तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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प्रवेश कर अपने जीवन का उत्सर्ग कर दिया। उनका एक ग्रन्थ ‘लक्षणावली’ भी
है जिससे उनके काल का निर्णय होता है। उसमें उन्होंने लिखा है—
तर्काम्बराङ्कप्रमितेष्वतीतेषु शकान्ततः ।
वर्षेषूदयनश्चक्रे सुबोधां लक्षणावलीम् ॥
उदयन के बाद बौद्ध धर्म का पर्याप्त पतन हो चुकने के कारण और विशेषकर
११०० वि० के बाद तो प्रायः बौद्ध विद्वानों का बिल्कुल ही अभाव-सा हो गया।
इस लिए बौद्ध और नैयायिकों का क्रियात्मक संघर्ष प्रायः समाप्त हो गया। केवल
नैयायिकों की पुस्तकों में बौद्ध विद्वानों की आलोचना और पूर्वोक्त बातों का पिष्ट-
पेषण होता रहा। दूसरी ओर से उत्तर देने वाला कोई नहीं था अतएव नैयायिकों
की वह सारी आलोचना निर्जीव आलोचना रही। उसमें कोई आकर्षण
न रह गया।
उदयनाचार्य के बाद यह टीका-प्रटीका की पद्धति तो समाप्त हो गई, परन्तु
प्राचीन पद्धति से न्यायसूत्रों के ऊपर स्वतन्त्र वृत्ति आदि की रचना लगभग
सत्रहवीं शताब्दी के अन्त तक चलती रही। इस बीच में प्राचीन न्याय के जिस
साहित्य का निर्माण हुआ उसकी सूची नीचे दी जा रही है। उदयन के उत्तरवर्ती
नैयायिकों में जयन्त भट्ट का नाम विशेष उल्लेख योग्य है उनकी न्याय-
मञ्जरी एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है। इस प्रकार प्राचीन न्याय का यह परिच्छेद प्रायः
समाप्त हो गया।
प्राचीन न्याय-सम्बन्धी जो कुछ साहित्य मिलता है उसकी सूची इस प्रकार
तैयार की जा सकती है—
१ न्याय सूत्र गौतम अक्षपादकृत [ मूलग्रन्थ ]
टीकाएं—
न्यायभाष्य वात्स्यायन ३०० ई०
न्यायवार्तिक उद्योतकर ६३५ ”
न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका वाचस्पति मिश्र ८४० ”
न्यायवार्तिक-तात्पर्यटीका-परिशुद्धि उदयनाचार्य ९८४ ”
न्यायमञ्जरी जयन्त भट्ट १००० ”
न्यायनिबन्ध-प्रकाश वर्धमान १२२५ ”
न्यायालङ्कार श्रीकण्ठ
न्यायसूत्रोद्धार वाचस्पति मिश्र (द्वितीय) १४५० ”
न्याय रहस्य रामभद्र १६३० ”
न्यायसिद्धान्तमाला जयराम १७०० ”
न्यायसूत्रवृत्ति विश्वनाथ १६३४ ”
न्यायसंक्षेप गोविन्द खन्ना १६५० ”