प्रमुख विशेषतायें हैं
जो उसे प्राचीन न्याय से भिन्न करती हैं। प्राचीन न्याय का सारा साहित्य सूत्रों
पर अवलम्बित था। उस समय जो ग्रन्थ बने वे या तो साक्षात् गोतम सूत्रों की
व्याख्या रूप थे या उनके भाष्य की टीका प्रटीका आदि के रूप में लिखे गये थे
और सूत्रक्रम का अवलम्बन कर उनमें प्रतिपादित पदार्थों को सूत्रकार की भावना
के अनुसार समझाने का प्रयत्न करते थे। इस युग में बौद्धों के खण्डन में इतने
विस्तृत न्याय साहित्य का निर्माण हुआ परन्तु 'उदयन' की 'न्यायकुसुमाञ्जलि' और
'आत्मतत्त्व विवेक' को छोड़कर सबका समावेश सूत्रानुसारी व्याख्या पद्धति के
भीतर हो गया। सूत्रों को छोड़कर स्वतन्त्र ग्रन्थ निर्माण की पद्धति उस
समय नहीं थी।
१. परन्तु नव्य न्याय की विशेषताओं में से पहिली विशेषता यह है कि उसके
प्राचीन सूत्र पद्धति की उपेक्षा करके स्वतन्त्र रूप से ग्रंथों का निर्माण प्रारम्भ
किया गया। न केवल न्याय में अपितु व्याकरणादि अन्य शास्त्रों में भी जिस
साहित्य का निर्माण इस काल में हुआ वहाँ भी यही बात स्पष्ट दिखाई देती है।
इसी ने उन शास्त्रों में भी नवीन व्याकरण, प्राचीन व्याकरण और नवीन वेदान्त,
प्राचीन वेदान्त आदि भेद कर दिये हैं। नवीन व्याकरण का आधारभूत सिद्धान्त-
कौमुदी ग्रन्थ लक्षणानुसारिणी प्राचीन आर्षपद्धति को छोड़कर लक्ष्यानुसारिणी
नवीन पद्धति से लिखा गया है। इसी प्रकार न्याय में नव्य पद्धति से जिस
साहित्य का निर्माण हुआ उसमें भी प्राचीन सूत्र पद्धति की सर्वथा उपेक्षा कर
स्वतन्त्र रूप में ग्रन्थों का निर्माण हुआ है।
२. नव्य न्याय की पद्धति की दूसरी विशेषता है पदार्थों के महत्त्व में आपेक्षिक
परिवर्तन। न्याय के षोडश पदार्थों में से जिनका महत्त्व प्राचीन पद्धति में अधिक
था वह नव्य युग में बहुत कम हो गया है और जिनका महत्त्व कम था उनका बढ़
गया है। उदाहरण के लिये प्राचीन न्याय के सूत्रकार ने सारा पाँचवा अध्याय केवल
'जाति' और 'निग्रह स्थान' इन दो पदार्थों के वर्णन में व्यय कर दिया है, परन्तु नव्य
न्याय में उनका उल्लेख केवल नाममात्र को मिलता है। इसके विपरीत अवयव आदि
का वर्णन प्राचीन न्याय की अपेक्षा नव्य न्याय में कहीं अधिक पाया जाता है।
[ ४६ ]
३. नव्य न्याय की तीसरी विशेषता है 'प्रकरण ग्रन्थ'। प्रकरण ग्रन्थ एक
पारिभाषिक शब्द है जिसका लक्षण इस प्रकार है—
शास्त्रैकदेशसम्बद्धं शास्त्रकार्यान्तरे स्थितम् ।
आहुः प्रकरणं नाम ग्रन्थभेदं विपश्चितः ॥
अर्थात् शास्त्र के एक अंश के प्रतिपादक और आवश्यकतानुसार अन्य शास्त्र के
उपयोगी अंश को भी प्रतिपादन करने वाले ग्रंथ भेद को प्रकरण ग्रंथ कहते हैं।
