तर्कभाषा (आचार्य केशवमिश्र - पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि कृत 'तर्करहस्य' हिन्दी व्याख्या सहित)
Tarkabhasha of Keshavamishra
आचार्य केशवमिश्र (व्याख्याकार: पं. विश्वेश्वर सिद्धान्तशिरोमणि) द्वारा
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यह तपस्या, यह शास्त्रनिष्ठा, और यह एकाग्रता सचमुच स्वर्गीय विभूति है।
'वाचस्पति मिश्र' के जीवन में उनके समावेश ने उनको 'देव कोटि' में पहुँचा
दिया है। उनके चरणों में शतशः नमस्कार
४—श्री उदयनाचार्य [ ९८४ वि० ]
न्याय साहित्य के स्रष्टाओं में श्री वाचस्पति मिश्र के बाद श्री उदयनाचार्य का
स्थान है। बौद्ध दार्शनिकों ने जिस प्रकार वाचस्पति मिश्र से पूर्व नैयायिक विद्वानों
की आलोचना की उसी प्रकार वाचस्पति मिश्र की भी आलोचना की। उसके
उद्धार के लिए श्री उदयनाचार्य ने 'न्यायवार्तिक-तात्पर्य टीका-परिशुद्धि' नामक
ग्रन्थ की रचना की। इसके अतिरिक्त बौद्ध विद्वानों के संघर्ष के कारण ही उन्होंने
'न्यायकुसुमाञ्जलि' और 'आत्मतत्त्वविवेक' नामक दो अत्यन्त उच्च श्रेणी के
दार्शनिक ग्रन्थों की रचना की है। इनमें से 'कुसुमाञ्जलि' में ईश्वर-सिद्धि का
सफल और स्तुत्य प्रयास किया गया है। उसकी रचना बौद्ध दार्शनिक श्री
'कल्याणरक्षित' [ ८२९ वि० ] की 'ईश्वरभङ्गकारिका' के उत्तर के रूप में हुई है।
दूसरे 'आत्मतत्त्व विवेक' की रचना 'कल्याणरक्षित' की 'अन्यापोहविचारकारिका'
और 'श्रुतिपरीक्षा' तथा 'धर्मोत्तराचार्य' [ ८४७ वि० ] के 'अपोहनाम प्रकरण' एवं
'क्षणभङ्ग सिद्धि' के उत्तर रूप में हुई है। इसका दूसरा नाम 'बौद्धधिक्कार' भी है।
इसमें उन्होंने अपोह, क्षणभङ्ग और श्रुत्यप्रामाण्य का खण्डन किया है। और क्षण-
भङ्ग, बाह्यार्थ भङ्ग, गुणगुणि भेदभङ्ग तथा अनुपलब्ध इन चार बौद्ध सिद्धान्तों की
आलोचना करते हुए नित्य आत्मा की सत्ता सिद्ध की है।
ईश्वर और आत्मा के विषय में 'उदयनाचार्य' के बौद्धों के साथ बहुधा शास्त्रार्थ
होते रहते थे जिनमें युक्तियों द्वारा बौद्धों के पराजित होने पर भी बौद्ध ईश्वर
की सत्ता स्वीकार नहीं करते थे। एक बार इसी प्रकार के शास्त्रार्थ के बाद वे एक
ब्राह्मण और एक बौद्ध को लेकर एक पहाड़ी की चोटी पर चढ़ गए और वहाँ से
उन्होंने दोनों को नीचे ढकेल दिया। अकस्मात् नीचे गिर कर बौद्ध मर गया और
ब्राह्मण बच गया। जिससे लोगों ने ईश्वरवाद की सत्यता स्वीकार की।
इसके बाद इस नर हत्या का प्रायश्चित करने की दृष्टि से वे जगन्नाथ पुरी की
यात्रा को गए परन्तु वहाँ उन्हें 'जगन्नाथ' के दर्शन नहीं हुए। इसे उन्होंने अपना
अपमान समझा और उस समय जगन्नाथ को संबोधन करके कहा—
ऐश्वर्यमदमत्तोऽसि मामवज्ञाय तिष्ठसि ।
समायाते पुनबौद्धे मदधीना तव स्थितिः ॥
हे भगवान् ! आप ऐश्वर्य के मद में मत्त होकर आज मेरा अपमान कर रहे हैं,
लेकिन जिस समय बौद्ध आपका खण्डन करने आवेंगे उस समय आपकी स्थिति
मेरे ही द्वारा होगी।
इस प्रकार जगन्नाथ के दर्शनों से निराश होकर इन्होंने बनारस में तुषानल में