तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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उन्होंने उड़ीसा, महाराष्ट्र और दक्षिण भारत का व्यापक रूप से भ्रमण किया
था। लगभग ७० वर्ष की आयु में उड़ीसा के किसी वन प्रदेश में शान्तिपूर्वक
निर्वाण प्राप्त किया।
दिङ्नाग का सबसे मुख्य न्याय ग्रन्थ 'प्रमाण समुच्चय' है। मूल ग्रन्थ संस्कृत
में अनुष्टुप् छन्द के कारिका रूप में लिखा गया था और उन पर दिङ्नाग ने स्वयं
ही वृत्ति भी लिखी थी। परन्तु उसका संस्कृत संस्करण लुप्त हो गया। उसके
स्थान पर तिब्बती भाषा में उसका अनुवाद पाया जाता है। मूल ग्रन्थ १ प्रत्यक्ष
परिच्छेद, २ स्वार्थानुमान परिच्छेद, ३ परार्थानुमान परिच्छेद, ४ हेतुदृष्टान्त
परिच्छेद, ५ अपोह परिच्छेद तथा ६ जाति परिच्छेद रूप ६ परिच्छेदों में विभक्त
था। इनमें केवल प्रथम परिच्छेद का तिब्बती भाषा से संस्कृत में प्रत्यनुवाद
होकर प्रकाशित हुआ है। दिङ्नाग ने नैयायिकों के चार प्रमाणों के स्थान पर
प्रत्यक्ष तथा अनुमान दो ही प्रमाण माने हैं। अतः इस ग्रन्थ में दो ही प्रमाणों
का विवेचन किया गया है। इसके अतिरिक्त ६-७ ग्रन्थ और भी दिङ्नाग ने
लिखे हैं जिनका उल्लेख आगे सूची में किया जायगा।
जिस प्रकार वात्स्यायन भाष्य पर वार्तिक, तात्पर्य टीका आदि अनेक व्याख्या
ग्रन्थ लिखे गये हैं उसी प्रकार दिङ्नाग के इस 'प्रमाण समुच्चय' पर धर्मकीर्ति
[ ६५० ई० ] ने 'प्रमाण वार्तिक कारिका' तथा 'प्रमाणवार्तिक वृत्ति', देवेन्द्रबोधि
[ ६५० ] ने 'प्रमाण वार्तिक पञ्चिका' तथा 'प्रमाण वार्तिक पञ्चिका टीका', रविगुप्त
[ ७७५ ] ने प्रमाण वार्तिक वृत्ति, और जिनेन्द्र बोधि ने 'विशाला मलबती नाम-
प्रमाण समुच्चय टीका' प्रज्ञाकर गुप्त [ ९४० ई० ] ने 'प्रमाण वार्तिकालङ्कार' आदि
ग्रन्थों का निर्माण किया है।
इस प्रकार 'दिङ्नाग' [ ४५०-५२० ] से प्रारम्भ होकर मोक्षाकर गुप्त [११००]
तक 'बौद्ध न्याय' के साहित्य का निर्माण होता रहा, जिनमें ३१ आचार्यों ने
ग्रन्थों की रचना की। इनमें भी दिङ्नाग [ ४५०-५२० ], धर्मकीर्ति [ ६५० ]
और शान्त रक्षित [ ७४९ ] विशेष रूप से प्रसिद्ध हैं।
सिद्धसेन दिवाकर [ ४८०-५५० ]
ब्राह्मण न्यायाचार्यों में वात्स्यायन का और बौद्ध न्यायाचार्यों में आचार्य
दिङ्नाग का जो स्थान है वही स्थान जैन न्याय के इतिहास में सिद्धसेन दिवाकर
का है। उन्होंने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ न्यायसार की रचना कर जैन न्याय को जन्म
दिया। उनके पूर्व भद्रबाहु द्वितीय [ ३७५ ] और उमास्वाति [ ८५ ] ने भी अपने
ग्रन्थों में दार्शनिक सिद्धान्तों की चर्चा की है परन्तु वह 'जैन न्याय' के जन्मदाता
नहीं माने जाते हैं। सिद्धसेन दिवाकर [ ४८०-५५० ] से लेकर यशो विजय
[ १६८८ ] तक ३७ जैन विद्वानों ने 'जैन न्याय' पर अपने-अपने ग्रन्थ लिख कर
न्याय साहित्य के निर्माण में योग दिया है।