नव्य न्याय में इस प्रकार के जिन अनेक प्रकरण ग्रंथों का निर्माण हुआ है,
उनको हम चार भागों में विभक्त कर सकते हैं।
(क) न्याय के वे प्रकरण ग्रन्थ जो केवल एक प्रमाण पदार्थ का निरूपण करते
हैं। और शेष १५ पदार्थों को प्रमाण के भीतर ही अन्तर्भूत कर लेते हैं। इस प्रकार
के ग्रन्थों में श्री 'भासर्वज्ञ' [ १००० ई० ] के 'न्यायसार' का नाम उल्लेख योग्य है।
'भासर्वज्ञ' सम्भवतः काश्मीर के रहने वाले दशम शताब्दी के दार्शनिक हैं।
केवल एक प्रमाण पदार्थ के प्रतिपादन की यह शैली बौद्ध साहित्य से ली गई
है। भासर्वज्ञ ने अपने सामने की उसी प्रचलित पद्धति से ही न्याय के पदार्थों का
निरूपण कर दिया है। परन्तु उन्होंने न केवल प्राचीन न्याय पद्धति को परिवर्तित
कर दिया है अपितु अनेक सिद्धान्तों को भी परिवर्तित रूप में प्रस्तुत किया है।
उदाहरण के लिये उन्होंने प्रमाण के तीन भेद प्रत्यक्ष, अनुमान और आगम किये
हैं। जब कि न्यायशास्त्रों में इनके अतिरिक्त 'उपमान' प्रमाण भी माना गया है।
प्रमाणों का यह त्रिविध विभाग न्याय सिद्धान्त की अपेक्षा सांख्य और जैन सिद्धान्त
से अधिक मिलता है क्योंकि वे तीन प्रमाण मानते हैं। लेखक ने अनुमान को
स्वार्थानुमान और परार्थानुमान इन दो भेदों में विभक्त करने में भी बौद्ध और
जैन दार्शनिकों के विभाग का अवलम्बन किया है। और उन्हीं की तरह दृष्टान्ता-
भास एवं हेत्वाभासों का वर्णन किया है। नव्य न्याय के अन्य लेखकों की भाँति
'जाति' और 'निग्रह स्थान' को उन्होंने छोड़ नहीं दिया बल्कि परार्थानुमान के
प्रकरण में उनका भी वर्णन किया है। मोक्ष के सम्बन्ध में भी उनका सिद्धान्त
प्राचीन न्याय से भिन्न है। वे मोक्ष में नित्य आनन्द की अभिव्यक्ति मानते हैं जब
भाष्यकार वात्स्यायन ने अत्यन्त प्रयत्नपूर्वक उसका खण्डन किया है।
इस प्रकार नव्य पद्धति पर न्यायशास्त्र के इस प्रथम ग्रंथ की रचना दसवीं
शताब्दी में हुई और उसने अपने अनुरूप आदर पाया। उसके ऊपर १८ टीकायें
लिखी गईं जिनमें से मुख्य मुख्य यह हैं—
१. न्यायसार टीका [ विजयसिंह गुणी ]
२. न्यायसार टीका [ जयतीर्थ ]
३. न्यायसार विचार [ भट्ट राघव ]
४. न्यायतात्पर्यदीपिका [ जयसिंह सूरि ]
शेष का उल्लेख ग्रन्थों में मिलता है टीका उपलब्ध नहीं है।
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(ख) दूसरे प्रकार के 'प्रकरण ग्रन्थ' वे हैं जो मुख्यतः न्याय के ग्रन्थ होते हुए भी
वैशेषिक दर्शन के पदार्थों का भी समावेश कर लेते हैं। इस प्रकार के ग्रन्थों में
'श्रीवरदराज' को 'तार्किकरक्षा' और 'केशवमिश्र' की 'तर्कभाषा' के नाम लिए जा
सकते हैं। इन दोनों ने न्याय के षोडश पदार्थों का वर्णन किया है और दोनों ने
'वैशेषिक' के द्रव्यादि पदार्थों का अन्तर्भाव 'प्रमेय' में कर लिया है। इनमें से
वरदराज का समय लगभग ११५० और केशवमिश्र का समय लगभग १२७५ है।
(ग) तीसरे प्रकार के 'प्रकरण ग्रन्थ' वे हैं जो मुख्यतः 'वैशेषिक' के ग्रन्थ हैं
परन्तु न्यायदर्शन के 'प्रमाण' पदार्थ का पूर्णरूप से उनमें समावेश हो गया है।
इनमें से कुछ में 'प्रमाण' का अन्तर्भाव 'वैशेषिक' के 'गुणप्रकरण' में किया गया है
और कुछ में 'आत्मप्रकरण' में जो कि द्रव्य का एक भेद है। न्याय और वैशेषिक के
पदार्थों को इस प्रकार मिलाकर प्रतिपादन करने की शैली भी श्री उदयन के बाद
विशेष रूप से प्रचलित हुई। उदयन ने अपनी 'लक्षणावली' में वैशेषिक दर्शन
के सात [अभाव सहित] पदार्थों का वर्णन किया है। परन्तु उनमें न्याय के प्रमाण'
पदार्थ का निरूपण नहीं है। उससे पूर्व केवल 'प्रशस्तपादभाष्य' में 'प्रमाण' का भी
समावेश हुआ है। इस प्रकार के ग्रन्थों में १२वीं शताब्दी के 'वल्लभाचार्य' की
'न्यायलीलावती', 'अन्नंभट्ट' [ १६२३], का 'तर्कसंग्रह', विश्वनाथ न्यायपञ्चानन'
[ १६३४ ] का 'भाषापरिच्छेद', 'लौगाक्षि भास्कर' की 'तर्ककौमुदी' के नाम लिए
जा सकते हैं।
(घ) चौथे प्रकार के प्रकरण ग्रन्थ वे हैं जिनमें कुछ न्याय और कुछ वैशेषिक
के पदार्थों का निरूपण है जैसे 'शशधर' [ ११२५ ] का 'न्यायसिद्धान्तदीप' ।
इसी प्रकरण में 'सर्वदर्शनसंग्रह' के लेखक श्री 'माधवाचार्य' के नाम का भी
उल्लेख कर देना चाहिए।
तत्त्वचिन्तामणि (एक युग प्रवर्तक ग्रन्थ) —
पिछले प्रकरण में हमने जिन प्रकरण ग्रन्थों का उल्लेख किया है, वह सब
नव्यग्रन्थ होते हुए नव्यन्याय के महत्वपूर्ण ग्रन्थ नहीं हैं। नव्यन्याय के साहित्य
में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान 'गङ्गेशोपाध्याय' के 'तत्त्वचिन्तामणि' नामक ग्रन्थ
का है। इसे ही वस्तुतः नव्यन्याय का आधारभूत ग्रन्थ और 'गङ्गेशोपाध्याय को
नव्यन्याय का पिता माना जाता है। इस ग्रन्थ ने न्यायशास्त्र के इतिहास में
वस्तुतः एक नवीन युग की सृष्टि की है। अब तो संस्कृत शिक्षा पर भी कुछ आंग्ल
पद्धति का प्रभाव दिखाई देने लगा है। परन्तु अब से केवल एक पीढ़ी पूर्व तक
'तत्त्वचिन्तामणि' या उसके किसी एक खण्ड को पढ़े बिना दार्शनिक पाण्डित्य प्राप्त
करना असम्भव समझा जाता था।
इस ग्रन्थ के रचयिता श्री गङ्गेशोपाध्याय एक मैथिल विद्वान् थे जिन्होंने
सन् १२०० के लगभग इस ग्रन्थ की रचना की। अपने निर्माण काल से ही यह
ग्रन्थ मैथिल सम्प्रदाय की शिक्षा का चरम उद्देश्य बन गया। केवल इस ग्रन्थ का